मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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जब शहर की कोई भी सड़क महफूज ना हो,
जब कोई भी बोली दिल से लग सके,

जब देश की कोई भी सीमा, खुशगवार नहीं लगे
जब अनजाने खतरे अपने काले चोगे फैलाने लगें
तो महसूस होने लगता है कि

यह वसन्त काल नहीं है!

यह अजनबी सा सिलेटी काल , धरती की चरखनी के साथ अंक जरूर बदल रहा है, लेकिन वसन्त काल खुशबू लेकर नहीं आया है,

इस काल की हवा में रक्त की खुशबू है,

इस काल की फिजा में नफरत का रंग है

यह काल आसान तो नहीं है मित्रो!

ो क्या बसन्त के आगमन का इंतजार किया जाये? किस तरह के वसन्त का, यह भी एक सवाल हो सकता हो सकता है?
क्या हम इंतजार करे , ऐसे वक्त का जहाँ किसी को अपना घर ना छोड़ना पड़े?
क्या हम इंतजार करे , ऐसे वक्त का, जब सब समान हों?
क्या हम इंतजार करे उस वक्त का, जब देश और परदेश की सीमाएं मात्र सीमायें रहें, वहाँ ना कोई तोप हो, ना ही बारूद?

रति सक्सेना
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हाथ उठते है एक
अधूरा नक्श तराशने को

न हाथ मुकम्मल
न नक्श मुकम्मल!

वक़्त की किताब में
हैं नक़्शे भरे हुए,
उस पूरे ज़माने का
जो ख्वाबीदा गुजर गया!
Mathura
*
सभापति जीवविज्ञानी से मुखातिब पूछता है
‘ध्रुवीय हिमखंडों के पिघलने से क्या पृथ्वी का अक्ष भी प्रभावित हो जायेगा!’
मैं अपने मन ही मन जवाब देता हूँ – ‘नहीं, नहीं.’
-बिना अधिक निश्चितताया विश्वास के
जब मुझे यह भी नहीं याद कि शायद कही ऐसा कुछ पढ़ा भी हो मैंने.
मेरा सवाल तब पहुचता है जीवविज्ञानी तक
मेरा सवाल जो छिटककरलौट आया है खाड़ी के उपर तैरते बर्फ के टुकड़े से.
जा पहुचा है मेरा सवाल एक स्त्री के कानों में.
Stéphane D'Amour-
*
उसकी पोशाक
ज्यों सांझ वेला में
पंखुरियों से घिरा
एक पुष्प

काँटों से छिदा
और घायल
उसका चेहरा

José B. González
*
सब कुछ थोड़े ही सूख जाता है
बच ही जाती है स्मृति कि नन्ही बूँद
मिल ही जाता है
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हमारे समय में कविता के दो लक्ष्य उभरे हैं- सौन्दर्य और मानवता। अब सौन्दर्य क्या है कविता के सन्दर्भ में...इसे अभी तक कहीं भी आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। स्थूल कलाओं में जरूर प्रयत्न हुआ है, जहाँ कहा गया है कि वह एक तरफ अंगों के आनुपातिक लगाव ‌और समुच्चय, भव्यता और आँखों को अच्छा लगना बहुत वस्तुगत नहीं होता। हमारी जातीय चाहतें, स्मृतियाँ और व्यक्तिगत रुचि आदि उसका निर्णायक होती हैं। यह भी कहा जाता है यदि निर्माण ठीक ठाक हो गया होता है, एकदम से परफेक्ट हो गया होता है तो वह उबाऊ हो जाता है। ..कला दरअसल पूर्णता प्राप्त होने में जो बचा रह जाता है, जिसे दर्शक अपनी अपनी तरह से पूरा करते हैं और ऐसा करने में जो आनन्द लेते हैं , कला वहाँ होती है। यानी जो हमारी कल्पना को स्फुरित करे , वह भी दिए ढाँचे में, कला वहाँ होती है। वही सौन्दर्य होता है। कविता के संबन्ध में कहा जाता है कि वह भीतर की चीज होती है 
श्रीप्रकाश मिश्र
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आत्मवक्तव्य

उन्होने मेरे पाँवों के नीचे से
मेरे देश को खींच लिया
निष्कासन‍- नाम देकर
अचानक
इस तरह मेरे पैरों के नीचे की जमीन खींच ली
कि अब मेरे चारों ओर अब दूरियाँ ही दूरियाँ

लेकिन इस घटना से पहले
उन्होंने मेरी आजादी छीन ली थी
और फिर
साँस तक लेने के लिए हाँफती मैं
लोहे की सलाखों से घिरी थी

यह तब भी ठीक था,
उससे, जब कि उन्होंने
मुझसे मेरी बच्ची को छीन लिया था
उस दिन
सब कुछ, मेरा भविष्य तक, दूर चला गया

आप कह सकते हैं कि मेरी जिन्दगी में काफी कुछ घटा

फिर भी मैं उस दिन को याद करती हूँ
जब सेना ने मेरे देश को
सलाखों के पीछे ढकेल दिया था
लेकिन उस दिन मुझ में जबरदस्त ताकत आई
और डर चला गया

यही शुरुआत थी

निष्कासन का गीत

उन्होंने मेरी आवाज काट दी
मेरे पास अब दो आवाजें है
मेरे अपने गीतों को
दो बोलियों में उड़ेल दिया
Alicia Partnoy
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तुकाराम

बार-बार काहे मरत अभागी । बहुरि[1] मरन से क्या तोरे भागी ।।धृ०।।
ये ही तन करते क्या ना होय । भजन भगति करे वैकुण्ठ जाए ।।१।।
राम नाम मोल नहिं बेचे कवरि[2] । वो हि सब माया छुरावत[3] झगरी[4] ।।२।।
कहे तुका मनसु मिल राखो । राम रस जिव्हा नित्य चाखो ।।३।।
बार-बार काहे मरत अभागी । बहुरि[1] मरन से क्या तोरे भागी ।।धृ०।।
ये ही तन करते क्या ना होय । भजन भगति करे वैकुण्ठ जाए ।।१।।
राम नाम मोल नहिं बेचे कवरि[2] । वो हि सब माया छुरावत[3] झगरी[4] ।।२।।
कहे तुका मनसु मिल राखो । राम रस जिव्हा नित्य चाखो ।।३।।

बोले तैसा चाले । त्याची वंदीन पाउले ॥
अंगे झाडीन अंगण । त्याचे दासत्व करीन ॥
त्याचा होईन किंकर । उभा ठाकेन जोडोनि कर ॥
तुका म्हणे देव । त्याचे चरणी माझा भाव ॥
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VOL - IX/ ISSUE-X

(मार्च- अप्रेल 2016)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

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