मेरी बात

मौला रहम करे

गुजरे साल की पगडन्डी पर चलते
फटी एड़ी वाले कदमों पे
कदमों के नीचे तलवों के छालों पर

रसोई में टनटनाते बासनों पर
किसान के खेत में भीगते दानों पर
अपने जमीर के लिए सड़क पर बैठे लोगों पर
अन्नदाताओं के पपड़ाए होंठों पर

मौला रहम करे

मौला रहम करे

अरावली की पहाड़ियों पर
यमुना की जलधारियों पर

मौला रहम करे सड़क के भूखे कुत्तों पर
दरख्तों पर मण्डराते कजरारे कौओं पे

दानों को तलाशतीं चींटियों पर
धरती को मथते कैंचुओं पर

मौला रहम करे

मौला रहम करे

मौला रहम करे उल्लूओं चमगादड़ों पर
छिपकलियों पर, पतंगों पर

मौला रहम करे नारियल की फुनगियों पर
आम की बौराती शाखाओं पर
कटहल के मीठे दर्द पर

धान पे , पात पे,
देहली दरवाजे पर

पाहुने पे, परदेसी पर
हंसी पे खुशी पर
बरगद से फलते मनों पर
इमली सी खटमीठी यादों पर

मौला रहम करे

जाते दिनों
और आती खुशबुओं पर

मनों में छिपे रहम पे
दीमागों में छिपे वहमों पे

मौला रहम करे
मौला रहम करे

आती डगरों पर
खिलते फूलों पर
बच्चों की हंसी पर
चांदनी की कलियों पर

मौला रहम करे,
मुझ पर, तुम पर उस पर

मौला रहम करे

 

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