शोक गुप्ता की कविता-शृंखला

समय बहुत कम है..

एक

समय बहुत कम है
ज़रूरी है त्वरा
मूर्खता है
किसी भी बाड़ के रोके रुक जाना
चाहे वह सम्बन्ध हों
चाहे शब्द
चाहे स्म्रतियों की प्रतिध्वनियाँ.

शब्द
और सम्बन्ध
और स्मृतियों के जंगल
समय के घनीभूत संघनन की उपज हैं
आत्मघाती है
समय का अपव्यय इनके रास्ते.

दौड़ो, तेज़ दौड़ो
तेज़
और तेज़
समय बहुत कम है...

(
अशोक गुप्ता की अन्य कविताएँ )


दुष्यंत की राजस्थानी कविता-शृंखला

सपना-(एक)

सपना
अलसुबह
किसी पोधे पर टपकी
ओस की बूँद सा है
लगे दिन चढ़ते ही थपेडे
धूप और रेत के
कि नाम मिट जाए सपने का

(दुष्यंत की अन्य कविताएँ)


शैलजा सक्सेना की कविता

क्या भूली??

खाने की मेज से
रसोई तक,
रसोई से खाने की मेज तक
कितने ही फेरे ले चुकी वो,
याद नहीं.. चलते-चलते रुकती है बीच में
भूला सा कुछ याद दिलाने की
कोशिश में स्वयं को.. क्या ढूँढ रही थी???
सब्जी काटने का चाकू
या
अपना कोई भूला सपना?? कहाँ रख कर भूल गई???
नमक की शीशी
या
अपना अस्तित्त्व?? क्या लाने उठी थी??
पानी का गिलास
या
अपनी बची -खुची ताकत?? भूली सी खड़ी रहती है कुछ क्षण,
फिर पुकार पर किसी की
चल पड़ती है
सोचना भूल कर। घूमती है उसी घेरे में,
ज़िंदगी के फेरे में..गलती

(शैलजा सक्सेना की अन्य कविताएँ)


शहंशाह आलम की कविता

न देवता न ईश्वर

मेरी इच्छा है
तुम्हें दूँ झमाझम बरसात
तुम्हे दूं इतना जल
ताकि तुम्हें
"जट - जटिन" न खेलना पड़े

ताकि तुम
जी भर प्यास बुजा सको
कपड़े ढ़ो सको
नहा सको
नाव पर या नदी किनारे बैठ कर
मछलियाँ पकड़ सकों

मेरी इच्छा है
तुम्हे साफ- स्वच्छ नगर दूँ
कुल अभियन्ता
गुणवान अमात्य-महामात्य
निष्पक्ष पत्रकार
ईमानदार आरक्षी
अच्छे सैनिक
अच्छे शिक्षक
अच्छे ग्रह -नक्षत्र
उत्सव पर्व-गाथाएँ आदि सब दूँ

चूहों-चींटियों को नायाब बिल दूं
दूं चिड़ियों को सुरक्षित वृक्ष
समुद्र को उसके नष्ट हो चुके जीव- जन्तु
तुम्हे रहने को घर दे दूं
और तीली दूं माचिस की
इस बेहद अंधेरी दिनिया में
करने को छेद
भेदने को अंधेरा

तुम जो चाहो
हो जाएं उपस्थित तुम्हारे समक्ष
तुम सोचो
मृत आँखों में आ जाए जान
किवाड़ों- खिड़कियों के
बाहर के दृश्य सारे
हो जाएं सुन्दर
आंगन में और छतों से
भाग जाएँ दुख ताकि

मेरी इच्छा है
तुम्हें सोंपूँ
कवि
संगीतकार
चित्रकार
अभिनेता और अभिनेत्री
समूची धरती और समूचा आकाश
सोमालिया और इराक
बनारस और कोहिमा
महानन्दा और मेघना
सुपात्र और कुपात्र
जरूरी और गैर जरूरी चीजें
खपरैल और फूसघर
अगल और बगल
सब कुछ -सब कुछ सौंपूं तुम्हे ही

न यक्ष- यक्षिणी
न जोगी-जोगन
न ऋषि-मुनि
न देवता न ईश्वर
...बल्कि
एक सच्चा और अच्छा मनुष्य
यदि तुम चाहो
तो सौंप दूँ!

(शहंशाह आलम की अन्य कविता)
 


महेन्द्र नेह की कविता

उनकी जब इच्छा होती है....

उनकी जब इच्छा होती है
हमें मार दिया जाता है
उन्हें अतीत के दुःस्वप्न सताते हैं
और हमारी बस्तियाँ
चुड़ैलों का डेरा बन जातीं हैं
चुड़ैल, कभी हमारे बच्चों को
उठा कर ले जाती हैं कभी बूढ़ों को
वे कभी हमारे कमाऊ पूत को
उठा कर ले जाती हैं
कभी नव ब्याहता बहू को
उनकी जब इच्छा होती है
हमें मार दिया जाता है

उनके मन में
भक्ति भाव का ज्वार उमड़ता है
और हमारी झुग्गियाँ
जल प्लावन का शिकार बन जाती हैं
हमारी लाशें पानी में फूलकर
तैरने लगती हैं और
हमारी किश्तियाँ डूब जातीं हैं
उनकी जब इच्छा होती है
हमें मार दिया जाता है
उनकी आत्मा की भूख
एक बवण्डर की तरह उठती है
हमारी रोटियाँ या तो
उड़ने लग जाती हैं थाली से
या फिर मुँह में
किरकिराने लगती हैं
उनकी आत्मा की भूख
हमारी रोटियों से नहीं बुझती
उन्हें हमारी रोटियाँ चाहिए और
झुग्गियाँ भी...
उन्हें हमारी बस्तियाँ भी चाहिए
उनकी जब इच्छा होती है
हमें मार दिया जाता है

अलाव पत्रिका से साभार

(
महेन्द्र नेह की अन्य कविताएँ )


ीलाधर जगूड़ी की कविता

बोलने से पहले

मुझे काम है
सरल भाषा बोलना

सरल भाषा बोलना
बहुत कठिन काम है

जैसे कोई पूछे
ठीक ठीक बोलो
तुम्हारा नाम क्या है

और वह बिना डरे बोल जाए
तो ईनाम है।

(लीलाधर जगूड़ी की अन्य कविताएँ)


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