कविता के बारे में

संस्कृति और साहित्य पर सम्पादक को 29,10,99 को लिखा एक खत, जिसका जवाब आज तक नहीं मिला, मैं ये सवाल कृत्या के पाठकों के सामने रख रही हूँ।

आदरणीय विजेन्द्र जी,

सादर प्रणाम,

“कृति ओर” का बारहवाँ अंक मिला। इसमें कोई सन्देह नहीं कि कृति ओर अपनी इस नवीनतम विधा “पत्र- लेखन” के कारण अधिक लुभावनी लगती जा रही है। एक तो पत्र में जो “रस” होता है वह किसी और विधा में नहीं है, दूसरे “कृति ओर” के पत्र वैचारिक ही नहीं अपितु संवेदनशील भी होते हैं। साहित्य में पैठने का इससे सुन्दर और क्या माध्यम हो सकता है!

संस्कृति, सभ्यता और समाज को लेकर जो बड़ी-बड़ी बातें होती रहीं हैं उनका खोखलापन न जाने क्यों मन को सालता सा रहा है। कई बार खुद से ही सवालोजवाब किए हैं, कुछ कुरेदता ज़रूर रहा, कुछ कमी भी महसूस होती रही, पर समझ में ही नहीं आया कि मन कहाँ परेशान है और क्यों? “कृति ओर” में मिशेल पैरेन्टी का लेख “संस्कृति की राजनीति पर विचार विमर्श” पढ़ा तो अनायास समझ में आया कि अरे हाँ यहीं समस्या ही तो मन को कुरेदती है बार बार। अब देखिए न अपने मन को समझने के लिए भी दूसरों के समर्थन की ज़रूरत होती है, यही तो संस्कृति की राजनीति है। मिशेल पैरेन्टी के एक-एक तर्क में वहीं मुद्दे हैं जिन्हें हम खुली आँखों से देखते हैं और बन्द आँखों से महसूसते हैं।

यदि आप इज़ाज़त दें तो मैं भी बताना चाहूँगी, संस्कृति की असंस्कृति के बारे में… पर कुछ अपने ही तरीके से, विशेषतया नारी की स्थिति को लेकर समाज ने संस्कृति का जो आवरण पहनाया है, उसी के विषय में। मैं पैरेन्टी के इस तथ्य को न जाने कब से महसूस रही हूँ कि “वह जिसे हम आम संस्कृति कहते हैं वास्तव में प्रभुत्वशील वर्ग के मूल्यों का चयनात्मक प्रेषण है।” अब सवाल यह है कि यह प्रभुत्वशाली वर्ग कौन है? निसन्देह अपने को उच्च और सभ्य मानने वाला वर्ग… यही नही मध्यम वर्ग भी अपने को इसी वर्ग का पिट्ठू बनाने में नहीं हिचकता। इस समाज ने सभ्यता के जो कायदे कानून बनाए हैं उन सबकी खाल में बस एक चीज है और वह है झूठ… बस झूठ। झूठी मुस्कान… झूठी शान… झूठा दिखावा… झूठा रहन सहन… झूठे तौर-तरीके… छोड़िए कहाँ तक गिनती करेंगे…। पहले बड़ी-बड़ी सोसाइटियों में सिखाया जाता था कि कैसे चला जाए, कैसे खाया-पीया जाए.. पर अब तो यह बीमारी बड़ी आम होती जा रही है। यानी कि पूरा चाल-चलन ही थोथा होता जा रहा है। अब ये तो व्यवहार की बातें हैं चलिए संस्कृति के आवरण में छिपे इतिहास की ओर दृष्टिपात किया जाए..

हमारी पौराणिक कथाओं को ही लीजिए… हालाँकि पुराणों को इतिहास माना जाता है पर मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि यह स्वार्थ को ध्यान में रख कर, स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए, स्वार्थ का इतिहास है.. सुर असुर के वाद-विवाद को छोड़ दीजिए… दान और दमन को भी छोड़िए.. कहीं भी.. कभी भी नारी को उसके स्वाभिमान के साथ दिखाया गया है? विष्णु क्षीर सागर में शयन कर रहें हैं और लक्ष्मी उनके चरण चाप रहीं हैं, शिव गंगा के साथ मस्त हैं और पार्वती सुहाग बाँट रहीं हैं… उसमें भी भेद-भाव…. व्रत उपासना के दिन औरते सुहाग दान की जो कथा कहती हैं उसमें भी प्रभुत्व वर्ग का स्पष्ट संकेत है कि शिवा ने नीच जात की औरतों को टोकरे-टोकरे सुहाग बाँटा पर बड़े घर की बहुओं को चुटकी भर… यानी कि यदि तुम्हें अपने को सभ्य मानना है तो चुटकी भर सुहाग को लेकर आँचल से बचाती रहो नहीं तो तुम्हारी गिनती हो जाएगी नीच घराने की औरतों में। सभी पौराणिक गाथाएँ उसी प्रभुत्वशाली वर्ग की लेखनी से लिखी लगतीं हैं जो समाज को सभ्य बनाने का ठेका लेते हैं। अब देखिए न मेरे बगल में ही कन्याकुमारी का मन्दिर है। कहते हैं कि कन्याकुमारी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की, शिव प्रसन्न भी हो गए और वर रूप में पधारे।

पर न जाने क्या समस्या थी प्रभुत्व वर्ग के इन्द्र महोदय को कि उन्हें अपना आसन ही डोलता नज़र आया। बस फिर क्या हर बार दुहराए जाने वाला छल-कपट.. इन्द्र मुर्गे का रूप धर जा पहुँचे और समय से पहले ही बाँग मार दी। शिव को लगा कि अनर्थ हो गया.. मुहुर्त तो बीत गया तो वे लौट गए अपनी बारात लेकर.. और कन्या कुमारी? वे तो आज प्रतीक्षारत हैं… आज भी खड़ी हैं.. उन्हें माँ का दर्जा दिया जाता है.. पर सुहागिन बनने से पहले ही.. कहते हैं कि उनकी नाक पर जो चमकता है वह हीरा है.. मुझे लगता है वह अटका हुआ आँसू है। शिव को क्या परेशानी? कितनी-कितनी देवियाँ रहीं हैं उनकी राह पर पलके बिछाए.. सति.. देवी.. शिवा.. गंगा.. और न जाने कितनी। पर कन्याकुमारी की तपस्या का क्या फल मिला? अन्तहीन प्रतीक्षा..। नारी की संस्कृति यही है कि प्रतीक्षा करती रहे,.. नर की हर गलती को नज़र अन्दाज करती रहे.. तो उसे माँ का दर्जा दे कर नारी से देवी की पदवी देकर उठाया जा सकता है। आप सारी पौराणिक कथाओं को खंगाल कर देख लीजिए.. सबके पीछे बस एक ही इतिहास है.. शोषण का… दासत्व का.. हर बार शिकार एक ही.. कमज़ोर वर्ग या फिर नारी वर्ग।

पैरेन्टी का कथन –” पुरुष प्रधान संस्कृतियाँ पवित्र रीति-रिवाजों से परिपूर्ण भले ही हों, किन्तु उनके अध्ययन से ज्ञात होता है वे निकृष्ट कोटि के लिंग शोषण व विभेद का समर्थन करती हैं… ” इतिहास के हर दौर में अनुभूत किया गया है। बचपन से यही तो घुट्टी मिली है.. हमारी संस्कृति कहती है कि सती सावित्री बन कर पुरुष वर्ग को मनमानी करने दो.. किसी भी तरह की..। यह घुट्टी इतनी जबरदस्त होती है कि कालान्तर में स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा कट्टर बन जाती हैं। पुरुष वर्ग ने तो बस घुट्टी दी और अलग हो गए… अब उनके वचनों की रक्षा के लिए स्वयं स्त्रियाँ तैनात हैं… समुद्री केकड़ों जैसे एक दूसरे की टाँग पकड़ शोषण का शिकार बनती रहती हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि संस्कृति में नारी को केवल “माँ” के रूप को जो सम्मान दिया जाता है, उसमें भी एक चाल है.. इसी उपमा के द्वारा तो नर नारी को अपने शोषण कार्यक्रम में शामिल कर लेता है। देख लीजिए समाज में नारी सास के रूप में कितने जुल्म ढाती है.. शायद वह माँ बनते ही.. विशेषतः नर की माँ बनते ही नारी से कुछ ऊपर समझने लगती है.. सम्भवतः देवी.. और शामिल हो जाती है नर के जुल्म में।

पुराण या पुरातनता को छोड़ आगे बढ़ा जाए तो क्या आप सोचते हैं कि आज के युग में भी नारी दासत्व से मुक्ति पा सकी है? .. कभी मैंने अभिमन्यु-अनन्त के किसी लेख में पढ़ा था कि मारीशस में रहने वाले भारतीय मित्र अपने बेटे की शादी तो भारतीय युवती से करना चाहते हैं, पर बेटी की शादी मारीशस के युवक से। कारण स्पष्ट है.. भारतीय बहू अपने साथ ढेर से दहेज के साथ भारतीय नारी, भारतीय संस्कृति की डिग्री लाएगी, पर मारीशस के युवकों से शादी रचाने में लड़कियों को न तो दहेज की जरूरत और न भारतीय नारी के तमगे की.. पूरी छूट.. खैर, इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि आधुनिक.. अपने को स्वतन्त्र मानने वाली लड़कियाँ कितनी परतन्त्र हैं… कितनी परवश हैं.. यह बात हम हर कदम में देखते हैं। मुझे तो लगता है कि पाश्चात्य देशों में नारी शोषण की मात्रा कम नहीं है..। वस्तुतः नारी स्वातन्त्र्य के अर्थ को ही गलत मान्यता दे दी गई। नारी स्वातन्त्र्य का अर्थ न तो फ्री सेक्स है और न खुली मनमानी.. जैसा कि पाश्चात्य या फिर पाश्चात्य रंग में रंगी नारियाँ सोच लेती हैं, लेकिन इसमें भी नर का ही फायदा है, नारी का नहीं। नारी का स्वातन्त्र्य तो उसकी सोच में निहित है… उसके व्यक्तित्व में है।

पहले मेरा विचार था कि शोषण मात्र पितृ प्रधान समाज का अंग है। जब मैं केरल में आई तो मैंने पाया कि इसके मातृ-प्रधान समाज में नारी को न तो परिवार विछोह की तकलीफ का सामना करना पड़ता है और न ही पैतृक सम्पत्ति के अनाधिकार का। फिर भी उन दिनों भी लगता था कि कहीं कुछ घुटन ज़रूर है। समझ में ही नहीं आता था कि कहाँ क्या घुमड़ रहा है। एक तो भाषा समझ में नहीं आती और दूसरे आत्ममुखी सामाजिक चरित्र के कारण मेरी सोच बिना किसी निष्कर्ष के मेरे पास ही लौट आती थी। अखबारों में नारी- आत्महत्या की खबरें पढ़ती तो आश्चर्य होता कि कहाँ कमी है। धीरे-धीरे परतें खुलने लगीं। और जब तकषी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास कयर के संक्षिप्तीकरण का अनुवाद करने का मौका मिला तो आँखें खुल गईं। क्या क्या नहीं सहा है इस मातृप्रधान संस्कृति की नारियों ने, मानसिक, शारीरिक.. सामाजिक अत्याचार। पुरानी “तरवाट्टु” परम्परा में सम्पत्ति की अधिकारिणी तो स्त्री थी, पर उसकी देखभाल करने वाले थे उसके अपने ही भाई-बन्धु- अर्थात् बहनें मालकिन और भाई मेनेजर। बहनें भाई से संवाद भी नहीं कर सकतीं.. अतः अनायास ही सारा अधिकार घर मालिक यानी कि बड़े भाई के हाथों चला गया। अब सम्पत्ति की रक्षा का भी बड़ा उत्तम उपाय। घर की लड़कियों की शादी नहीं, बल्कि सम्बन्ध होता था। वह भी इसलिए ज़रूरी था क्योंकि बहन की सन्तति ही खानदानी सम्पत्ति की अधिकारिणी होती थी, न कि भाई के। सम्बन्ध का तरीका बड़ा अमानवीय… किसी भी उम्र के ब्राह्मण को पकड़ा और सम्बन्ध करवा दिया गया। सम्भवतः इसलिए कि ब्राह्मण की सन्तान उच्च रक्त की होगी। (यानी कि वर्गीयता तो है ही।) सम्बन्धकार ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ मात्र शय्या का अधिकारी, इस कृत्य के लिए उसकी दान-दक्षिणा बन्धी होती थी, यही नहीं कुलीन खानदानों में तो मठ भी बने होते थे जहाँ इस तरह के सम्बन्धकारी ब्राह्मण रहा करते थे। वे न तो पत्नी का छुला खाते-पीते थे और न ही परिवार के अंग हो पाते थे। एक ब्राह्मण कई जगह सम्बन्ध कर सकता था। सन्तति न तो अपने पिता को पहचानती थी और न ही पिता उसको। अब नारी के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह समग्र व्यापार ही बड़ा घिनौना होता होगा। वह मात्र शयन सामग्री और सन्तति जनन का उपकरण बनी रही। पति नहीं तो भाइयों की इच्छा का खिलौना रही।

हालांकि इस तरह की मातृक-संस्कृति केरल से सौ-पचास वर्षों पहले ही विदा हो ली, उसका कुछ प्रभाव जरूर होगा, तभी केरलीय पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ अभी भी मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाई हैं। अब मातृक संस्कृति बड़ी तेजी से पैतृक संस्कृति में बदल रही है। लड़कियाँ भारी दहेज के साथ विदा होने लगी हैं। जो नारी भाइयों पर आधारित रहती थीं, अब पति पर रहने लगी हैं। पैतृक संस्कृति के दोषों को गुण मान कर अपनाया जा रहा है। अभी कुछ सालों से परिवार की सामूहिक आत्महत्या के किस्से बहुतायत से दिखाई देने लगे हैं। अभी कुछ दिनों पहले मैंने पत्रकार लीला मेनन की रिपोर्ट अखबार में पढ़ी थी। उनका कथन था कि इस सामूहिक आत्महत्या का निर्णय पति नाम के जीव द्वारा लिया जाता है, परिवार के बाकी सदस्य तो बस आज्ञा पालन करते हैं। इन सामूहिक आत्महत्या का कारण भी बड़ा अजीब है। अधिकतर जब पति उधारीकरण के चंगुल से निकलने में असमर्थ हो जाता है तो यह रास्ता अपना लेता है। मजे की बात है कि ये परिवार न तो गरीबी रेखा से नीचे होते हैं और न ही भूखे मर रहे होते हैं। असलियत तो यह है कि वे अच्छे खाते-पीते होते हैं लेकिन उपभोक्तावाद की आँधी ने उन्हें अंधी दौड़ में शामिल कर लिया, जिसका परिणाम हुआ लालसा की वृद्धि और आत्महत्या से मुक्ति। लीला मेनन ने जो विशेष बात लिखी है वह यह है कि जिन्दगी तो जिन्दगी, मौत को स्वीकार करने में भी नारी को नर की आज्ञा का पालन करना पड़ता है, और वह भी सर्वाधिक साक्षर सभ्य मातृप्रधान समाज में। वास्तविकता तो यह है कि यह भद्र समाज मातृप्रधान रहा ही नहीं, बस मातृ प्रधान का मुखौटा पहने रहा। पिछले दिनों मेरी बातचीत आदिवासी युवा कवि राघवन अत्तौली से हो रही थी तो वे कहने लगे कि हम आदिवासी समाज में अम्मा देवी ही नहीं बल्कि संस्कृति है। उन्होंने अपनी पत्नी के लिए कहा कि ये मेरी भार्या (पत्नी) है, पर वस्तु स्थिति में मेरी सखी है क्योंकि ये ही मेरे परिवार और मेरी देखभाल करती हैं। उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि हम आदिवासी मातृपूजक मातृप्रधानता को मानने वाले होते हैं। लीला मेनन और राघवन की बातों से मुझे लगा कि वास्तविक मातृप्रधान भावना तो आदिवासी संस्कृति के साथ सिमट गई। तथाकथित सभ्य समाज ने तो बस उसके मुखौटे को धारण किया, वह भी संपत्ति की रक्षा के लिए… यानी कि नारी का मोल माटी के मोल से कहीं कम आँका गया।

संस्कृति की आड़ में असंस्कृति के खेल का लेखाजोखा तैयार किया जाए तो एक महाभारत तैयार हो जाएगा, लेकिन इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि इस असंस्कृति की संस्कृति ने नारीवर्ग को दलितों का दलित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अभी तो न जाने कब तक इस असंस्कृति के भार को ढोना पड़ेगा।

शायद सृष्टि के अंत तक… कौन जाने?…..

मुझे लगता है कि संस्कृति की राजनीति पर अभी काफी बहस होनी बाकी है, बात केवल नारी दमन की ही नहीं, दलितों पर कौन सा कम दमन हुआ है? सब कुछ संस्कृति की आड़ में…

इस विचारोत्तेजक लेख के लिए एक बार फिर से धन्यवाद—

आपकी

रति सक्सेना

तिरुवनन्तपुरम

29,10,99

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