मेरी पसन्द

सुदीप एक खूबसूरत कलाकार हैं, और मंच पर बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति देने में कुशल हैं, इस बात का परिचय मुझे 2013 में कृत्या  फेस्टीवल के दौरान हुआ था। सुदीप की कविताओं से परिचय धीरे-धीरे हुआ। वे रंगमंच और फिल्म दोनों से जुड़े रहे हैं, लेकिन उनकी ताज़ा कविताओं में समकालीन दार्शनिकता स्पष्ट दिखाई दे रही है। आज का दर्शन ज़िंदगी से जुड़ा होना ज़रूरी है, लेकिन परंपरा से भिन्न है। सुदीप की दार्शनिकता गहन है, लेकिन समकालीन है, और हमें इसी नई पहुँच की ज़रूरत है।

 

 

नीहसो (सुदीप सोहनी)

 

कितने जीवन

 

एक जीवन के साथ कितने जीवन चलते हैं

एक शरीर, एक साँस

पर चेहरे कई :

जैसे, कमरे में बैठे हुए सोचना

दूर के एकांत को

या किसी पहाड़ से डूबते सूरज को देखते, सोचना

कमरे में खुली रह गई खिड़की को

समय बाँध जाता है

बालों में पहचान का एक धागा

जीवन बीतता है

सुलझाते, महीन गाँठें

क्या कोई ऐसा जीवन है जिसमें गाँठें न हों?

दोहरापन न हो?

बहुत सारे में से थोड़ा चुनना वैसा ही है

जैसे, उतरते पहाड़ी ढलान –

सुस्ताना किसी चट्टान पर, देखना आसमान को

रुकना, ख़ुद को तोडना और आगे बढ़ना

एक साथ कई बार भागता है –

समय, हम से

हम, जीवन से

जीवन, समय से

 

2

 

चुपचाप, सुनसान में

 

फिर उठा एक शोर भीतर

किसी को भनक न हुई

उठती है भाप ज्यों समंदर से

और चिपक कर बादल बन

गिरती है बारिश-सी

किसी न सुलझ सके दुःख ने

भारी हवा-सा सफ़र तय किया, वैसे ही

चिपक गया आँख की किनोर पर जाकर

और फूटा

जन्म हुआ एक और बारिश का

रूह ने जन्नत बख़्शी एक दुःख को!

 

3

 

कहना

कुछ कहना

दरअसल कुछ कहना भर नहीं

बहुत सारे में से

थोड़ा-सा कुछ चुन लेना है

जताने के लिए

जैसे प्रेम करना

रोना

याद करना

हम कितना ही प्रेम करें

रोयेँ

याद करें

यह नहीं बता सकते

कितना प्रेम करते हैं

रोते हैं

याद करते हैं

कह सकते हैं केवल

इतने बड़े आसमान में से

एक टुकड़ा बादल चुन सकते हैं

यह बताने के लिए कि

बादल के एक टुकड़े जितना ही

सफ़ेद, नीला और सुकून से भरा है

अमापा, अनकहा

मन

 

4

 

इतना भर 

 

सामने हो मेहनतकश कोई

सम्मान से देखो

कोई अजनबी है

मुस्कुरा दो

प्रेम है

खिलखिला कर हँस पड़ो

अकेले हो

रो लो जी भर

विराट सृष्टि के करतब देख

झुक जाओ विनत हो उसके सम्मुख

देखो कोई तुतलाता बच्चा

बन जाओ नदी चहचहाहट की

5

 

याद का बहाना

(गुरुदत्त के जन्मदिन पर)

 

वह साठ का दशक था, साल उनसठ

यह इक्कीसवीं सदी है, साल दो हजार पच्चीस

‘काग़ज़ के फूल’ को बरस छियासठ हुए

क्या अब भी वहीदा रहमान करती होंगी याद गुरुदत्त को ?

‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ फ़िल्माया जा रहा था जब

ठीक पहले उसके, वहीदा के हाथों में थीं सलाइयाँ स्वेटर बुनने वाली

कुछ तो कहा होगा डायरेक्टर ने –

चेहरे को हौले उठा लेना, कसमसा लेना, कुछ न कहना

और कैमरा पकड़ लेगा जज़्बात

मग़र

चल रहा था जो मन में, क्या वहीदा करती होंगी उसे भी याद ?

समय के इतने अंतराल में

जब बह जाता है जीवन, नदी की तरह –

क्या याद भी एक कल्पना नहीं रह जाती?

अभी तो मूर्ति कर रहे थे लाइटिंग और बीम ऑफ़ रे की तैयारी

अभी-अभी तो गुरु ने हाथ पर बाँधा था पलस्तर

और किसी अस्टिटेंट ने कोट पहना बैठा दिया था डायरेक्टर कुर्सी पर

अभी-अभी तो माथे पर आई थी शिकन गुरु के

जिसके जवाब में और मिड फ़्रेम में वहीदा ने बंद की थी आँखें

गूँज रहा था पार्श्व में ‘जाएँगे कहाँ सूझता नहीं’

अभी तो उठ कर गए थे दोनों उस स्टूडियो से

अगले किसी शॉट के लिये

क्या अब भी काग़ज़ के फूल चुभते होंगे वहीदा को?

क्या कभी-कभार देख लेती होंगी टीवी पर चलता यह गीत

और अब भी बुदबुदाती होंगी

‘तुम रहे न तुम, हम रहे न हम’ !

 

6

 

तड़प कह देने की

 

कह देने की यह कौन सी तड़प है ?

क्यों

केवल कह देने भर से मन नहीं भरता?

क्यों ज़रूरी है इतना भरोसा

कि सुना जा रहा?

न सिर्फ़ सुना जा रहा

हर्फ़-हर्फ़ महसूस भी किया जा रहा?

क्या किसी भाषा में

सब कुछ कहा जा सकता है ?

सब कुछ !

एक-एक बात

एक-एक अहसास !

भरोसे को

रेगिस्तान में पानी की तरह खोजती

इस दुनिया में

क्यों यह कसक

सुने जाने की प्रतिक्रिया भी हो ?

क्यों यह बेचैनी

हर चीख़ रूह को भेद ही दे ?

सुन लिया जाना भरम है!

सच तो यह है

कहने की ज़रूरत ही न होती,

अगर सुना जा रहा होता पहले से ही !

 

7

दुनियादारी 

 

चवन्नी के समान चलन से बाहर हो चुके सिक्के की तरह

फ़ेंक देने की कवायद करने लगेंगे कई लोग

तुमने रख दिया अगर

समझदार होने का वज़न उन पर

शरीर पर उग आये फोड़े को

तुम्हारे लोचने के पहले ही

खरपतवार की तरह उग आयेंगे कई हाथ

तुमने कह दिया अगर

यहाँ लोचने से आँसुओं के लोथड़े निकलेंगे

तुम्हारा कोई थूक गलती से गिरा नहीं

कि करने लग जायेंगे कई हज़ार मुँह

उस थूक के तिनके-तिनके की ‘डाइग्नोस्टिक्स’

और, अगर तुमने कह दिया

अपने पैरों से नापना चाहता हूँ अपनी ज़मीन

तो तुम्हारे अगले ही क़दम पर

हज़ार फुट गहरे गड्ढे खोद चुके होंगे वे

अजीब तो तब होगा

जब अपनी शक़्ल ढूँढते हुए नज़रें गड़ाओगे तुम

कमीज़ में छुपे आसमान के विस्तार में

और, तब भी तुम्हें

वो कम ही लगेगा, अपनी आबरू छुपाने के लिए!

 

8

 

इस दुनिया में

 

इस दुनिया में –

धूर्त को सबसे अच्छी नींद आती है

कपटी अपने भाग्य पर इतराता है

छल करने वाला सबसे चपल जो पल में रंग बदलता है

और प्रेम कर के छोड़ने वाला सबसे सुखी रहता है

इस दुनिया में –

प्रेमी वह जो पल-पल इम्तिहान देता है

फिर भी असफल रहता है

अकेला वह जो सबके साथ खड़ा रहता है

अपने आँसू ख़ुद पोंछता है

इस दुनिया में –

कमजोर वह जो ज़ुल्म अपने पर होने देता है

सिसकता है, कुछ न कहता है

होना तो यह था कि इस दुनिया में

वही कहलाता विजेता जिसने जीत लिया मनुष्यता को

किया सामना डट कर नीचता का

मौक़ा दिया नकचढ़े अहंकार को

संहार में ख़ुद को किया पीछे

अफ़सोस

इस दुनिया में यह आदमी कायर कहलाया !

 

9

 

हिज्र

 

बारिश में खिल जाती है

वह हमेशा यह कहती है

कहा तो यह भी था

मेरी छुअन जन्म देती है उसको

क्या मैं उसके बदन पर पड़ती बारिश को

अपनी छुअन कह सकता हूँ?

 

10

 

सज़ा

 

सदियों पुरानी बात है. एक बार रात अंधेरे से परेशान थी. सवेरा तो होना ही था, पर तब तक ज़िंदगी आसान न थी. शाम से ही रात गुमसुम रहने लगी. फिर शाम ने शमा से उसकी दोस्ती करवा दी. शमा ने उसको अपना नाम मोमबत्ती बताया. रात ख़ुश हुई. उसने मोमबत्ती से कहा, ‘’मुझे कुछ ही दूर जाना है, तुम रहोगी तो सफ़र में साथ रहेगा”. मोमबत्ती ने रात से दोस्ती कर ली. दोनों एक-दूजे संगबतियाने लगे. कुछ देर बाद रात सोने लगी. मोमबत्ती ने रात को जगाये रखने की कोशिश की पर वह नहीं मानी. मोमबत्ती पिघल-पिघल कर जलती रही, रात रोशन होती रही. मोमबत्ती रोती रही, रात सोती रही. सवेरा हुआ, रात की नींद टूटी. उसने अंगड़ाई लेते हुए मोमबत्ती को देखा और पूछा “यह क्या, देखती नहीं दिन हो गया!” मोमबत्ती इधर-उधर हो कुछ ढूँढने लगी! उसने पूछा, “क्या हुआ? किसे ढूँढ रही हो?” मोमबत्ती ने कहा, “रात को”! उसने कहा, “मैं ही वह रात हूँ, पर अब बदल गयी हूँ. ‘सुबह’ हो गयी हूँ. और तुम किस दुनिया में हो, देखती नहीं दिन निकल आया है. मुझे बहुत काम पड़े हैं, तुम बुझ जाओ”.  मोमबत्ती जो पिघल कर ख़त्म हो चुकी थी, कुछ न कह सकी और इस बार गुस्से में ज़ोर से जल उठी और जलते-जलते फुक से बुझ गयी. एक काला धब्बा चमकता रह गया.

लोग कहते हैं मोमबत्ती ने रात से प्रेम कर लिया था और उस दिन के बाद से मोमबत्ती अपनी इस ग़लती के कारण जलते हुए गलती है !

 

 

परिचय : सुदीप सोहनी

भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, पुणे के वर्ष 2013-14 के छात्र. कवि, पटकथा लेखक, निर्देशक, परिकल्पक व सलाहकार के रूप में सिनेमा, साहित्य, व संस्कृतिकर्म में संलग्न। नीहसो – उपनाम से कविता लेखन। विगत वर्षों से देश की प्रमुख पत्रिकाओं, अखबार, ब्लॉग, वेबसाइट्स आदि पर कविता, गद्य तथा कला व सिनेमा सम्बन्धित आलेखों का नियमित प्रकाशन। अमेरिका के आर्कियोलॉजी चैनल द्वारा स्थापित डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के दुनिया के अनोखे ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘हेरिटेज’ पर अपनी फ़िल्मों -‘तनिष्का’ और ‘यादों में गणगौर’ के इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन और रीलीज़ पाने वाले मध्य प्रदेश के पहले और एकमात्र फ़िल्मकार। भारत, अमेरिका, यूरोप, वेस्टइंडीज और बांग्लादेश के महत्त्वपूर्ण फिल्म समारोहों में फ़िल्मों के प्रदर्शन. जनजातीय संग्रहालय, संस्कृति विभाग(मध्य प्रदेश) के लिए तैयार मध्य प्रदेश के पद्मश्री कलाकारों भूरी बाई, भज्जू सिंह श्याम, दुर्गा बाई व्याम, रामसहाय पांडे, अर्जुन सिंह धुर्वे, डॉ कपिल तिवारी पर बनी फिल्मों का लेखन व सह-निर्देशन। देश के कई शिक्षा संस्थानों में सिनेमा पाठयक्रम निर्माण और सिने कार्यशालाओं में हिस्सेदारी। एक कविता संग्रह ‘मन्थर होती प्रार्थना (2023)’ और एक मोनोग्राफ़ ‘साहित्य, सिनेमा और समय (2019)’ प्रकाशित। पहले कविता संग्रह पर मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार 2025। इसके पहले रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा जूनियर टैगोर फ़ेलोशिप भी प्राप्त है।

इन दिनों सुदीप सोहनी फ़िल्म्स के तहत भोपाल (म प्र) में रहकर स्वतंत्र फ़िल्म निर्माण ।

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