प्रिय कवि

दीप्ति कुशवाह

 

 

रेत का कण

 

जहाँ चाहती है हवा
उड़ा ले जाती है
लहरें बहा ले जाती हैं
पग रौंदते हैं
मुट्ठियाँ भींचती हैं
बहता है, बिखरता है…
रहता है।

 

सर्वेऽपि सूक्ष्माः प्रभाववन्तः भवन्ति
शंख में पड़े तो नाद बन जाए
सीप में गिरे तो मोती बने

 

मिट्टी में घुले तो मिट्टी
पर किसी आँख में गिर जाए
तो पहाड़ हो जाता है।

 

चींटी

 

रास्ते पर नहीं, रेखा पर चलती है
खाँच में, दरार में, सलवट में समा जाती है
सबसे हल्का अन्न उठाती है

 

एक पैर आगे रखती है
फिर दूसरा बढ़ाती है
क्षणे-क्षणे लक्ष्यं साध्यते

 

धीरे-धीरे, अविचल
एक दिन सुमेरु पर चढ़ जाती है।

 

 बुलबुला

 

हवा से हल्का
क्षण से भी छोटा जीवन
बनता है, मिट जाता है
फूँक से ही हो जाता है ध्वस्त

पर इसमें समाया रहता है
समूचा आकाश
सूरज के छूते ही कौंध उठता है
सात रंगों वाला इंद्रधनुष
बुलबुले के अंदर

 

अणोरणीयान् महतो महीयान्
जो क्षणभंगुर है
वही कभी अनंत का दर्पण बन जाता है।

 

शून्य

 

न आदि, न अंत
न रूप, न आकार
शून्य में सब कुछ समाय
शून्य से ही सब उपजा
अखंड, अविनाशी, अयोनिज
सर्वं सूत्रेण प्रोतम्
सृष्टि का सूत्र अदृश्य है
किन्तु समस्त ब्रह्मांड उसी में गुंथा है

 

स्वत: शून्य का नहीं है मोल
पर जुड़ते ही संख्या से
मूल्य को कर देता है दस गुना।

 

किरच

 

एक झपक में टूटी
पर पूरी रही
जो थी, वह नहीं रही
खंड-खंड होकर भी पूर्ण है वह
नष्टोऽपि नाशं याति
संपूर्ण का अंश
और स्वयं में संपूर्ण है

 

सत्य की किरच
जब हृदय में धँसती है
तो आँखों में रक्त उतर आता है।

 

गौण

 

बूँद समुद्र नहीं
पर खारापन उसी में है
धागा वस्त्र नहीं
पर बुनावट उसी पर टिकी है
अक्षर अर्थ नहीं
पर वाक्य उसी से जन्मता है

 

अव्यक्तं व्यक्तिकारणम्
जो गौण है, वही आधार है
मुख्य की छाया में खोया
पर बिना इसके कुछ भी पूर्ण नहीं।

 

नाखून

 

काट दो, फिर उग आएगा
झरेगा, मिटेगा, पर बढ़ता ही रहेगा
कभी व्यर्थता की उपमा
तो कभी अस्तित्व का प्रमाण

 

विवशता में कुंद
क्रोध में धार
संरक्षण का प्रथम कवच है
आक्रमण का सहज है अस्त्र
स्नेह में कोमल, प्रतिशोध में प्रखर

 

सुप्ते जाग्रति दुर्जयः
शांत में तीक्ष्णता निहित है
अस्तित्व तुच्छ
पर आघात करने को पर्याप्त।

 

सुई

 

सूक्ष्म, पर अविछिन्न
अस्तित्व में रिक्ति
रिक्ति में भराव
छेद में संयोग

 

धागा गुजरता है
चादर आकार लेती है
वस्त्र साँस लेते हैं

 

नालं सूक्ष्मपि अपहासाय
सुई खो जाए
तो धागे बिखर जाते हैं
और बिन धागे
सब कुछ उघड़ जाता है।

 

सूक्ष्मता

 

लघु, पर प्रभावी
दृष्टि से ओझल
पर संतुलन बदलने को पर्याप्त

 

जब तुला पर रखा जाता
पलड़ा झुक आता है
दूसरी ओर सब कुछ हल्का पड़ जाता
सूक्ष्मं अपि महज्ज्ञेयम्
सूक्ष्मता का अपना भार होता है।

 

आँसू

 

बूँद
जिसके खारेपन में
समंदर समाया रहता है
आँखों से बह कर हो जाता अनमोल
पलकों पर ठहरे तो मन वजनी

 

तैलं तिलेषु गुह्यत्वात्
जैसे तिल में छिपा रहता है तेल
वैसे ही हृदय में छिपा रहता है आँसू
आँसू से भारी नहीं कोई ऋण।

 

ओस

 

न रंग, न गंध, न स्वाद
तृण की नोंक भर अस्तित्व है
अभी ठहरी, अभी लुप्त
छू लो उंगलियों से
भर न सकोगे अंजुरी में
स्पर्श संभव है, स्वामित्व नहीं।

 

न हि द्रव्यं वशीकर्तुम् शक्यम्
ओस को पाया जा सकता है
खरीदा नहीं जा सकता।

 

अणु

 

कहाँ से आया, कोई नहीं जानता
दृष्टि से परे
रूप-आकार से मुक्त
हर सृजन का आधार है
दीपस्य तीक्ष्णता तैलबिंदौ
रचना की इकाई
बंधे तो जीवन
टूटे तो विनाश

 

अज्ञात की उपस्थिति
सूक्ष्मता की पराकाष्ठा है
पर विस्तार में ब्रह्मांड के समतुल्य।

 

1. सर्वेऽपि सूक्ष्माः प्रभाववन्तः भवन्ति (सभी सूक्ष्म वस्तुएँ प्रभावशाली हो सकती हैं।)


2. क्षणे-क्षणे लक्ष्यं साध्यते – (क्षण-क्षण से लक्ष्य प्राप्त होता है)


3. अनोरणीयान् महतो महीयान्

(जो अणु से भी सूक्ष्म है, वही महान से भी महान है।)


4. सर्वं सूत्रेण प्रोतम् (सूत्र में बंधी सूक्ष्मता ही संपूर्णता को जोड़ती है।)


5 नष्टोऽपि नाशं यातिका अर्थ है—जो नष्ट हो चुका है, वह भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता।


6अव्यक्तं व्यक्तिकारणम् जो अव्यक्त (अदृश्य, अप्रकट) है, वही व्यक्त (प्रकट) का कारण होता
है।


7 सुप्ते जाग्रति दुर्जयः- जो सुप्त (शांत, निष्क्रिय) दिखता है, वह जाग्रत (सक्रिय) होने पर अजेय
बन जाता है।


8 नालं सूक्ष्मपि अपहासाय (सूक्ष्म चीज़ भी उपेक्षणीय नहीं होती।)


9 सूक्ष्मं अपि महज्ज्ञेयम् सूक्ष्म भी महान रूप में जानने योग्य है।


10 तैलं तिलेषु गुह्यत्वात् – जैसे तिल में छिपा रहता है तेल


11न हि द्रव्यं वशीकर्तुम् शक्यम् का अर्थ है— पदार्थ को अपने वश में करना संभव नहीं है।


12, “दीपस्य तीक्ष्णता तैलबिंदौ— (दीप की प्रज्वलन शक्ति तेल की एक बूँद में होती है।)

 

दीप्ति कुशवाह
काव्य संकलन ‘आशाएँ हैं आयुध’ को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘संत
नामदेव पुरस्कार’, निबंध संग्रह ‘गही समय की बाँह’ को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार’, प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उपस्थिति.
लोककला में प्रचुर लेखन और पुरस्कार, लोक चित्रकला पर एक पुस्तक – ‘मोतियन चौक
पुराओ’,
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से लोककला में सीनियर फेलोशिप, कई एकल
कला प्रदर्शनियां.
राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर आधारित कोलाज प्रदर्शनी ‘तस्वीरें बोलती हैं’ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नयी दिल्ली में. दैनिक भास्कर, नागपुर अंतर्गत कुछ वर्ष संपादन.

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