मेरी बात
कृत्या की कल्पना 2005 में साकार हुई थी, हालांकि कविता पत्रिका की जरूरत बहुत पहले से अनूभूत हुई थी। यह वह दौर था, जब भारत में इंटरनेट प्रचलित नहीं था, और दुनिया के पूर्वी देशों की कविता से पश्चिम देश लगभग अनभिज्ञ थे। कृत्या का उद्देश्य न केवल कविता प्रकाशित करना था, अपितु वैश्विक भाषाओं की कविता की वैविध्यता से रूबरू होना भी था। सबसे बड़ी चुनौती तो देश में ही थी, क्योंकि इतने भाषाओं वाले देश के साहित्य में भी अत्यधिक विविधता है। यही कारण है कि जब हमने कृत्या को काव्योत्सव के रूप में रेखांकित किया, तो हमें अपने ही देश की भाषाओं से परिचय पाना जरूरी लगा। हमने भारतीय भाषाओं की कविताओं को हिन्दी और अंग्रेजी में अनूदित करना आरंभ किया, और पश्चिम की कविताओं का हिन्दी में और भारतीय भाषाओं की कविताओं का अंग्रेजी में। कृत्या ने २००५ से २०१७ तक देश के विभिन्न भागों में जाकर देश की कविताओं का भिन्न-भिन्न भाषाओं में वाचन करवाया। कृत्या कविता पाठ को मंच तक सीमित नहीं रखना चाहती थी। हम अनाथालय, वृद्धाश्रम, जेल और स्कूल-कॉलेज जाते थे, जिससे कविता सामाजिक थेरेपी के रूप में स्थापित हो सके। कोरोना काल में भी कृत्या ने दस दिन लंबे काव्योत्सव आयोजित करवाए और कृत्या टॉक के माध्यम से दुनिया के विद्वानों और साहित्यकारों से संवाद किया।
कुछ व्यक्तिगत कारणों से कृत्या कुछ समय के लिए एक्टिव नहीं रही, लेकिन हमने पिछले तीन महीनों से हर महीने दो कार्यक्रम लेकर उपस्थित हो रहे हैं। आज वैश्विकता अनबूझी नहीं रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण हम दुनिया के हर कोने से परिचित होने लगे हैं, इसलिए हमने विचार किया कि पूरब और पश्चिम दोनों को मिलकर एक मंच पर दुनिया में शांति की गुहार लगानी चाहिए। आज जितनी दुनिया करीब हुई है, उतनी ही दूर होती जा रही है; दुनिया अनेक खंडों में बंटती जा रही है। ऐसे वक्त में साहित्यकारों, कलाकारों, विचारकों और समाज प्रेमियों का दायित्व गहराता जा रहा है। यही कारण है कि हमने ‘कृत्या पोएट्री ईस्ट एंड वेस्ट’ नामक चैनल शुरू किया, जिसमें ऑनलाइन पोएट्री मीट के माध्यम से विभिन्नता के बावजूद हमारी समानता को रेखांकित किया जाए, और वैश्विक शांति और स्नेह की ओर कदम उठाया जाए। इसलिए हमने ‘कृत्या ईस्ट एंड वेस्ट’ के नाम से चैनल आरंभ किया। साथ ही हम हर महीने एक कविता की किताब, जिसमें भाषाई वैविध्य हो, पर चर्चा करने लगे हैं।
कृत्या का पहला सत्र 14 फरवरी को संपन्न हुआ, जिसमें एक दक्षिण भारतीय भाषा के समकालीन कवि श्याम सुधाकरन, एक हिन्दी के समकालीन युवा कवि श्वेतांक सिंह के साथ ट्यूनीशिया के युवा कवि Radhouane Ajroudi ने अरबी में कविता सुनाई। हमने यह ध्यान रखा कि कविताएँ मूल भाषाओं के साथ हिन्दी और अंग्रेजी में अनूदित हों, जिससे वे अधिकतर पाठकों तक पहुँच सकें।
भारत में इतनी भाषाएँ हैं कि पश्चिम को भारतीय कविता की नब्ज पकड़ना कठिन लगता है; इसलिए कृत्या के दूसरे सत्र में 7 Mar 2026 को “Perennial: The Red River Anthology of 21st Century Hindi Poetry” पर संवाद हुआ, जिसमें प्रकाशक कवि दिव्यज्योति शर्मा, संपादक द्वय सौरव राय और तुहिन भोवाल के साथ दो प्रकाशित कवियों लवलीन गोस्वामी और सुधीर रंजन सिंह ने कविताएँ सुनाईं। यह प्रस्तुति इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि इस किताब में कवियों को नामचीन होने की दृष्टि से नहीं, अपितु कविता की विभिन्नता की दृष्टि से चुना गया है। अनुवाद इस पुस्तक की दूसरी विशेषता रही। इस पुस्तक पर चर्चा करने का उद्देश्य हिन्दी भाषा के साहित्यिक वैविध्य पर चर्चा करना भी था।
तीसरा सत्र पुनः कविता पाठ का था। इस बार हमारे साथ अमेरिकन रूसी कवि Philip Nikolayev, कन्नड़ भाषा से रमेश आरोली (Ramesh Aroli) और हिन्दी से सरफराज आलम की कविताओं का पाठ हुआ। यही कृत्या की सफलता है कि हम देश के दक्षिण को उत्तर से जोड़ते हैं और पश्चिमी देशों के वक्तव्य को प्रस्तुत करते हैं। इस सत्र में हमें बेहतरीन कविताएँ सुनने को मिलीं।
चौथे सत्र में रीता कोठारी की किताब “कहे लतीफ” पर चर्चा हुई। यह बहुत महत्वपूर्ण सत्र था, क्योंकि सिंधी साहित्य और भाषा को लगभग भुला ही दिया गया है। ऐसे में महत्वपूर्ण शायर लतीफ को प्रस्तुत करना और उनके लेखन के बारे में संवाद करना महत्वपूर्ण रहा।
पांचवें सत्र में हमारे साथ एलिसिया माबेल पार्टनॉय (अर्जेंटीना/अमेरिका) रहीं, जो एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवि, कॉलेज प्रोफेसर और अनुवादक हैं।12जनवरी 1977 को अर्जेंटीना की उस महिला को, जिसे 1979 में अर्जेंटीना के तानाशाही शासन की सेना ने यातना शिविर में कैद कर लिया था, लगभग तीन साल बाद देश निकाला दिया गया। अमेरिका में शरण लेते हुए उन्होंने जेल में अपने साथ हुए अमानवीय व्यवहार के बारे में लिखा। कवि, विद्वान और मानवाधिकार कार्यकर्ता एलिसिया पार्टनॉय ग्यारह पुस्तकों और एक कविता चैपबुक की लेखिका, अनुवादक या संपादक हैं।
फ़लीहा हसन (इराक-अमेरिका) एक कवि, शिक्षक, संपादक, लेखक और नाटककार हैं, जिनका जन्म 1967 में नजफ़, इराक में हुआ था और जो अब संयुक्त राज्य अमेरिका में रहती हैं। फलीहा इराक में बच्चों के लिए कविता लिखने वाली पहली महिला थीं। उनकी शायरी में युद्ध की भयावहता के साथ-साथ मानवता भी दिखती है। वह युद्ध के खिलाफ एक सशक्त आवाज़ हैं।
प्रफुल्ल शिलेदार (मराठी-भारत) समकालीन मराठी कविता में एक प्रमुख आवाज़ हैं। उनकी शायरी में जुल्म के खिलाफ विरोध के स्वर स्पष्ट हैं।हेमंत देवलेकर (हिन्दी-भारत) कविता और रंगमंच के बीच सामंजस्य बिठाते हुए सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविता रचते हैं। वह कविता और रंगमंच दोनों क्षेत्रों में एक स्थापित युवा कवि हैं।
यह सत्र न केवल विविधता के साथ-साथ कविता के मानवीय पक्ष और उसके थेरेपी स्वरूप को भी प्रस्तुत कर रहा था।
छठा सत्र इसलिए महत्वपूर्ण रहा कि इसमें आदिवासी कविता के संग्रह “An Unanswered People: An Anthology of Contemporary Adivasi Poetry from India” (Setu Prakashan, 2025), जिसका संपादन कांजी पटेल ने किया था, पर संवाद हुआ। इस संकलन में ३५० कवियों की ३६० कविताएँ संग्रहित हैं। संवाद में कांजी पटेल के साथ माधव टोप्पो (Kudukh poet), T. Keditsu (Angami poet) और अनुवादक Ardra Neelakandan Girija ने भाग लिया। आदिवासी मूल भाषा की कविताओं ने अचंभित किया। विशेष रूप से माधव टोप्पो जी से एक नई दुनिया की पहचान हुई।
6 जून 2026, पुनः कवियों का समागम हुआ। इस बार हमारे साथ थे Rei Berroa (Dominican Republic), जिनकी कविताओं में शैली के साथ राजनीतिक विषयों पर तीखा व्यंग्य है; उनकी कविता वैचारिक विस्तार लेती हुई समाज और राजनीति पर तंज रचती हुई भी कभी अपनी धार नहीं छोड़ती। साथ में थीं Carolina Rivera Escamilla (El Salvador), जिनकी कविताओं में निर्वासन का दर्द है, लेकिन दुनिया के सम्मुख सवाल भी हैं। अल सल्वाडोर मध्य अमेरिका का बेहद खतरनाक देश माना जाता है, वहां से बच्चों का अनजाने देश में पलायन भी कम दर्दनाक नहीं है। असम के नीलिम कुमार देश के प्रसिद्ध कवि हैं, लेकिन जो अन्य कवि हमारे साथ थे, वे एक सर्जन हैं, और उनकी कविताओं में दर्शन की जो गंभीरता दिखाई देती है, वह अचंभित करती है। एक गंभीर चिंतन उनकी कविताओं का मूल स्रोत है।
20 जून , हमने एक विशिष्ट पुस्तक पर संवाद किया, जिसका नाम यापन चित्र है। यह एक अद्भुत किताब है, जो कोलकाता स्थित ‘यापनचित्र फ़ाउंडेशन’ द्वारा प्रकाशित 423 पन्नों का एक शानदार संग्रह है। 350 से ज़्यादा कविताओं, निबंधों और साक्षात्कारों वाले इस अंक में 22 अंतरराष्ट्रीय कवियों की रचनाएँ शामिल हैं। इसमें मिस्र, इराक और रूस की कविताओं के लिए खास हिस्से हैं, साथ ही हिंदी, कन्नड़, मलयालम, नेपाली, पंजाबी, संताली और तेलुगु भाषाओं में समकालीन भारतीय कविता की व्यापक प्रस्तुति भी है। साहित्यिक चयन और अनुवाद के क्षेत्र में यह एक दुर्लभ उपलब्धि है; यह अंक न केवल संग्रह करने लायक एक बेहतरीन चीज़ है, बल्कि समकालीन विश्व कविता का एक जीवंत उदाहरण भी है।
कृत्या के बुक टॉक में प्रबल कुमार बसु, और औषनिक घोष के साथ संवाद हुआ, जिसमें उन्होंने यापन चित्र की साहित्यिक यात्रा के बारे में संवाद किया। औषनिक घोष ने अनुवाद कार्य पर विस्तार से संवाद किया। उनकी यात्रा साहित्य के अनुवादकों के लिए महत्वपूर्ण है। दुर्गा प्रसाद पंडा जी ने कविता पाठ किया। पबल जी औेर दुर्गा प्रसाद पंडा जी की कविताओं के हि्दी अनुवाद का भी पाठ हुआ। कमलाकर भट्ट जी ने गोष्ठी का संचालन किया़।
कविता के सभी कार्यक्रमों का संयोजन प्रसिद्ध कवि और अनुवादक कमलाकर भट्ट जी कर रहे हैं, जो बड़ी शिद्दत से कवियों की तलाश करते हैं और उन्हें प्रस्तुत करते हैं, जरूरत पड़ने पर अनुवाद भी करते हैं। अधिकतर हिन्दी अनुवाद बृजेश सिंह ने किए हैं, वे कृत्या के सहयोगी रहे हैं।
होस्ट होने के कारण मेरा भी थोड़ा योगदान है।
हम चाहते हैं कि अधिकतर लोग कृत्या के इस परिश्रम का लाभ उठाएं। आगे भी कार्यक्रम होते रहेंगे, आप उन्हें देखिए और समकालीन कविता से जुड़िए।
रति सक्सेना