कविता के बारे
आशीष गौड़
गुफा के बाहर की कविता
एक कविता
जो भरे कमरे में अकेली है।
एक मानिंद कविता
जो ख़तरे में है,
एक ऐसी कविता
जिस पर तालियाँ नहीं बज रहीं।
एक कविता
जो सवाल पूछ रही है,
और एक कवि
जो गुफा के बाहर खड़ा है।
—
एक कविता
जो उस एक कवि के साथ आई है,
एक कवि
जिसकी परछाइयाँ
गुफा की दीवार पर गिरती हैं।
और वहीं—
एक कविता
जो तालियाँ बटोर रही है,
एक कविता
जो सिर्फ़ जवाबों से सजी है।
—
मुझे चापाकल याद आता है
मेरे बचपन का—
देर तक मज्जा की मशक़्क़त से
निकलती हवा,
और फिर
आता था ठंडा, शीतल जल।
आज का ज्ञान
पानी की टंकी से आता है—
बिना मेहनत,
बिना प्रतीक्षा।
—
अरस्तू का वह
तीन तरफ़ा टूथब्रश,
आज एक तरफ़ा है
सिर्फ़ एक तरफ़ से
दाँत साफ़ कर रहा है।
जो दिख रहा है
वह चमकदार है,
जो भीतर कहीं दबा है
वह अब सड़ रहा है।
—
सर हिलाना
सोचे जाने से आसान है।
प्लेटो की गुफा की परछाइयाँ
आज का सच
नियंत्रित करती हैं।
और बाहर खड़ा इंसान
अकेला है।
—
प्लेटो की गुफा
कभी ढही ही नहीं।
वह
बस
हिलने लगी है।
(वाइब्रेट)
अब उस कवि ने
चुनने से इनकार कर दिया।
विकल्प —
एक नैतिक कार्य,
जो वरण से पैदा होता है,
न कि सामाजिक दबाव से।
सिर्फ़ भाग लेने के लिए चुनना
व्यक्तिगत नैतिक एजेंसी को
सामूहिक रीति-रिवाज के आगे
समर्पित कर देना है।
परहेज़ करना
ज़्यादा असली काम है—
ख़ुद को
आत्म-धोखे से बचाना।
उस कवि ने
चुप्पी चुनी…
वह कवि
जो गुफा के बाहर खड़ा है,
जिसने अब
अपनी आख़िरी कविता लिख दी है।
वह कवि अब अरस्तू का
तीन तरफ़ा टूथब्रश ख़रीद लाया है
और अब उसने
अपने बेडरूम में
एक चापाकल लगा लिया है।
और ख़ुद अब गुफा के बाहर ही सोता है……
भैंसे!!
बँधी रात भर जाड़े में,
अपने वक्षों में रात को बंद किए,
दूध नहीं,
अधिकार रोके खड़ी।
पाल चरवाहे को,
माँग रही थी
सिर्फ़ पानी की एक धार,
बदन गीला करने को।
अपने अकेलेपन में
ग़ालिब फ़ैज़ को याद करते
डकार जाती
साम्राज्य का आधिपत्य
और वर्चस्व।
विशालकाय विस्मित
आंतों के कारखानों में,
सूखे खेत,
भरे जंगल
और पूरी नैसर्गिकता
डकार गई।
देह की अंतःकूहों में,
कुबड़ी मोटी मक्खियाँ
डार्विन नहीं
बल्कि सत्ता के उक्रान्त से विकसित
रक्त चूसक
डंक मारती थी ।
अंतड़ियों के मंथन ने
हक़ को गोबर कर दिया
और दूध
मालिक के कंठ उतर गया।
खुर और सिंग
ज़मीन पर रगड़,
उत्पीड़न का अवसाद
बाँटा उसने
बाक़ी सब भैंसों से।
ढलते सूरज को
विषाण पर उठाये,
झुंड में
मानवता के विकास की
समीक्षा हेतु।
गर्दन पर साँखलों के खुले सिरे लटकाए,
राज्य-प्रमाणित मदमस्ती में
सभ्यता के अधिकृत अध्यायों पर
पेशाब करती,
गोबर बिखेरती वह निकली—
और प्रगति की भाषा को
गीला करती ।
भैंसे,
कालचक्र के कंबल ओढ़े
सींच रही है पीढ़ियाँ,
रीढ़ के रक्त से।
जमघट के उतरार्ध में,
जीवन की भीड़ के आख़िरी छोर—
एक आख़िरी स्टेशन, आख़िरी सड़क की आख़िरी झोपड़ी के अन्तिम सिरे पर
एक पेड़ होगा— आख़िरी बोया गया— हरे मैदान पर अकेला खड़ा।
मैं वहाँ के लिए निकलूँगा;
पर पहुँचना मेरा नहीं होगा—
निकलना ही मेरा होगा।
भीड़ से अलग, भीड़ का आख़िरी इंसान मैं रहूँगा।
चयनित पीड़ाओं का बोझ ढोती मेरी पीठ पर
जो गहरे खड्डे पड़ जाएँगे—
उन्हें उसी पेड़ की छाल से बने लेप से भर देना होगा।
उन्हीं डालों से झाड़ने होंगे टेसू के फूल;
जिन्हें जंगल की आग भी कहते हैं,
गर्मी की तीखी साँसों में खिलते हुए।
मेरी पुरानी सभी सफ़े बुशलटों के सिने पर
टेसू के फूलों का रस चढ़ाना होगा।
मैं फिर उसी मोड़ पर बैठ—
उस पेड़ के नीचे— टेसू को हाथ में लिए,
अपनी दोनों उँगलियों के बीच पीस
उसका रस रंग में बदलते देखूँगा।
जैसे भीतर का कोई अनकहा शब्द
धीरे-धीरे अर्थ बनता है।
पेड़ पर अपना बोझ डाल
जमघट की ओर देखता रहूँगा;
और कुछ बीज टेसू के भी भेज दूँगा
हर वापस लौटती भीड़ के साथ—
वो भीड़, जो जमघट का हिस्सा बनने
एक क़तार में खड़ी होगी।
कविता
अनुरक्त सत्य – एक शाश्वत द्वन्द !!
संसार के कंगूरों पर उकेरा ताजमहल प्रतीक रहा है प्रणय और अनुराग का ।
जबकि उसी यमुना किनारे नमी चिपटी मट्टी में वृक्ष की जड़ों में नीड़ बुनती गिलहरी ने कभी यह ना कहा होगा की उसने यह ड्रे किसी के प्रेम में बनाया ।
प्रेम, स्वार्थ, अनुरक्त सत्य और प्रतीकवाद के मध्य का द्वंद्व शाश्वत है ।
शाहजहाँ के आत्मकामी स्वार्थ को मुमताज़ देख ना सकी ।
जबकि शाहजहाँ द्वारा ताजमहल के निर्माण में संसार को दिखा प्रणय।
सत्य केवल मुमताज़ और बीज के गर्भ में गड़ा है ।
एक गहन कविता पढ़ने की लालसा मुझे परस्पर उस कविता को पढ़ने से रोक देती है ।
जैसे के पढ़ते पढ़ते एक दम से ख़त्म हो जाने पर दुनिया की आख़िरी कविता होने का बोध कैसा बेचैनी भरा होता होगा ।
जैसे एक आख़िरी उम्मीद की किरण अकस्माक ही कोई अपनी ही परछाई से मिटा दे ।
हर वह काम जो दिलचस्पी जगाता है , उसे कर गुज़रने में एक आलस्य समा जाता है ।
ठीक वैसे जैसे एक पुल लाँघ जाने की हड़बड़ी ,नदी पार करने से तीव्र होती है ।
नदी से प्रेम,पुल के औचित्य को दबा नहीं पाता।
यह एहसास की लकड़ी का पुल ठीक उफनती नदी के ऊपर है , नदी की अर्जित धारा के वेग को पार करने पर मजबूर कर देता है ।
बहती नदी के वेग से पैदा होता डर , पुल से उत्पन्न होता है।
वही नदी जिसे आप बहते देखना चाहते हैं, आपके मन में गहराई का बोध जगा देती है ।
समय अक्सर तब तेज भागता है ,जब हम ठहर जाना चाहते है ।
ठहर जाने में समय का ठहर जाना भी है , पर भागते समय में भागने से ज़्यादा तेज़ है समय का बीत जाना ।
मुझे कविता पढ़ना पसंद है , कविता पढ़ लेना नहीं ।
मुझे पूर्णता नहीं , निरंतरता प्रिय है ।
अंत नहीं , प्रवाह ही मूल है ।
मैं आशीष गौड़ हूं, जो हिंदी (मुख्य रूप से) और अंग्रेजी दोनों में कहानियाँ बुनने का एक जुनूनी शब्दकार है।
एक कवि और कहानीकार के रूप में, मैं भावनाओं और कल्पना के दायरे में घूमता हूं, छंद और कथाएं गढ़ता हूं जो आत्मा से गूंजती हैं। मैं पेशेवर रूप से 2005 से मुंबई में वरिष्ठ प्रबंधक और वरिष्ठ सर्जिकल एसोसिएट के रूप में उन्नत हृदय सर्जरी से जुड़ा हुआ हूं।
हाथ में माइक और साझा करने के लिए एक कहानी के साथ, मैं पॉडकास्टिंग की दुनिया में उतर जाता हूं, जहां मैं इतिहास की गहराई से लेकर मनोविज्ञान की जटिलताओं तक विभिन्न कवियों, उनकी कविताओं और विषयों का पता लगाता हूं। इस श्रवण यात्रा में मेरे साथ शामिल हों क्योंकि हम मेरे Spotify हैंडल गंगानगर टॉकीज़ पर मानव मन के रहस्यों को उजागर करते हैं और हमारे अतीत के छिपे हुए रत्नों को उजागर करते हैं।
मेरी रचनात्मक यात्रा मानव मन, विचारों, इस दुनिया के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं, हमारे रिश्तों, पिछले अनुभवों और गहरे अंतर्मुखीपन की पड़ताल करती है।
मैं हिंदी कविता और हिंदी लघु कथाएँ लिखता हूँ।
मैं अपने ब्लॉग पर कायम हूं जहां मैं विभिन्न विषयों पर अपने हिंदी और अंग्रेजी निबंध और कविताएं रिकॉर्ड करता हूं।
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मैंने 2019 में हिंदी कविता पर अपनी पहली और एकमात्र पुस्तक प्रकाशित की:
शीर्षक: सर्द शब सलघते ख्वाब।
यह अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है.
अब तक 2 कविता संग्रह और 3 संकलन प्रकाशित हो चुके हैं |
राजस्थान में जनमे और पिछले 20 साल से मुंबई में कार्य कर रहे, आशीष गौड़ एक ऐसे लेखक और कवि हैं जिनकी क्रिएटिव ओडिसी मानव मन, विचारों, इस दुनिया के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं, हमारे रिश्तों, पिछले अनुभवों और गहरे अंतर्मुखीपन की पड़ताल करती है।आशीष जी के अब तक 2 कविता संग्रह और 3 संकलन प्रकाशित हो चुके हैं |आप पॉडकास्ट पे इन्हें Ganganagar Talkies के नाम से सुन सकते हैं|