समकालीन कविता

दिलखुश मीना

 

डॉक्टरनी की मुस्कुराहट…

 

तुम्हारे चेहरे की स्मित रेखाएँ
मैंने देखी है कई बार गौर से
तुम्हारे वदन की मुस्कुराहट में
मुझे तनिक भी लाग-लपेट न दिखी
भले ही तुम मसखरी बहुत करती हो
लेकिन इसके पीछे प्रेम पल रहा है
ये औदात्य प्रेम की मिसाल
कभी न खत्म होने वाली
जीवन की आशा है

 

शायद तुम्हें पता न होगा तेरे स्वभाव पर
मैंने एक रिसर्च पेपर भी लिखा है
जिसे मैंने मनुष्यता के जर्नल में छपने के लिए
हाल ही में भेज दिया है
एकेडमिक्स की दुनिया तुम्हारे स्वभाव को
सराहती न थकेगी
तुम्हारे स्वभाव की वजह से
मेरा रिसर्च की दुनिया में नाम होगा
तुम्हारा यह अवदान मेरे ऊपर
किसी बड़े उपकार से कम नहीं है

 

तुम्हारे कपोल पर जो तिल है
वो समंदर में किसी द्वीप सा सुशोभित है
तुम्हारे रजत से दाँतो की हँसी
हमेशा ज़िंदादिली को बयां करती है
तुम सदियों से दबी हुई स्त्री नहीं रही अब
तुमने खुद अपने वज़ूद को तराशा है
कोई नहीं कर पायेगा तुम्हारा शोषण
तुम्हारे अस्तित्व की अग्नि सदैव प्रज्वलित होती रहेगी
उसकी वजह केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण होगा

 

हम दोनों ही डॉक्टर हैं
शायद तुम्हें पता नहीं होगा
हम दोनों में महीन अंतर है
तुम नश्वर शरीर को जीवन देती रहोगी
परंतु मैं उसी नश्वर शरीर के मस्तिष्क में
बौद्धिकता का संचार करता रहूँगा
देखो हमारी अस्मिता के नाम भले ही एक हैं
लेकिन हमारे कार्यक्षेत्र भिन्न-भिन्न होंगे

घूँघट की ओट से
पीली लूगड़ी में से
जब तुम कनखियों से
देखती हो मेरी ओर
मैं खुद को पाता हूँ तुम्हारे सौंदर्य के समंदर में
मुझे तो तैरना भी नहीं आता है
तुम ही बताओ मैं कैसे निकल पाऊँगा इससे?
पता है तुम्हारे आभूषणों ने
साहित्य की दुनिया में अलंकार शास्त्र गढ़ा है
कविताओं में तुम्हारी उपमायें देने लगे हैं


कविता रचने वाले
तुम और मैं दोनों एक ही हैं
जिस्म भले ही दो हैं हमारे
ये प्रेम जिस्मानी नहीं
न ही ये ओहदा देख कर हुआ
ये तो सिर्फ तुम्हारा यह बोलना
कभी मेरे लिए कुछ लिख पाओगे?
यही एक पंक्ति प्रेम की नदी में बहा ले गई

(अप्रैल, 2023)

 

 

प्रेम का अहसास

 

सरसों के पीले फूलों बीच
चूमते ही तेरे होठों के पाटल
मेरे मिट्टी के मन में
नवांकुर फूट पड़े
मेरे पुष्प रूपी तन में
कलियाँ खिल गई

 

जब तुमने आँखों में आँखें डाली
तो लगा मावठ आ गई
आसमान में घनघोर घटा छा गई
बारिश की बूँदों ने मिट्टी को चूमा तो
धरती के आँचल से मिट्टी की सौंधी खुशबू
समूचे वातावरण में पसर गई

 

मुझे आलिंगन में लेकर
तुम्हारे बाहुपाशों ने मदहोश कर दिया
आलिंगन के इस प्रथम स्पर्श से
मेघों में तड़ित धारा प्रवाहित हो गई
ऐसा लगा जैसे धनुष की प्रत्यंचा ने
तीनों लोको में हाहाकार मचा दिया
मेरे उल्लसित अंतर्मन में
इंद्र धनुष के अर्धवृत्त ने
रंगों की बौछार कर दी
यह दृश्य मैं जीवनपर्यंत
अपनी स्मृतियों के खजाने में
सुरक्षित रखना चाहता हूँ

 

मेरे कंधे पर तुम्हारा सिर
किसी झोपड़ी की थूणी पर बलिंडे जैसा सा था
मैं थूणी था और तुम बलिंडा
तुम्हारा प्रश्न था कि क्या दे पाओगे मुझे सहारा जीवन भर?
जैसे थूणी देती है बलिंडे को।

(16.03.23)

 

मेरी चाहत

 

तुम
आख़िर कब तक
मेरे हालचाल दूसरों से
पूछती रहोगी?
अब तुम इसी शहर
में नौकरी करने लगी हो
चली आओ
किसी दिन

 

पिछले साल उस
ब्याह में हम मिले थे
तब भी तुम्हारी
नज़रों में कुछ न कुछ जरूर था
जो सात साल पहले भी था
मैंने चोर नज़र से देखा
तुम्हारी नज़रें मेरे वदन
पर अटकी रही

 

किसी दिन
मुखर्जी नगर से गुज़रो तब
कह दो अपने हृदय के उदगार
जिसे तुम दस साल से नहीं
कह पायी
तुम्हें आने में कोई
ऐतराज है तो
कहीं से मेरा मोबाइल नंबर
लेकर मैसेज ही कर दो

 

कह दो अपने हृदय के उदगार
फिर ये अफ़सोस न रहे
कि मैं तुम्हें प्रेम करती थी
लेकिन कभी कह नहीं पायी
चली आओ किसी दिन
मिरांडा हाउस के बाहर
कॉफी शॉप पर
मैं तुम्हारा वेट करूंगा।

(18.03.2024)

 

हवाई जहाज की उड़ान

 

हवाई जहाज ने
जैसे ही उड़ान भरी तो
लगा किसी घाटी से
कोई बस पलटने वाली है

फिर हवाई जहाज
पक्षी-सा प्रतीत हुआ
जैसे गरूड़ की तरह
डैने फैलाये उड़ रहा हो।

 

खिड़की से बाहर
दृष्टि डाली तो देखा
टिमटिमाती प्रकाश बत्तियाँ
दुनिया का सबसे बड़ा
दीपोत्सव मना रही हो।

 

जब सड़कों को देखा तो
लगा छोटी-छोटी पगडंडियों
पर चीटियाँ घूम रही हैं।

 

जब लैंड हो रहे थे तो
लगा कि कोई राह से भटका पक्षी
अपने नीड़ की तरफ लौट आया है।

(28.11.2022)

 

शीतल प्रेम की छाया

 

तुम
मुझसे मिला करो
जैसे नदी समुद्र से मिलती है

 

तुम
प्रेम की चर्चा किया करो
जैसे प्रेमी प्रेमिका से करता है

 

तुम
क्षितिज बनाया करो
जैसे धरती आकाश से मिलकर बनाती है

 

तुम
विचार बन कर आया करो
जैसे कवि के मन में आते हैं

 

तुम
शीतलता प्रदान किया करो
जैसे ठंडा जल गर्मियों में
प्रदान करता है।

(2019)

 

चिंता

एक ऑटो वाले ने
बाइक वाले को साइड नहीं दी

 

बाइक वाले दानव ने
उतरकर कर धुन डाला ऑटो वाले को

 

इस बीच ऑटो वाले ने
शहर की उसी तंग गली में
दम तोड़ दिया

 

मेरी नज़र में ऑटोवाले की मौत
उतनी चिंताजनक नहीं थी
सबसे चिंताजनक यह बात थी-

 

तमाशा देखने वालों ने
दोनों को बचाने की बजाय
मोबाइल निकाल कर वीडियो बनाये थे

 

यह बात मैंने सुनी तो
मेरे हृदय में शूल की सी चुभन हुई

 

फिर मैं डूब गया शून्य में
भविष्य में कोई तो होगा
जो वीडियो बनाने की बजाय बचायेगा
मारते हुए इन दानवों से
किसी के मांथे के सिंदूर को
किसी के घर चिराग को

 

मेरा दिल तब खुश होगा
जब कोई कहेगा कि
कोई बात नहीं भाई
आगे बढ़ो, क्या हो गया?
छोटी सीही तो बात है!

(11.02.2023)

दिलखुश मीना-पीएच.डी. शोधार्थी(दिल्ली यूनिवर्सिटी)कविता, कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र और लोकगीतों की रचना करते हैं।
दर्जन भर से ज्यादा कविताऐं हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित(कथेसर, विजय दर्पण, कर्म कसौटी, आधुनिक समाचार, अमर उजाला)

मीणा लोकगीतों पर शोध और साथ में स्वतंत्र अध्ययन एवं लेखन।
सम्मान- राजस्थान सरकार द्वारा ‘राजीव गांधी विद्यार्थी डिजिटल योजना’ के तहत ‘राजीव गांधी सम्मान’ से सम्मानित।

संपर्क: गाँव- बाढ़रामसर, तहसील- तलावड़ा, जिला-गंगापुर सिटी, राजस्थान-322203
ईमेल: dilkhushmeenairs400@gmail.com

 

 

श्याम निर्मोही की नज़्में

 

1.
भूख से बिलखती पथराई आंखों-सी
मेरी कविता है……पांवों में छालों-सी

 

छैनी के निरंतर प्रहार से गढ़-अनगढ़
मेरी कविता है…..हथेली में गांठो-सी

 

बेशक ये मेरी रोज़ी-रोटी नहीं किंतु
मेरी कविता है……लड़ते हालातों-सी

 

जाति की बात पर आहत हर ओर से
मेरी कविता है…चुभती हुई बातों-सी

 

सदियों से ओक मांडे अमृत को तरसे
मेरी कविता है…उखड़ीं हुई साॅंसों-सी

 

जूझती जूण की जैसे आख़री आरज़ू
मेरी कविता है…..सुबकती आहों-सी

 

हॅंस कर सह लेती भारी जिम्मेदारियां
मेरी कविता है….बोझ तले कांधों-सी

 

‘निर्मोही’ चिंगारियों को जन्म देती हुई
मेरी कविता है ……पथरीली राहों-सी

2.
किसी को बदगुमानियां ले डूबी
तो किसी को नादानियां ले डूबी

 

किसी को सुरा-कबाबी शौक तो
किसी को अय्याशियां ले डूबी

 

रात को आई यकायक बरसात
तो सारे छज्जे छानियाँ ले डूबी

 

नदी अपना दर्द गुनगुना तो लेती
मगर लहरों की रवानियां ले डूबी

 

पसीने ने पत्थरों पर निशांत छोड़े
धूप तो वही निशानियां ले डूबी

 

सफ़ेद डोर का पाश कैसे समझे
मुस्कुराती मेहरबानियां ले डूबी

 

कैसे उभरता अंधी रिवायतों से
झूठी कल्पित कहानियां ले डूबी

 

निशाना साध पाता ‘निर्मोही’ पर
जंग खाई तीर कमानिया ले डूबी

 

3.
नहीं कोई वाद-विवाद करूँगा
बस सीधा-सीधा संवाद करूँगा

 

घर फूंक कोई चले हमारे साथ
तो कबीरा-सा निनाद करूंगा

 

पानी से तर-बतर हो ये हलक़
तो सारे नारे ज़िन्दाबाद करूंगा

 

सूखी रोटी सिलबट्टे पर पीसूंगा
तो भूख का अनुवाद करूँगा

 

फूस की झोपड़ी में दीया जले
तो उजाले का साधुवाद करूँगा

 

नभ का सीना चीरकर नारों से
भीम क्रान्ति का नाद करूंगा

 

निर्मोही पीले पत्ते हरे हो जाए
तो ही ये ज़िस्म आज़ाद करूंगा

 

4.
थाम कर हाथ अपनों को उठाते रहिए
रिश्तों को इसी तरह से निभाते रहिए

 

कभी तो फूटेगी मुहब्बत की चिंगारी
दो पत्थरों को आपस में टकराते रहिए

 

आसान नहीं होते हैं रास्ते मंजिलों के
कभी हटते रहिए तो कभी हटाते रहिए

 

ये ज़िन्दगी तो इक प्यार का नग़मा है
कभी गाते तो कभी गुनगुनाते रहिए

 

समझ आ जाएगी जोड़-ओ-बाकी भी
कभी जोड़ते तो कभी घटाते रहिए

 

मिटेगी सरहदों की दूरियां भी, उस पार
कभी जाते रहिए तो कभी बुलाते रहिए

 

निर्मोही कभी भी संवाद खत्म न करिए
कभी सुनते तो कभी सुनाते रहिए

 

5.
बागबां ने ही बग़िया जला डाली
रंग बिरंगी तितलियाँ जला डाली

 

सर कहां छिपाती मासूम गौरेया
बरसात ने छतरियाँ जला डाली

ज़हरीली हवा के पागलपन ने तो
निर्दोषों की बस्तियां जला डाली

 

चरवाहा ढूंढता रहा सूना रेगिस्तान
जंगल ने तो बकरियां जला डाली

 

बच भी जाता डूबता माझी मगर
समंदर ने ही किश्तियां जला डाली

 

यादें भी अब पराई-सी हो गई है
विरहन ने हिचकिया जला डाली

 

यांत्रिकता के इस बद्तर दौर ने
मां बाबा की चिट्ठियां जला डाली

 

रोटी का स्वाद चूल्हे की तपन
मां ने फिर उंगलियाँ जला डाली

 

निर्मोही इन्सां की झूठी मगरूरी ने
बड़ी से बड़ी हस्तियां जला डाली

 

श्याम निर्मोही-कृतियाँ :- रेत पर कश्तियाॅं (कविता संग्रह),संपादित: सुलगते शब्द (दलित काव्य-संकलन) सूरजपाल चौहान की प्रतिनिधि कहानियाॅं।

अन्य :- मधुमती, जागती जोत, कथारंग (साहित्य वार्षिकी), परिवर्तन, हाशिए की आवाज़, दलित अस्मिता, दैनिक भास्कर, दैनिक युगपक्ष, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, मरू नवकिरण, प्रेरणा अंशु, सृजन कुंज,विश्वगाथा,रचना उत्सव आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित और आकाशवाणी प्रसार भारती केंद्र, बीकानेर से साहित्यिक वार्ताओं का प्रसारण।
सम्मान : डॉ. भीमराव अम्बेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप सम्मान- 2017, सूरजपाल चौहान साहित्य सृजन सम्मान -2021, नागरिक अलंकरण, नगर निगम प्रशासन बीकानेर।
संप्रति : महासचिव : साहित्य चेतना मंच, सहारनपुर।
श्याम निर्मोही,सोहनी सदन, सोहन कोठी के पीछे, अंबेडकर सर्किल के पास, मारुति गैराज वाली गली, बीकानेर, राजस्थान -334001

 

 

उमंग सरीन

 

मैं कुंदन न होई

तप तप बीते मेरे दिन रैन सारे

मैं कुंदन न होई ।

 

इसका दुःख और उसकी पीड़ा

सब अपना सा अपनाया

गहरी बड़ी चोटें थी मेरी

सहलाने कोई न आया

मैं एकाकी ही पथ पे चली

संग न संगी कोई ।

 

उम्रों वाला रेशम दुशाला

लम्हों ने की फुलकारी

जीवन चदरिया काटों भरी

कीकर करे बुनकारी

विष के टाँके आठों पहर थे

मैं चंदन न होई ।

 

मन मिट्टी था जीवन था माली

अरमान फूलों जैसे

सावन रूठा बने गुलमोहर

कैसे बबूलों जैसे

पीर का नीर रुका अखियों में

मैं क्रंदन न होई ।

 

मील का पत्थर बन मुझको

सबको दिसा है दिखाना

छैनी समय की चलती रही

मुझको अनघड़ था रहना

मैं कोई बुत न बन पाई

मिला न वन्दन कोई ।

 

कैसी बन्दिश ऑंसू पर

पलकों पर कैसी सांकल

कौन भेदे वो मुस्कानें

छिपाती जो मन की हलचल

प्रश्नों की मैं सेज पे जागी

जाने हिय मंथन न कोई ।

 

क्षणिकाएं


1
चार गज रेशम मैंने
रात के लंबे थान से काटा
आड़े तिरछे कई सपने
बेसाख्ता सिल लिए
परेशानी ये है कि
नींदों को बस कतरनें मिली हैं ।

 

2
जब बरसात के न आने से
सूख जाती हैं नदियाँ
मैं टकटकी लगाए खोजता हूँ
आसमान में छुपे बादलों को
कुछ नहीं मिलता जब
दूर क्षितिज तक ,तो
मुझे फिर लौटना पड़ता है
तुम्हारी आँखों तक ।

 

3
किसी तितली के पंखों से
रंग चुरा कर हवाओं ने
ऐसे घोले फ़िज़ाओं में कि
आसमान से धनक पूछता है
क्या कोई मेरा जुड़वाँ
रहता है ज़मीं पर ?

 

4

तुमसे मिलने की घड़ियां
जैसे धूप की बहती
इक कलकल नदिया
अंजुरी भर उजाला
लिया था मैंने कभी
उम्र भर की रौशनी मिली
तुमने देखी मेरी आँखें
कितनी चमकती हैं ?

खप्पर वाली झोंपड़ी में
टप्पर से टपके है पानी
कई दिना से बरस बरस
मेघा कर रहे नादानी ।

 

दीवारों की दरारों ने
पिया पानी भर पेट
भीजा तन बिछौने का
अकड़ी मूँज फिर ऐंठ
फूल कुप्पा हुये किवाड़
न हिलने डुलने की ठानी ,,,

 

भीज गये खूँटी पर
तन्दुल पोटली वाले
पानी पानी हो गये
कनस्तर आटे वाले
सूखे नल को बैठी निहारे
सुबह से बूढ़ी नानी ,,,,,

 

कच्ची पगडण्डी के बदन पर
कीचड़ की लिपटी धोती
पानी के गढ्ढों में छप छप
मुनिया पैरों को धोती
रपटी सासू देहरी पे
हँसे पेट पकड़ बहुरानी ,,,,,

 

ओसारे में दुबक के बैठा
पाँख सुखाता कागा
मोती भी इक कोने बैठा
न भौंका न भागा
सिकुड़ गया मकड़ी का जाला
छटपटाये वो मरजानी,,,,

 

खेतों में हैं नदियां बहतीं
फसलें हुईं लमलेट
मजूरी को निकला नहीं
कल्लन को कोसे पेट
घर में दाने खत्म हो चले
कंगाली सुनाए कहानी ,,,

 

उमंग सरीन– विज्ञान शिक्षिका , गीतकार, कवयित्री ,कहानीकार , समाज सेविका
लेखन –कविता , गीत, दोहे , माहिया, हाइकु लोकगीत,कहानी ।
समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में रचनाएँ नियमित रूप से प्रकाशित
दिल्ली सरकार की CTI( chamber of trade and industry ) से सम्मानित ।
मॉरिशस के राष्ट्रपति द्वारा कहानी संग्रह का लोकार्पण और सम्मान ।
Mentor X के द्वारा डॉ राधाकृष्णन सर्वपल्ली सम्मान
सर्वश्रेष्ठ गीतकार 2023 से सम्मानित
अखिल भारतीय साहित्य श्री सम्मान 2023 से सम्मानित
म्यांमार एम्बेसी और लॉयंस क्लब द्वारा वीमेन प्रेस्टिज अवार्ड 2024

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