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एच. एस. शिवप्रकाश
अनुवाद रति सक्सेना
कवि एक जिद्दी लेकिन भाग्यहीन तीर्थयात्री है
कवि एक जिद्दी लेकिन भाग्यहीन तीर्थयात्री है
जिसकी महत्त्वाकांक्षाओं से भरी यात्राएं हमेशा विफल हो जाती हैं
चाहे लक्ष्य कुछ भी हो, वह वहां पहुँच नहीं पाता है
उसके भाग्य में कहीं और भटकना लिखा है
यद्यपि वे देवताओं, ऋषियों और देवदूतों की स्तुति करते हैं
लेकिन उनके लिए नरक का द्वार ही खुल पाता है
यीट्स अपने प्यार मेड बीथ (Maud Gonne) को पाना चाहता था
लेकिन उसके भाग्य में तो पत्थर की मूर्तियां ही थीं
कविता वह नदी है, जो कभी सागर तक नहीं पहुँच पाती
चाहे झरना हो या नदी, वे सदैव प्रकृति के अधीन हैं
कवि समस्त क्रांतियों का सहोदर है
जिसकी जलती हुई महत्वाकांक्षाएं छीन ली जाती हैं
प्रेमी जो सदैव साथ रहने की कसमें खाते हैं
वे रहस्यमय तरीके से बिछड़ जाते हैं
कवि भाग्य को चुनौती देता है कि मैं तुम्हें पा लूंगा
असफलता का सच्चा साधक, वह हमेशा नकारा गया है
शिवप्रकाश के दिल का भाग्य ही इंतज़ार है
अब वह स्वयं एक मूर्ति है, वह उसी से संतुष्ट है
यह नदी देश है
मैं सपने में इसमें प्रवेश करता हूँ
यहाँ असंख्य नदियां हैं
हर किसी के अपने गीत, खुशबू
और स्वाद हैं
जो पूरी जमीन में पसरे रहते हैं
अनेक बार एक दूसरे को काटते हुए
आपस में स्वाद, खुशबू और गीत बांटती हैं
वे साथ बहना हमेशा जारी रखती हैं
उनमें मुड़ाव हैं, नृत्यांगना के मार्ग सरीखे
सदैव वही जल-नृत्य
लेकिन मैं अचंभित हूँ, वे कब
सागर तक पहुँचेंगी, अपने लक्ष्य तक
वे जल-गीतों में जवाब देती हैं
हम मीठे जल में बहती हैं, समुद्र के लिए
पूर्णतः उपयुक्त हैं,
और नमकीन समुद्र हमारा लक्ष्य ही नहीं है
ओडिसियस कहता है
मेरे किसी भी ज्योतिषी अथवा
या फिर पंडित को मालूम नहीं था कि
मैं कब अपने देश लौटूंगा
विजित किन्तु नष्टप्राय
पहचान में भी नहीं आ पाने वाला
असंख्य रुकावटों और उम्र के कारण
कोई भी मुझे पहचान नहीं पाएगा
मेरी पत्नी इंतज़ार कर कर के थक गई होगी
मेरा बेटा टेलीमैकस
मुझे पहचान नहीं पाएगा
न ही मेरी प्रजा पहचान पाएगी
हालांकि मैं कोशिश करूँगा कि उन्हें समझाऊं कि
मैं ही महान ओडिसियस हूँ
जिसने अनदेखे ट्रॉय को ध्वस्त किया
उनमें से कोई भी विश्वास नहीं कर पाएगा
सिवाय उस धाय के, जिसने मुझे बचपन में दूध पिलाया था
अपनी जीर्णता के बावजूद
हाँ, बस मैं ही जानता हूँ कि
यह सब कैसे होगा
बस मेरा प्रिय देश इथाका रहे
जब मैं वापस लौटूँ
हो सकता है कि शायद वह भी न रहे
वापस आऊंगा
एच. एस. शिवप्रकाश
कर्नाटक के एक जाने-माने कवि और नाटककार हैं। वे कन्नड़ में लिखते हैं, लेकिन उनकी कई रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी और भारत की दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में किया गया है। लेखक होने के साथ-साथ, वे दुनिया भर में घूमकर साहित्य, कला और कई तरह की रहस्यवादी और भक्ति परंपराओं पर अपने विचार भी साझा करते हैं।
शिवप्रकाश ने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते हैं, जिनमें चार कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार शामिल हैं। उन्हें कर्नाटक नाटक अकादमी पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला है। शिवप्रकाश आयोवा यूनिवर्सिटी के ‘स्कूल ऑफ़ लेटर्स’ के मानद फेलो भी हैं।