कविता के बारे में
मृदुला गर्ग
एकान्त नहीं कोरोना काल में
मुझे एकान्त की आदत है
मुझे एकान्त प्रिय है
एकान्त में स्मृति जगती है
बेआहट,बेआवाज़
ऐसे कैसे आ जाता प्रेमी
निःशब्द अचानक पास
इतने कितने चुम्बन पाती
आत्मा मूक निर्बाध
ज्यों प्रकृति हरियायी
हँसी नहीं, आँसू नहीं
हल्की स्मित ओंठों पर
दूर चिड़ियां चहचहातीं
ऐसे कैसे धीमे से
मौन भंग नहीं होता
स्मित में आता फैलाव
स्मृति हरियाती ज्यों प्रकृति
एकान्त बना रहता
बेआहट बेआवाज़…
जब से कोरोना काल आया
एकान्त मिला नहीं पल भर
घर में अकेले क़ैद, कान सुनते
इतनी कितनी भीषण आवाज़ें
भूखे मर्दों-औरतों की सुबकियाँ
भूखे बच्चों का करुण क्रन्दन
बेघरों का सिसकता प्रलाप
बेरोज़गारों का हुजूम
ऐसे कैसे दो दो मीटर दूर
जैसे फ़ौज की टुकड़ी
बूटों की धमक से जिसके
टूट जाते हैं पुल
प्रेमी ठिठका रहता चौखट पर
धकियाया-सा
सुनाई देतीं इतनी कितनी
चीखें बेआवाज़ गलों से
स्मृति मूर्छित हो जाती
एकान्त की धज्जियां उड़ जातीं
दानभीरु
क्या कहते हैं लोग
आपने बुलाया तो हर्ष हुआ
मंच से बुलवाया तो हर्ष हुआ
असल हर्ष होता है कैसे
मैं बतलाता हूँ
मेरे पास एक हर्ष फ़ोन था
पड़ा पड़ा ख़राब हो रहा था
ओलेक्स पर इश्तिहार दिया
दस हज़ार दाम लगाया
गाहक आये आठ-नौ देने को तैयार
दस भी देंगे थोड़ा इंतज़ार करूँ…
फिर एक दिन फ़ोन आया
बोला एक फटेहाल आदमी
दीख नहीं रहा था पर मज़लूम
आवाज़ सूरत खोल गई
घिघिया कर बोला, बेटे को
ऑनलाइन पढ़ाई को फ़ोन चाहिए
कुल सात हजार रुपये हैं
बाकी उधार ले लूँगा
बर्तन भांडे बेच दूँगा,
परसों तक नौ जुगाड़ लूँगा
दया करें किसी को हर्ष ना बेचें
परसों नौ हज़ार लाऊँगा, मुझे दें
मैंने कहा ठीक, इंतज़ार कर लूँगा।
अगले दिन आत्मा लगी कचोटने
फ़ोन लगा, कहा सात में ले जाओ
वह आया,सात हज़ार रुपये लाया
बेबस लाचार कृशकाय आदमी
साथ था कृशकाय किशोर बेटा
बेबस लाचार नहीं कान्तिपूर्ण
उन्होंने हर्ष फ़ोन देखा,छुआ, सहलाया
उमगे हुमगे नतमस्तक हुए
नोट रखे सौ के पचास के कुछ बीस के
कहा गिन लीजिए
मैंने कहा तुमने गिने मैंने गिने एक बात है,
बाप उमगा हुमगा कृत्कृत्य हुआ
बेटा बोला लेने आप को हैं, हम देने आये
गिनने आप को चाहिए ।
न-न साहब बच्चा है, बाप मिमियाया
मैं गिन देता हूँ आपके सामने
उसने नोट गिने जैसे अपराध कर रहा हो
बेटा तना खड़ा रहा जैसे खरीदार हो
मुझे गुस्सा आया, सोचा कहूँ
दो हज़ार और लाओ तब हर्ष पाओ
तभी बेटे की नज़र बाप पर पड़ी
आँखों में आँसू छलछला आये
मैं दुविधा में पड़ा, गुस्सा त्यागूँ या नहीं
बाप ने पाँव छुए, अहोभाग्य फ़ोन पाया
मैंने गुस्सा त्याग दिया, फ़ोन उसे थमाया
फिर बड़प्पन से भर सौ का नोट उठाया
कहा मिठाई ले जाना बेटे की पढ़ाई
बढ़िया हो मिठाई पहले खाना।
बेटे ने माथा हिलाया ज़रूरत नहीं
बाप ने नोट माथे से लगाया
बेटे की बाँह थाम मेरे पैरों पर झुका
बेटा तना खड़ा रहा तो क्या
बाप धन्य धन्य उचारता रहा
ऐसे होता है असल हर्ष सीखो
ग़रीब को कम कीमत पर हर्ष बेच कर।
है कुछ पुराना धुराना घर में
बेच डालो तुरत इश्तिहार दे
पाओ मज़लूम खरीदार
ओलेक्स पर सब मिलता है
पिता का आना
कल रात सिर पर हाथ रख
पिता सिरहाने बैठे रहे
नि:शब्द दो घण्टों तलक
बरसों बाद महसूस की
ऐसी तस्कीन भरी तन्द्रा
नहीं वह सपना नहीं था
सपनों में नहीं होती
ऐसी दीर्घ चुप्पी
ऐसा सघन स्पर्श
दो घण्टे बाद वे गए
और मैं बाहोश हुई
देखा वे अपनी घड़ी
पीछे छोड़ गए
पर बिना घड़ी वे बाहर
कभी निकलते नहीं
मैंने पुकारा
पिताजी घड़ी आपकी
यहाँ है मेरे पास
पुकारा बार बार
पिताजी … पिताजी!
घड़ी आपकी यह रही
लीजिए…यह आपकी घड़ी
इसके बिना आप जाते नहीं
वे लौटे नहीं मैं पुकारती रही
तकिये के नीचे महसूस करती रही
घड़ी के स्टील की सख्ती
सुइयों की नोक का तीखापन
छुअन पिता की उंगलियों की
उफ़ कितनी कोमल स्नेहिल
अभी लौट कर आते होंगे
घड़ी बिना जाते नहीं कहीं।
पर घड़ी होने लगी लोप
मेरे हाथों से औचक नहीं
गई धीरे धीरे जैसे पिता गए थे।
भोर की बारिश
भोर में बारिश क्या हुई सुरूर तारी हुआ
एक पैग उम्दा राईंन वाइन पी हो जैसे
मन हुआ झूमूँ कि बेवजह हँस भी दी
मिट्टी की सोंधी महक के क्या कहने
नासिका और ओंठों से जज़्ब हुई भीतर
मिट्टी नहीं मिट्टी का अतर था वह
काया को सराबोर कर गया जैसे
राईंन वाइन का खिजाता सुवास
कयास लगाते रहो किसकी है गमक
ऑर्किड, नहीं ब्लूबेरी, नहीं घास का फूल
अरे नहीं है घुमड़ते बादल की सुरभि
मिट्टी के अतर में मिली आसमानी खुशबू
या महबूब की महमहाती आस, एक भ्रम
महक गमक मिल लाते गज़ब खुमार
राईंन वाइन या भोर की बौछार?
बौछार धीमी पड़ बनती बूंदाबांदी
रफ़्ता-रफ़्ता झींसी…तब किलकता सुरुर
इंतज़ार करता बौछार की… यूँ बरसे
इस बार कि मदहोश हो भूल जाऊँ
गाती नहीं, गाऊँ बेपरवाह सुर ताल से
जैसे हूँ वाइन से लबालब स्ट्रोबेरी
भोर की बारिश में अद्भुत समागम
राग शास्त्रीय पर सौरभ अलमस्त
मिले तो उफने बेखुदी की हिलोर
वही लहर जो बख्श गई थी
अस्फुट रागिनी की आहट सी
तिलिस्मी महक राईंन वाइन की
आसमां की इबारत
बारिश में छज्जे के नीचे बैठ
आसमां की इबारत पढ़ती हूँ
अल्लाह बड़ा कार साज़ है
छह सात जुमले लिख
फॉन्ट का रंग बदल लेता है
हाँ-हाँ होता है रंग सलेटी पर
पुट लिये रहता कितने रंगों का
बारिश में बाहर रहो तो जानो
धवल सलेटी, रुपहला सलेटी
नील सलेटी, धुँआरा सलेटी, श्याम सलेटी
फाख्ता की छाती सा धड़कता सलेटी
जिसमें रहते साँवले रंग कई
वीर धुरंधर बादल वे लौटते नहीं
बिन बरसे, बरखा ज्यों बरसती
पल-पल छटा बदलते बादल
बिजली के तर्जन को नकार जब
बरखा थमती औचक बादल थिर
हो नहीं पाते फैल जाते नभ पर
गड्डमड्ड नील सुरमई स्याह इबारत में
एक पर एक, आड़ी तिरछी बेतुकी
परम पिता नन्हा बच्चा बन जाता
पढ़ नहीं पाता अपनी लिखाई
इबारत मिटा रंगों का डिब्बा खोल
मोतिया रंग पोत देता अर्श पर
दोबारा इबारत खींचता गोलाई में
चमक उठते एक…दो…तीन… सात रंग
इंद्रधनुष कहते हो इसे
उलट गया रंगों का डिब्बा
दिव्य बालक का,समेटा इतमीनान से
जैसे सदियाँ बाकी हों, बिखेरा- सहेजा
मिटा दिया हाथ फेर सब
खाली फ़लक चमकीला हो रहा
लोग इसे धूप कहते हैं, तुम भी
मैं जानती हूँ बन्द डिब्बा है यह
रंगों का… खुलेगा तब देखेंगे
खेल सलेटी का
मृदुला गर्ग जी लब्ध प्रसिद्ध साहित्यकार हैं, जिन्हें साहित्य अकादमी सहित अनेक अवार्ड प्राप्त हुए हैं। मृदुला जी की कविताएं भी विशेष महत्व रखती हैं। प्रस्तुत है कुछ कविताएं। 