मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मैं वाद की बात कर रही हूं तो आइडियोलोजी की भी.. काफी लम्बे अर्से से हम उस से बन्ध गए से हैं। आज भी हिन्दी कविता में गरीबी, तंगी, विद्रूपता मात्र पर लेखन करना एक बड़ी आइडियोलोजी का मानना है। कोई सन्देह नहीं कि ये बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन इनके अलावा भी और कई मुद्दे हैं, जो दबे पाँव चले आ रहे हैं, ओर एक बार करीब आएँ तो जिन्न से विशालकाय बन जाएंगे.. मसलन पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण और सबसे बढ़ कर निस्वार्थ प्रेम आदि आदि ऐसे भाव है जो हमारी नजर में रोमानटिज्म के दायरे में आते हैं, और अभी तक वहीं फँसे हैं, जबकि ये मुद्दे आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे। विशेष रूप से पर्यावरण का मुद्दा।
पिछले दिनों जब मैं नोर्वे में थी तो वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य से अभिभूत होते हुए भी जब रोगालैण्ड के कवि Helge Torvund से मिलवाते हुए उनके बारे में यह बतलाया गया कि उनकी कविताओं में लैण्डस्केप को प्रमुखता दी गई है तो मैंने मन ही मन सोचा- अरे , हम तो इस रोमान्टिज्मता से कभी के उबर गए।
रति सक्सेना
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मुझे काम है
सरल भाषा बोलना

सरल भाषा बोलना
बहुत कठिन काम है

जैसे कोई पूछे
ठीक ठीक बोलो
तुम्हारा नाम क्या है

और वह बिना डरे बोल जाए
तो इनाम है।

लीलाधर जगूड़ी

*
मेरी इच्छा है
तुम्हें दूँ झमाझम बरसात
तुम्हे दूं इतना जल
ताकि तुम्हें
"जट - जटिन" न खेलना पड़े
ताकि तुम
जी भर प्यास बुजा सको
कपड़े ढ़ो सको
नहा सको
नाव पर या नदी किनारे बैठ कर
मछलियाँ पकड़ सकों

शहंशाह आलम
*
सपना
अलसुबह
किसी पोधे पर टपकी
ओस की बूँद सा है
लगे दिन चढ़ते ही थपेडे
धुप और रेत के
कि नाम मिट जाए सपने का

दुष्यंत

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शब्द पक्ष भाषाओं के अनंत क्षितिज तक फैला हुआ है । अधिकांशत: भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है । भाषा के व्याकरण और उच्चारण शास्त्र में गहरा सम्बन्ध होता है । संस्कृत और उससे उत्पन्न भाषाओं के व्याकरण और उच्चारण शास्त्र का वैज्ञानिक विकास एवं विस्तार हुआ है । स्वर-तंत्र के विभिन्न अवयवों का जैसा अधिक और वैविध्य-सभर प्रयोग भारतीय भाषाओं में होता है, वैसा अंग्रेज़ी में नहीं होता । फेशन के तौर पर अंग्रेज़ी उच्चारण शैली में हिन्दी / भारतीय भाषाएँ बोलनेवालों को बहुधा इस बात का एहसास नहीं होता कि वे अपनी नैसर्गिक उच्चारण क्षमता को हानि पहुँचा रहे हैं। भारतीय विचार-धारा और जीवन-दर्शन के अनुसार संगीत जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य – मोक्ष – को प्राप्त करने का साधन है । संगीत नाद-ब्रह्म की उपासना है । संगीतकार / कलाकार साधक माना जाता है / होना चाहिए । उसकी साधना का अर्क ध्वनि-शिल्प / कलाकृति में प्रवाहित और प्रज्ज्वलित होता है ।

वनिता ठक्कर
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*
लकड़ियों के टाल पर
बरफ के मुलायम कतरे

स्वर्णिम स्थिरता
*
किसी की भी संगत में नहीं

नदी का पानी
लेम्पपोस्ट के नीचे
*
यहाँ
तुम्हारा घर

एक खुला
तूफानी दिन
*
बर्फ सा सफेद मैदान

अन्त रहित
आरंभ
*
जनवरी की काली रात

रोशनी से बना एक बड़ा काँच का घर
तैर रहा है

बर्फीली सुबह की ओर
*
तुम्हारी आँखों ने देखा
सीधे भीतर

तुमने सोचा कि
सब खत्म हुआ
और

छूट गया
*

Helge Torvund
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ए जनकपुर सीता को रच्यौं है विवाह
हरो हरो गोबर अंगन लिपायौ, मोतिन चौक पुराय। जनकपुर सीता...
हरे हरे बासन मंदप छायों, लौंगन गूंथ बधाय। जनकपुर सीता...
दुल्हा से दुल्हन परत भंवरियाँ, दोऊ दल बैठे आय। जनकपुर सीता...
ब्याह चलौ दशरथ कौ नन्दन, लै चलौ रथ पै चढ़ाय। जनकपुर सीता...
छोटौ सौ बीरन पकरी पलकिया, मेरी बहन कहाँ जाए।जनकपुर सीता...
तुम कूँ तौ बीरन महल अटारी, हमकूँ तौ लिखौ परदेस। जनकपुर सीता...
हमतौ रे बीरन झामे की चिरिया, रैन बसै उड़ जाये। जनकपुर सीता...
हमतौ रे बीरन खूंटे की गइया, जित हाकौं हंक जाय। जनकपुर सीता...
मय्या के रोयवेते गंगा बहत है, बाबुल के रोए सागर ताल।जनकपुर सीता...
वीरन के रोयवेते पटुका भीजें, भावज मन आनन्द। जनकपुर सीता...
जाय उतारी अयोध्या नगरी, कौशिल्या तिलक संजोये। जनकपुर सीता...

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VOL - V/ PART II

(जुलाई -  2009)

संपादक :  रति सक्सेना


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