प्रिय कवि

जितेन कुमार दास

 

फातिमा शेख

 

चारदीवारी में क़ैद
एक पूरी सदी की चुप-
जहाँ लड़कियों की किताबें
सिर्फ़ कुरान की आयतों तक सीमित थीं,
और धूप भी परदों को चीर
अंदर आने से हिचकती थी।

 

उसी अँधेरे में
एक स्त्री उठी-
सावित्री की लौ से लिपटी।
जिसने दीवारों से कहा,
“इल्म हर रूह का हक़ है।”

 

उसने दरवाज़े खोले
उन बेटियों के लिए
जिनके कदमों में सदियों की मिट्टी
और आँखों में उजाले की भूख थी।
जब उसने कहा-
“दिनी तालीम हासिल कर कोई,
डॉक्टर, इंजीनियर बन सकता है क्या?”
तब-
पत्थर पड़े, ताने पड़े-
पर वह चलती रही,
जैसे चलती है कोई नदी
पथरीली धरती को चुनौती देते हुए।

 

और आज-
उसी राह पर आगे बढ़ती
सोफिया कुरैशी जैसी लड़कियाँ
आसमाँ की कमान थामे खड़ी हैं;
सेना की वर्दी में,
फ़ैसलों की मेज़ पर,
नेतृत्व के मोर्चे पर।

 

वे हर कदम पर कहती हैं-
“अगर वह एक चिंगारी न जलाती,
तो हम यह फ़लक कैसे छूते?”

 

“फातिमा”-
तुम पहली रोशनी थीं,
और तुम्हारी रोशनी से ही
आज पूरी एक क़ौम
अपने सपनों की ऊँचाई लिख रही है।

 

मिट्टी किसकी ?

गंदे नाले में उतरता वह
कीचड़ से सना हुआ आदमी
हम सबके फेंके हुए कल की
दुर्दशा साफ करता है।

 

ऊपर खड़ी भीड़-
बस तमाशा देखती है,
जैसे उसकी पीठ पर चढ़ा बोझ
उनके शहर का नहीं,
किसी और दुनिया का हो।

 

हम तो गुजरते हुए
नाक पर रुमाल रख लेते हैं,
और वह-
उसी नाले में उतरकर
सभ्यता की बदबू को
अपनी मेहनत से धोता है।

 

पर देश का रिवाज़ देखिए-
स्वच्छ भारत का मंच
उन सितारों को जाता है
जो एयर-प्यूरीफायर की हवा में जीते हैं
और बोतलों का पानी भी
विदेशों से पीते हैं।

 

वहीं असली नायक-
गुमनाम, अनसुना, अनदेखा-
हर दिन शहर की सांसें बचाते हुए
चुपचाप डूबा रहता है।

 

काश,
एक दिन सरकार
उनमें से किसी एक के हाथ में
सम्मान का दीप थमा दे-
ताकि उसके बच्चों को भी लगे
कि उनके पिता का पसीना
कीचड़ नहीं,
देश की आत्मा को साफ करने वाली
पवित्र मिट्टी है।

 

 

बाज़ार में मज़दूर

 

भोर की धूल अब भी कपड़ों में बसी है,
आँखों में रात का अधूरा अंधकार तैर रहा है।
आज हम फिर लौटे हैं –
दिन की कड़ी धूप और बाज़ार की ठंडी नज़रों से गुजरते हुए।

 

हर सुबह जैसे पुनर्जन्म हो,
हर दिन एक नया यज्ञ –
जहाँ हम अपनी देह को आहुति बनाते हैं,
रोटी के नाम पर जलने के लिए।

 

नगर के चौराहे पर,
मनुष्य का मेला लगता है –
सैकड़ों आकृतियाँ, एक ही प्रतीक्षा में,
किसी हाथ के इशारे पर
अपने श्रम का सौदा करने को तत्पर।

 

“साहब, जो कहिए – कर देंगे,
पत्थर तोड़ देंगे, नदियाँ मोड़ देंगे,
बस काम दे दीजिए,
भूख अब तर्क नहीं समझती।”

 

पीछे से एक और स्वर उठता है –
“कल कुल्हाड़ी चाहिए थी न बाबूजी,
आज कुदाली भी कांधे में है,
मिट्टी खोद दूँगा,
बस दो रोटी की जमीन दे दो।”

 

फिर एक तीसरा काँपता गला –
“बाबू, बच्चा बीमार है,
घर में धुआँ नहीं उठा कल से,
जो दोगे वही काफ़ी होगा,
बस आज कोई काम मिल जाए।”

 

साहब ठहरता है कुछ क्षण,
नज़र दौड़ाता है भीड़ पर,
मापता है देह की हड्डियाँ,
तौलता है थकान और भूख का अनुपात।
फिर नज़र फेर लेता है –
जैसे इंसान नहीं, वस्तुएँ हों सब।

 

और चला जाता है –
कंधे पर अहंकार का कोट झटकते हुए,
किसी हृष्ट-पुष्ट आदमी की तलाश में,
एक हृष्ट-पुष्ट मजदूर की तलाश में।

 

“बाबा… मैट्रिक दिला दो”

 

शाम की लाली
मज़दूर बाप की पीठ पर
ऐसे चिपकी थी
जैसे दिन भर का सूरज
उसकी हड्डियों को नोचकर थक गया हो।

 

दरवाज़े पर पहुँचते ही,
धूल का एक छोटा बादल उठा,
और वहीं ठहर गया –
मानो घर की गरीबी
खुद उसके कंधे पर आकर बैठ गई हो।

 

बिटिया दौड़ी आई,
हाथों में रिज़ल्ट ऐसे पकड़कर
जैसे कोई चिड़िया
अपनी पहली पंख संभाल रही हो।

 

वो चमकती आँखों से बोली-
“बाबा… आठवीं पास होइ गेली!
देख, हमर नाम…हमर नंबर!”

 

बाप ने कागज़ ऐसे उठाया
जैसे किसी ने हथेली पर
आसमानी धूप रख दी हो।
उसे उलट-पुलट देखता रहा –
पढ़ न सकने का दर्द
उसकी मुस्कान में छिपा था।

 

और फिर उसने हँसकर कहा-
“बहुत बढ़िया बिटिया…
अब तो तोर ख़ातिर
कोन्हो राजकुमार खोजे पड़तय।”

 

बिटिया का चेहरा
जैसे धूप से छाँव में गिर गया।
खुशी का पंछी
वहीं थककर बैठ गया।

 

धीरे से बोली –
“बाबा… ई सब बाद में।
पहिले हाई स्कूल में नाम लिखवाइ दे …
हम मैट्रिक करबइ।”

 

बाप के अंदर
दो तूफ़ान उठे –
ऐसे जैसे सूखी खेत में
अचानक दो बिजली कौंध गई हो।

 

पहिल डर-
दहेज़ का काला बादल:
“लड़की जितना पढ़ी,
उतना पढ़ा-लिखा लड़का चाही…
और जेतना पढ़ल लड़का,
उतना भारी दहेज!
हम कि बेचब –
गाय, जमीन, कि अपन-आप के ?”

 

दूसर डर –
इज़्ज़त का कांपता दीपक,
“मिडिल तक त गाँवें में पढ़ली।
अब पाँच कोस दूर हाई स्कूल!
सड़के सुनसान, निगाहें ज़हरीली…
कहीं एक छींटा भी पड़ गया
तो गाँव वाले
हमरी चौखट को भी अपशगुन कह देंगे।”

 

बिटिया की आँखें
अचानक भर आईं।

 

वो काँपते स्वर में बोली –
“बाबा…
हमर ख्वाब
कोन्हो बदनामीक कुइयाँ में
काहे डालल जाइ रहल हे ?
हम पढे खोजे ही …
काहे हमर किस्मत
दहेज़ेक बोरी में तौलल जाहे ?”

 

उस पल
बाप ने पहली बार
अपनी बेटी की आँखों में
डर नहीं-
एक पूरा उजाला देखा।
वो उजाला
ठीक वैसा था
जैसे फटी झोपड़ी की दीवार से
सुबह की पहली किरण
जिद्दी होकर अंदर चली आती है।

 

बाप की आवाज़
थोड़ी टूटी, थोड़ी पिघली-
पर बहुत मजबूत होकर निकली-

 

“बिटिया… तोञ पढ़।
दुनिया से लड़तो –
तोर बाप।
हमर गरीबी थइक सको हे …
पर हाम आपन बेटीक सपना
नाइ थके देबइ ।”

 

सरकारी सेवा में रत, युवा लेखक

1 Comment

  • अजय यतीश, बोकारो झारखंड
    January 1, 2026

    जीतेन दास की कविताएं अक्सर पढ़ता रहा हूं। इनकी कविताओं में झारखंड के मिट्टी की महक है।इस युवा कवि में अपार संभावनाएं हैं। जीतेन की कविताएं मुझे प्रभावित करती हैं। जीतेन जी को बहुत-बहुत बधाई।

Post a Comment