* All the legal application should be filed in Kerala, India, where the Kritya Trust is registered.
श्री. तान्हाजी रामदास बोऱ्हाडे.
हिंदी अनुवाद- स्वाती दामोदरे
१)पसीने की बारोमासी नदी
किसने देखा है
आसमान से धरतीपर गंगा उतारने वाले
पुराणकथाओ के भगीरथ को ?
मैने अपनें बचपन से देखा है
मेहनत की पहाड़ी पर खड़े
मेरे भोलाशंकर को
जिसकी जटाओं से उतर आयी है
पसीने की बारोमास नदी
इस काली मिट्टी पर
यह नदी
जो मिट्टी मे मिलकर फिरसे उगती है
धरती पर हरा-भरा स्वर्ग रचाती है
किसी सागर से मिलने
वह कभी, कहीं नही जाती है
खेत खलिहानों मे बहती
ऐसी सेंकड़ों नदियां
मिल जाती है एक दूसरी से
और बन जाता है
श्रमो का अथाह महासागर ……..
२)संदेसा
हम में से किसी एक को
भारत के प्रतिनिधी के रूप मे
इंडिया गेट से अंदर आने दिजीये
मायबाप सरकार
वहां राजघाट पर
चिरनिद्रा मे लेटें हुए एक बुढ़े को
देना है संदेसा इतना ही
की चंपारण मे
उसने पैदा की फ़सल की नस्लें
नामशेष नही हुई है अभी भी .
३)परिश्रमी औरतें
किसी के भी खेत में
सालों-साल कमरतोड़ मेहनत करतीं,
दिनभर कड़ी धूप में
खर-पतवार से दो-दो हाथ करतीं
भूमिहीन खेत-मजदूर परिश्रमी औरतें
कर रही हैं खुसुर-फुसुर
अपने-अपने हाथों की
खुरपी के भविष्य को लिए
तृणनाशक नई दवाई की खबर
पहुंची है अभी-अभी उन तक
आगे चलकर ऐसी दवाई से
हाथों की खुरपी का काम
तमाम तो नहीं हो जाएगा ?
खुरपी नहीं तो हाथों को काम नहीं
काम नहीं, तो रोटी कहाँ ?
ऐसे अनेक सवालों के बवाल मचे हैं
खर-पतवार को बिना चूके समूल नष्ट करते
उनके कुशल हाथों के इर्द-गिर्द आग जैसी धधकती भूख
तो खत्म होने से रही,
उसका करें तो क्या करें ?
इसी एक मात्र फ़िक्र ने कुरेद दिया है
पहले ही धूप से सूखे
उनके मेहनती हृदय को
खुरपी के भविष्य की अनिश्चितता
ध्यान में आने पर
डरी-सहमी गाय जैसी हो गई हैं
उनकी व्याकुल आँखें
आज खेती तक पहुँचा
जहरीली दवाईयों का असर
धीरे-धीरे निगल रहा है
भींची मुठ्ठी में कस कर पकड़ी
हाथों की दरांती ,खुरपियों को
आज खेत की मेढ़ तक पहुंचे यंत्र
कल परसों बेकार साबित कर देंगे
खेत खलिहानों मे मजदूरी करते
परिश्रमी औरतों के मेहनती हाथों को
फिर उनकी रोटी का क्या होगा ?
क्या करेंगी ये परिश्रमी औरतें
अपने एक हुए पेट और पीठ का ?
कहाँ जाएँगी ये?
अब डूबती दिशा की ओर अग्रसर दिनों में
कहां से ढूंढेंगी ये
रोटी की तरफ जाने वाली नई राहें?
पराई भूमि से जुड़ी नाल तोड़कर
नाखूनों में फंसी मिट्टी को लिए लिए
पानी से डबडबाई आँखे लेकर?
कहां जाएँगी ये गरीब गायें ?
…और गईं भी
तो कैसे क्या भूलेंगी इन खेतों-खलिहानों को ?
यहाँ की मिट्टी और इस गांव को ?
धीरे-धीरे इतिहास में जमा हो जाएँगी
ये परिश्रमी औरतें
और नामशेष हो जाएँगी
उनके हाथों की विषमुक्त पवित्र खुरपियाँ
कालोपरांत कविताओं में भी नहीं बचेंगी
अपनी ताक़तवर भुजाओं से
किसानों की क़िस्मत को सवाँरती
ये परिश्रमी औरतें
मुल मराठी कविता – तानाजी बोऱ्हाडे
हिंदी अनुवाद – डॉक्टर स्वाती दामोदरे
तानाजी बोऱ्हाडे- शिक्षक, आंबेगाव , जिल्हा पुणे
” जळताना भुई पायतळी ” काव्यसंग्रह प्रकाशित या काव्यसंग्रहासाठी
१) उत्कृष्ट ग्रामीण वांग्मय पुरस्कार प्रदान.
२)राजाराम पाटील उत्कृष्ट वांग्मय निर्मिती पुरस्कार
३)सोलापूर गावगाडा साहित्य पुरस्कार
४)यशवंतराव चव्हाण ओपन युनिव्हर्सिटी नाशिक यांचा विशाखा पुरस्कार
५)महाराष्ट्र शासनाचा बहिणाबाई चौधरी काव्य पुरस्कार.