प्रिय कवि
असंग घोष
तेरी हड़प नीति
तूने
सारे जल पर
अपना हक़ जताया
और आपस में बाँट ली
सारी जमीन
आकाश को भी
हथिया ही लिया
तूने
सांप की तरह अपनी
लपलपाती जिव्हा से
इस तरह जल ,
नभ ,
थल सब लील लिया
और बनाया अकस्मात्
अपना हिंदुस्तान !
आ मेरे साथ बैठ
तू
आ मेरे साथ बैठ
बीड़ी पी
फेफड़े जला
घन उठा
पत्थर तोड़
पसीना बहा
हथोड़ा – छैनी पकड़
पत्थर तराश
बना खजुराहो की
मैथुन रत मूर्तियां
अथवा
प्रेम का प्रतीक ताजमहल
और अपने हाथ कटा ,
तू
आ मेरे साथ बैठ
चिलम पी
सुट्टा लगा
फिर दोनों मिलकर
साफ़ करते हैं
बजबजाती गन्दगी
बास आये तेरे पास तक
तो बंद कर लेना
अपनी नाक
तू
आ मेरे साथ बैठ
खालिस एक फूल की
महुआ पी
फिर पोथी – पतरा छोड़
जनेऊ उतार
उससे खाल सिल
जुट जा
मेरे साथ
चमड़ा पकाने
तू
आ बैठ मेरे साथ
जूते गाँठ
पासी बन
भंगी – चूहड़ा
और चमार बन
इन कामों में
तेरी जात !
कहाँ तेरे साथ आएगी ?
तेरी धूर्तता
तूने
चुना छह दिसम्बर
उस इमारत को
ढहने का दिन
जिसे तू
सूर्य की नाक से
पैदा हुए
इक्ष्वाकु के
वंशज की
जन्म – भूमि बताता रहा ,
वहां बनी थी ,
ताकि तू मना सके
हर साल
हमारे महाशोक के
महापरिनिर्वाण दिवस पर
हमें धमकाने
अपना शोर्य दिवस !
वर्ना तू चुन सकता था
कोई और दिन
लेकिन तू
हम बहुसंख्यकों को
दबाने का मौका
छोड़ना नही चाहता था
तेरी चालों का पर्दाफाश हो चुका है
धूर्त कहीं के ।