प्रिय कवि
अजंता देव
अजंता की इन कविताओं को मैंने उनके मुंह से बेहद अनौपचारिक काफी बैठक के दौरान ही सुना था। ये कविताएं न व्यक्तिगत पीड़ा की उपज हैं, न राजनैतिक दवाब से। मुझे लगा कि ये कविताएं अपनी अन्तिम पंक्ति में ताओ की तरह जीवन सूत्र दे रही है, जो आज हम सब की मानसिक आवश्यकता बन गया है। मैंने अजंता से आग्रह कर के तुरन्त इन कविताओं को कृत्या के लिए सुरक्षित कर लिया। पाठक पढ़े और समझे की कविता जीवन को किस तरह से समझने में मदद करती है।
1
मेरा कंठ सूख गया
जीभ लटपटाने लगी
किताब के आखिरी पन्ने के बाद
और क्या कह दूं
कि उसे समझ आ जाए
यह पृथ्वी उसकी नहीं
यह जीवन उसका नहीं
यह प्रेम
यह घृणा
यह दृश्य उसका नहीं
इधर उधर से बटोरा यश और धन
नहीं है उसका
तभी
एक
आवाज़
आई
“छोटे पात्र में तेज़ धार से पानी डालने पर पात्र खाली ही रहेगा। उसे कहो कि यह तौलिया उसका नहीं है “
2
मैने अलाव जलाया
मशाल लिया हाथ में
वह मेरे पीछे था
इस जंगल से अनजान
पेड़ घने थे
अंधेरा उससे भी घना
उसकी चाल धीमी थी
मैने लहकती मशाल थमा दी उसके हाथ में
मुझे लगा था उसे अब रास्ता साफ़ दिखेगा
लेकिन वह गिर पड़ा
तभी
एक
आवाज़
आई
” तेज रोशनी की चौंध से दिखना बंद हो सकता है। उसे मशाल नहीं , तीली पकड़ाओ “
3
मैने उसे भोजन दिया पुष्टिकारक
उसने उल्टी कर दी
कहा ये क्या परोसा है
तभी
एक
आवाज़
आई
“गरिष्ठ कुछ नहीं होता हाज़मा ख़राब होता है। उसे खिचड़ी खिलाओ।
4
मैं अभिभूत थी
कि वह बदलाव की बात करता है
वह बदल देगा कविता
वह बदल देगा इतिहास
वह बदल देगा समाज
उसके तेवर ही नहीं
उसके विचार तक बदलाव की गवाही देते हैं
मैने कहा मुझे विश्वास है तुम लाकर रहोगे बदलाव
तभी
एक
आवाज़
आई
” दुनिया बहुत बड़ी है और विचार अनेक,उसे कपड़े बदलने को कहो “
5
वह कसमसाता रहता था
अक्सर दोनों हाथ मुट्ठी में बांध कर
पुकार उठता – मैं यायावर हूं
मुझे लगता अब निकला कि तब निकला
एक ऐसी ही सुबह
मैने दिल कड़ा किया और कहा
चलो शहर की सीमा तक मै भी चलती हूं
आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही पूरी करनी है
तभी
एक
आवाज़
आई
” यायावर भीतर यात्रा करता है,उसे कहो सामने के बगीचे में टहलने से शुरू करे “
6
क्या होगा पृथ्वी का
उसने कहा मुझसे
जब आबादी बढ़ गई है मनुष्य की
घट गई है पशुओं की
मैने भी चिंतित होना शुरू किया
आशा भरी नज़र से देखा उसे
यह ज़रूर कोई योजना बना चुका है
हर्षितिरेक से मेरा गला भर्रा गया
तुम क्या करोगे धरती के बोझ को कम करने के लिए
तभी
एक
आवाज़
आई
” प्रकृति प्राणियों पर नहीं,प्राणी प्रकृति पर निर्भर है। उसे कहो अपना वज़न कम करे “
7
लूप
वह लड़ाई को उत्सुक
तलवार भांजने को तैयार हो गया था
उसके आसपास शत्रु ही ही करते नाच रहे थे
उसने निकाल लिए थे अपने अस्त्र और शास्त्र
मुझे भरोसा था कि जीतना चुटकियों का काम है
आख़िर उसके शौर्य पर मुझे कोई शक न था
लम्बे अरसे से उसके शत्रु उस पर ओछे वार करते आए हैं
और वह उन्हें मित्र की बदमाशी कह कर भूलता रहा है
मैने कहा तुम जन्मजात वीर हो
शत्रु चाहे जितना भी गिर जाए तुम पराजित नहीं हो सकते
तभी
एक
आवाज़
आई
” वीरता जन्मजात गुण नहीं ,सामने वीर हो तभी वीरता प्रकट होती है । उसे कहो कि वह कभी कभी पड़ोसियों से झगड़ा कर ले “
8
क्या वह असुंदर था ?
अगर उसे लगता था ऐसा
तो वह असुंदर ही होगा
वरना वह क्यों मेहनत करता रहता है
छवि सुधारने के लिए ?
मुझे उसकी मदद करनी चाहिए
सुनो !
तुम्हें ऐसी कविता लिखनी चाहिए
जो लोगों को लुभाए
तुम्हें अपना घर ऐसे सजाना चाहिए
जैसे तुम अतिथि की प्रतीक्षा में हो हरदम
तुम्हें बहुत महंगे फ्रेम में जड़वाना चाहिए सबसे पहले पुरस्कार का प्रमाणपत्र
तभी
एक
आवाज़
आई
“छवि हमेशा दूसरे बनाते हैं , कोई अपनी छवि नहीं बना सकता। उसे कहो वह फलों की टोकरी पर चिपकी चमकीली फ़र्रियाँ हटाए। फल ख़ुद ही सुन्दर होते हैं”
9
वह कई दिनों से परेशान घूम रहा था
जलती आँखें
सूखे होंठ
सिगरेट के टोटों से भरी एक पुरानी राख़दानी
क्रान्ति के अधलिखे गीतों के पन्ने
गरम हवा में उड़ते
मैं धक से रह गई
ये क्या पागल होने को है अब ?
मैंने उसे झकझोरा
क्या कर रहे हो दोस्त
उसने कहा
वह आसमान में चमकते तारों को नहीं बर्दाश्त करेगा
ये नामाकूल सितारे
अंधेरे को और ज़्यादा दिखाते हैं
मैंने उसे कहा ठीक है
इंतज़ार करो रात का
ठीक आधी रात को सबसे उजले तारे पर निशाना लगाना
तभी
एक
आवाज़
आई
” तारे प्रकाशवर्षों दूर हैं। उसे कहो पहले अपनी गुलेल से सड़क किनारे जलती ट्यूब लाइट को फोड़े “
10
उसे अब तक के सारे रास्ते ग़लत लगने लगे थे
उसे धुन सवार थी
कि ज्ञान के केंद्र तक जाना होगा
कि मनुष्य की आत्मा पर चढ़ी मैल की परत उतारना ही होगा
वह हर किसी को रोक कर पूछने लगा था
तुमने देखा
किसने देखा
फिर निराश होकर बैठने लगा था
कोई नहीं जानता
किसी ने नहीं देखा अब तक सत्य
मैने उसकी बदहवास शक्ल को देखा
और उसका हाथ पकड़ कर ले आई नदी किनारे
मुंह धुलवाने
ठंडा पानी पिलाने
उसने आँखें खोलीं
मैने नरम स्वर में कहा
दुख न मनाओ
तुम पकड़ोगे सत्य को
तभी
एक
आवाज़
आई
“सत्य हाथ से फिसल जाता है,उसे कहो पहले नदी में उछलती मछली पकड़े “
11
वह बदल गया था
उसे अब ध्वजा फहराने में आनन्द आता था
हालांकि आयुर्वेद की किताब के ध्वजभंग के विवरण से अब भी डरता था
सीमा उसकी रोज़मर्रा की बहस का हिस्सा था
उसे असीम आकाश भी दुश्मन लगता था
वह इतना कठोर हो गया था
कि बंदूक की तरह तना रहता था
वह चीन की दीवार पर चढ़ कर टी ली ली ली करना चाहता था
वह बताता था रात देखे सपने को
कि वह एक दुर्ग में दौड़ता सिपाही बन गया था
मैं हैरान थी पर प्रसन्न भी
वह वीरता के संकेत दे रहा था
वह प्राण उत्सर्ग करने जैसी उच्च भावना से ओतप्रोत था
मैने कहा
तुम एक सच्चे नागरिक हो
तुम ही बचाओगे आतताइयों से राष्ट्र को
तभी
एक
आवाज़
आई
“राष्ट्र मनुष्यों की बनाई एक सीमा है ,उसे कहो वह दूसरे के पाले में जाकर कबड्डी कबड्डी कहे और अपने पाले में लौट आए “
12
उसने बाल कटवा लिए थे
जबकि हाल छह महीने पहले
बढ़ा रहा था
कमीज़ छोड़ कर कुर्ते नुमा पोशाक पकड़ लिया था
किताबों के साथ अपनी कितनी ही तस्वीरें फ्रेम कर कर लटका चुका था दीवारों पर
अपना नाम तक मोती लाल से बदल कर मार्तण्ड कर चुका था
13
उसने अपने नाखून बढ़ा लिए थे
क्रोधित दुर्वासा की तरह चाल में धमक आ गई थी
वाणी कर्कश और आँखें तीक्ष्ण हो चुकीं थीं
मैं नहीं छोडूंगा
बर्बाद कर दूंगा उसका यश
कौड़ियों के भाव बिकवा दूंगा उसका शाहकार
मुझे डर तो लगा पर मैंने उसकी खरी बात पर भरोसा किया
मैने कहा बहुत सही
छील कर रख दो उसका मुखौटा
उसका दर्प और उसका चरित्र
तभी
एक
आवाज़
आई
“छीलने का अर्थ है किसी व्यक्ति या वस्तु के भीतर के गुणों को प्रकट करना। उसे कहो फ़िलहाल वह मटर छीलने का काम सही से करे”
14
उसकी आंखों में दुनिया का दर्द था
सीना निश्वास से
कंठ हिचकियों से भरा था
उसने भरे गले से कहा मैं सह नहीं पा रहा
इतना अन्याय
इतना दुख
भूख गरीबी और लगातार पतन अब देखा नहीं जाता
क्या करूं
उसने सिर पीट लिया
मेरा दिल काँप उठा
मैने उसका सिर सहलाते हुए कहा रो लो
मेरा कंधा है ना
ख़ूब रो लो
तभी
एक
आवाज़
आई
” भरा घड़ा ही छलक सकता है। वह अंदर से ख़ाली है ,उसे कहो रोने के लिए रूदाली बुला ले “
15
किसी एक दिन
वह बहुत उत्साही था
कोलतार मिलाता हुआ
रोड़ी का ढेर बनाता हुआ
मुझे देख कर खिल उठा
सुनो
मैने तय किया है तयशुदा नहीं मानूंगा
अपना रास्ता ख़ुद बनाऊंगा
देखो मैं आज से शुरू कर रहा हूं
मैं नहा लूं फिर निकलता हूं इस काम पर
मेरा मन प्रसन्न हो उठा
मैने कहा उसे
हां हां तुम बना लोगे
सब सामान है तुम्हारे पास
तभी
एक
आवाज़
आई
” नये रास्ते पगडंडियों से बनते हैं ,कोलतार से नहीं। उसे कहो अपना सामान ले कर पुरानी सड़क की मरम्मत करे”
16
वह बहुत नेक था
उसे चिन्ता थी सभी की
आसन्न संकट से बचाने को तत्पर वह
सोचता रहता दुखी लोगों के बारे में
उसकी नेकनीयत से जल भुन जाते थे बुरे लोग
बुरे लोगों से घिरा वह उन्हीं को मानता था मित्र
मैने एक दिन सुहानी धूप में उसके चमकते चेहरे को देख कर कहा कि तुम्हारी नेकनीयती से सब कुछ बदल जाएगा
देखना एक दिन तुम्हारे बाद भी तुम्हें याद किया जाएगा
तभी
एक
आवाज़
आई
” नेकी सोचने की नहीं करने की चीज़ है,अच्छाई को अच्छे कर्म में बदलना ज़रूरी है। उसे कहो वह यातायात के नियमों का पालन करे”
अजंता देव-
जोधपुर में प्रवासी बंगाली परिवार में 31 अक्टूबर, 1957 को जन्म , राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से हिन्दी साहित्य में एम.ए. ।
शास्त्रीय संगीत (गायन) में बचपन से प्रशिक्षित, साथ ही नृत्य, चित्रकला, नाट्य तथा अन्य कलाओं में गहरी रुचि एवं सक्रियता होने के बावजूद मूलतः कवि के रूप में पहचान।
स्कूल के दिनों से कविता लिखना शुरू किया, पाँच कविता-संग्रह ‘राख का क़िला’, ‘एक नगरवधू की आत्मकथा’ ,”घोड़े की आँखों में आँसू”‘बेतरतीब’ और हॉल की बत्तियां। एक उपन्यासिका “ख़ारिज लोग” प्रकाशित हुई है। बच्चों के लिए एक गल्प ‘ नानी की हवेली’ प्रकाशित । हिंदवी, कविता कोश ,स्त्रीदर्पण,पश्यन्ती में कवि के रूप में दर्ज।
बांग्ला से नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती व शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताओं के और अंग्रेज़ी के ज़रिये ब्रेष्ट की कविताओं के हिन्दी में अनुवाद ।
राजस्थान पत्रिका और धर्मयुग में पत्रकारिता करने के बाद 1983 से भारतीय सूचना सेवा में। 2010 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन।
राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से विशिष्ट साहित्यकार सम्मान प्राप्त। इंडिया फाउंडेशन फॉर आर्ट, बेंगलुरू की ओर से सम्मानित