मेरी बात

कविता ने अनेक वीथियाँ पार की हैं, राजप्रकोष्ठों से लेकर साहित्यिक प्रकोष्ठों से होते हुए गली कूचों तक, लेकिन हम अक्सर उनसे संवाद करना भूल जाते हैं जो हमारी कविता में विषय बन कर आते हैं, यह संवादहीनता नई नहीं है, अपितु कालातीत है, राजदरबारों में जिनके नखशिख का वर्णन कविता का विषय रहा वे कविता से वंचित रहीं। साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर जो दर्द या पीड़ा माध्यम थे, वे कविता में अपनी उपस्थिति से अनजान थे।

कृत्या को हमने कविता के आयामों से जोड़ने की हमेशा कोशिश की, लेकिन न जाने क्यों भारतीय समाज ही नहीं, विश्वविद्यालयों और विद्यालयों में कविता की उपस्थिति नगण्य होती जा रही है। साथ ही जो विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम आरम्भ हो चले हैं, वहाँ अभिजात्य उपस्थिति तो है, लेकिन साहित्यिक संवेदना गायब है।

यही कारण है कि हमने कृत्या के कवितोत्सवों को कवियों के साथ लेकर गाँव कस्बों के स्कूली बच्चों, सरकारी कालेजों, और भाषा संस्थानों और समुद्र तटों, अस्पतालों आदि में मनाया है, हमने कोशिश की थी कि जेल के कैदियों से भी रूबरू हों, यहां तक कि हम जेल तक गए हैं। हमारा विश्वास था कि कविता और आम जन में अभेद मिटेगा, यह हमारी कोशिश रही, लेकिन कृत्या अभी भी इंतजार कर रही है कि यह भेद टूटे।

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना।

Post a Comment