समकालीन कविता
नवरात्रा
हमारी प्राथमिकता
हमारी प्राथमिकता
वो रोज़ सबसे पहले उठकर
सूरज को जगाती है,
सबके लिए अलग-अलग
नाश्ते बनाती है,
दौड़-भागकर घर के सारे काम निपटाती है,
फिर चाँद को पहरेदार बनाकर
सबसे आखिरी में सोने जाती है,
इतनी व्यस्त दिनचर्या के बाद भी
सबको अपना ध्यान कैसे रखना चाहिए
इसके लिए याद से हर दिन
नए-नए नुस्खे बताती है,
चलने से लड़खड़ाने तक
मुँह पर बस उसका ही ज़िक्र है
पर माँ शायद नहीं जानती
हमें भी उसकी फिक्र है
वो जिस दिन कहती है
“आज बच्चों की पसंद का खाना बनाते हैं”
उस दिन बाज़ार से चुनकर
हम उसके ही पसंद की सब्ज़ियां ले आते हैं,
उसके सीरियल के वक्त
हम अपना टीवी भूल जाते हैं,
और जब वो घर बैठे ऊब जाती है
तो हम घूमने जाने के बहाने बनाते हैं,
हालाँकि इन कोशिशों के बाद भी
कभी-कभी उसे बहुत सताते हैं,
आखिर वो तो माँ है
उसकी बराबरी थोड़ी कर पाते हैं
बस ध्यान रखते हैं इस बात का
कि घर-गृहस्थी में उलझकर
हमारी पहली आवाज़
घर की आखिरी प्राथमिकता न बन जाए,
हम जब भी काम से घर वापस आएँ
एक हँसती-मुस्कुराती माँ को पाएँ।
***
कभी घर आओ ना
क्यों न मिलें किसी दिन,
एक-एक चाय का प्याला हो जाए,
क्यों न वो पुरानी यादें,
एक बार फिर ताज़ा हो जाएं?
कभी घर आओ ना,
मेरे बच्चे मिलना चाहते हैं,
मैं उन्हें हमारी सारी बदमाशियां बता चुकी हूं,
बस एक वो वाली अभी बतानी है
कभी घर आओ ना,
तुम्हारे साथ बैठकर
बच्चों को पांच पैसे की कीमत समझानी है
दरवाज़े पर आकर घंटी मत बजाना,
शाम के चार बजते ही जैसे आया करती थी,
ठीक वैसे ही चली आना
कभी याद न करने के लिए
पहले थोड़ा सा मुंह फुलाऊंगी,
फिर झट से मान जाऊंगी
और घर में सबसे मिलवाऊंगी
कुछ तुम अपनी बताना,
कुछ मैं अपनी सुनाऊंगी,
या शायद तुम्हें देखकर
सिर्फ पुराने किस्से दोहराऊंगी
कभी घर आओ ना,
चाय के साथ छोले-समोसे भी खाएंगे
पच्चीस साल हो गए
अपनी सबसे पक्की सहेली को देखे,
क्या हम दोबारा कभी नहीं मिल पाएंगे?
***
सपने या हकीकत
कहीं लिखा हुआ पढ़ा था
ये जिंदगी एक नाटक है
और दुनिया रंगमंच
पर ध्यान से देखें तो
जिंदगी एक सपना है
रोज कुछ नया,
कुछ अनजाना,
कुछ अलग
मानो उठते ही सब गायब हो जाएगा
एक बार उठ कर वापस सोते ही
कुछ और ही दिखाया जाएगा
ना कुछ सुधारा जाएगा
ना वापस दोहराया जाएगा
कुछ पीछे वाला याद रहेगा
कुछ धुंधला होता जाएगा
सब कुछ बदलता रहता है
जीवन में समय के साथ
दोस्ती, प्यार, नफरत
जैसे सब कुछ बदलता रहता है
नींद के साथ
सपने हों या हकीकत
***
नवरात्रा,
जयपुर, भारत की, एक उभरती हुई लेखिका हैं। इनकी रचनाएँ विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें साहित्य कुंज, स्पिलवर्ड्स प्रेस, सेतु पत्रिका, द क्राइटेरियन, स्टोरी मिरर, मद्रास कूरियर, इंकपेंट्री, मैड इन अमेरिका, द ब्यूटीफुल माइंड जर्नल, हिंदी कुंज, स्कार्लेट ड्रैगन फ्लाई जर्नल, वूमेन स्पिरिचुअल पोएट्री, इंडस वुमन राइटिंग, बैसेट हाउंड प्रेस, फीवर ऑफ द माइंड जर्नल, पाइकर प्रेस, घुड़सवार पत्रिका, आदि सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त यें देश – दुनिया की रोमांचकारी यात्राओं में अत्यंत रुचि रखती हैं तथा अपने अवलोकन के अनुसार विभिन्न विषयों पर अनायास ही लिखना पसंद करती हैं।myselfnavratra@gmail.com
योगेंद्र पांडेय
1.
पिता
पिता वटवृक्ष होते हैं
जिनकी छाँव में एक सुंदर बचपन का संसार
पल्लवित होता है
जिनके कर्मठ हाथ गढ़ते हैं
अपने बच्चों में संस्कार और अनुशासन।
पिता का होना दुनिया का सबसे बड़ा सुख होता है
जिनके पिता होते हैं
वो सचमुच बड़भागी होते हैं
पिता उम्मीद होता है
संकट और संघर्ष के दिनों में।
पिता के कंधे पर होता है
जिम्मेदारियों का बोझ कि जिसे ढोते-ढोते
गुजर जाती है पूरी उम्र
अपने बच्चों के शौक और खुशियों के लिए
एक पिता कर लेता है समझौता
खुद अपने ही सुकून और सपनों से।
मैंने कभी पिता की आँखों में आँसू नहीं देखे, क्योंकि पिता सबसे छुप-छुपकर रोते हैं
उनके आँसू नहीं गिरते
क्योंकि उनके आँसू अंदर ही अंदर घुट-घुटकर बिलखने से सूख जाते हैं
पिता ख़ुद को कभी कमज़ोर नहीं होने देते
वे जानते हैं कि दुनिया में कमज़ोरों के लिए
कोई जगह नहीं होती।
पिता खुले आकाश की तरह उन्मुक्त होते हैं
पिता सागर की गहराई लिए गूढ होते हैं
पिता के हाथों में होती है कर्म की रेखाएं
पिता की आँखों में होते हैं सहज स्वप्न के बिम्ब
पिता पर्वत की तरह अडिग और मज़बूत होते हैं
जो कभी तूफानों से लड़ते हुए हार नहीं मानते
पिता स्वाभिमान के प्रत्यक्ष प्रमाण होते हैं।
पिता जो सतत संघर्ष के देवता हैं
पिता जो वात्सल्य के सहज प्रणेता हैं
पिता के चरणों में है तीर्थ
पिता की आँखों में बसा है एक सुन्दर संसार
पिता के चरण रज जब लगाता हूँ माथे से
तो संसार के सारे दुःख और संकट
हार मानकर हो जाते हैं दूर।।
2.
सन्नाटा
घोर सन्नाटे में भी होती है एक आवाज़
अकेलेपन से थके हुए
तुम्हारी अंतरात्मा की आवाज़
जो तुम्हारी यथार्थ पहचान बताती है।
घोर सन्नाटे में ज़रा सा ठहर कर सुनो
उस आवाज़ को जो तुम्हारी वजूद का
सही सही आकलन कराती है
तुम्हारी क्षमताओं का
दर्शाता है पूरा पूरा विवरण।
सन्नाटे की गहरी आवाज़ में छुपा है
सृष्टि का गूढ रहस्य
सन्नाटे की ध्वनि में है
संगीत का सम्पूर्ण सुर ताल लय
सन्नाटे की ध्वनि में धड़कती है
प्रकृति की धड़कन।
इस नश्वर संसार को समझने के लिए तुम्हें
जाना होगा सन्नाटे के गहन आगोश में।।
3.
फिर एक दिन मर जाते हैं
एक दिन ऐसा होता है कि
हम जन्म लेते हैं और आ जाते हैं इस दुनिया में
हम रो रहे होते हैं मगर
उत्सव मनाते हैं हमारे
माता पिता नात रिस्तेदार।
जब हम होते हैं मासूम सा शिशु
लोगों के लिए होते हैं मुख्य आकर्षण का विषय
हमारी नादानियाँ और शरारत
होते हैं लोगों के लिए मनोरंजन के साधन
लोग हमें गोद में उठाते हैं
खेलाते हैं इतराते हैं।
न जाने कब बड़े हो जाते हैं हम और फिर तो
मुँह फेर लेते हैं सब
नहीं रह जाता है हमारे भीतर कोई आकर्षण या कि शिशुता
कि जिसपर मोहित होकर कोई दुलारे या
स्नेह दिखाए हंसे हंसाए वात्सल्य दिखाए।
उम्र बढ़ने के साथ साथ जब मरने लगता है
हमारे भीतर का बचपना और मासूमियत फिर
एक एक कर दूर होने लगते हैं सब साथी
सगे, संबंधी और रिश्तेदार
कि बचपना मर जाने से बिखर जाता है जीवन।
जब हम हो जाते है जवान, जागरूक और जिम्मेदार
फिर नहीं होता कोई हमारे भीतर की
मासूमियत और बचपना को निरेखने वाला
कितना कुछ बदल जाता है एक शिशु के उम्रदराज होने पर।
वक़्त की रफ्तार बढ़ती है
इंसान के भीतर की उलझने और भी उलझती हैं
धीरे धीरे देह का मोह पिघलता है
अपने पराये का भेद टूटता है
किसी का प्रेम ही रह जाता है
जीवन भर की पूंजी।
जन्म लेकर उम्र भर भटकने से सिर्फ़ यही मालूम हुआ
कि कभी न बूझने वाली मृग तृष्णा लिए
हम भागते हैं उम्रभर और
फिर एक दिन मर जाते हैं।।
4
यादें
कोई बात यूँ याद आती है और
मन खुश हो जाता है अचानक
सच में यादें कितनी महत्वपूर्ण होती हैं!
यादें जीवन को स्थिरता देती हैं
यादें ज़िंदा रहने के लिए प्रेरणा हैं
मुझे अक्सर याद आती हो तुम
मुझे याद आता है
तुम्हारा वह जीवंत शहर जहाँ
मैंने गुजारा है अपने जीवन का
सबसे अनमोल समय।
यादें तो सिर्फ़ एक बहाना है
सच तो ये है कि
तुम चली आती हो आज भी वहाँ
जहाँ मैं गुजार रहा हूँ अकेलापन
एक तुम्हारे बिना।।
फिलिस्तीन के लोग…
भूख को हथियार बनाकर लड़ी जा रही लड़ाई में
मारे जा रहे हैं फिलिस्तीन के लोग
सूख गई है लोगों की अतड़ियाँ
रोटी के बिना।
दूधमूहा बच्चा निचोड़ता है
माँ के सूखे हुए स्तन को
दूध की एक बूँद उसे नहीं होता नसीब।
मिसाइल के प्रहार से ध्वस्त हो गए स्कूल के मलबे में कहीं दफ़न हो गया है
बच्चों के पढ़ने लिखने का सपना
मासूम बच्चों की आँखों में, डर और बेबसी
देखा जा सकता है
बिल्कुल साफ साफ।
महत्त्वकांक्षाओं की इस क्रूर लड़ाई में
कुचली जा रही है मानवता
नफ़रत की आग में राख हो गए हैं
मानवीय मूल्य
इतिहास के काले अक्षरों में लिखा जायेगा
यह हृदयविदारक नरसंहार।
कब आएगी फिलिस्तीन के लोगों के चेहरे पर
सुखद मुस्कान?
कब बुझेगी भूख से जलते हुए
पेट की आग?
फिर कब उतरेगा माताओं के सूखे हुए स्तन में दूध?
कब गाएंगे बच्चे स्कूल में प्रार्थना के गीत?
ये प्रश्न मुझे विचलित करता है
शायद तुम्हे भी।।
योगेंद्र पांडेय, सलेमपुर, देवरिया, उत्तर प्रदेश,शैक्षिक योग्यता : M. A (English/Hindi), B.Ed
व्यवसाय: अध्यापक. छंद, कविता, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक
रस : वीर रस और श्रृंगार रस,विभिन्न राष्ट्रीय काव्य मंचों से काव्यपाठ, विभिन्न राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं से प्रकाशित, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर काव्यपाठ
मोबाईल नम्बर:6394893753,email:yogendrap974@gmail.com
ऋतु त्यागी
1.
आज का मनुष्य
आज का मनुष्य
ऊर्ध्वाधर होने का महज़ भ्रम है।
वह अब तनता नहीं,
सुविधा की ढलान पर मुड़ जाता है,
उसकी रीढ़
महज़
एक सुविधाजनक कोण है
जो आदमियत का
रेंगने की ओर प्रत्यावर्तन है।
2.
भाषा कभी पूरी नहीं होती
शब्द धीरे- धीरे
बदलते हैं अपनी खाल
अर्थ करता है
ख़ुद से ही बहस
भाषा कभी पूरी नहीं होती
वह हमेशा
थोड़ी अधूरी
थोड़ी काँपती
अपने ही आकार से
मुक्ति के लिए
चलती रहती है अनवरत।
3.
एक बदहवास दिन
एक बदहवास दिन
मौसम लड़खड़ाने लगा
टूटकर गिरी बारिश
सीने में उड़ती रही
स्मृतियों की राख
एक लम्बी चुप्पी से डरी
भाषा पानी में बह गई।
काम बार-बार दौड़कर
मेरे पास चला आता है
मैं चकरघिन्नी बन जाती हूँ
वह दौड़कर मेरी पीठ पर
बैठ जाता है
तब मैं कछुआ बन जाती हूँ
मैं थकती हूँ…
थकती हूँ…
फिर कमर कसती हूँ
मैं मुस्तैदी से नौकरी करती हूँ ।
4.
सब चाहते थे
सब चाहते थे
सुखी होना
विशिष्ट होना
एक झपकी के स्वप्न को पूरा करना.
खुरदुरे यथार्थ को रगड़कर सूखी कल्पनाओं से चिकना बना देना.
सब चाहते थे
बारिशों के शहर में
भीगना
नम होना
नदी होना
सब चाहते थे
स्लेटी धुंध में
निर्मल श्वास लेना
भरोसा करना
भरोसा रखना
मृत्यु से पहले आत्मा को उजला करना ।
5.
एक डोर
हँसी तितली थी
उड़ गई
दुख मक्खी की तरह बैठ गया
आँखों से बँधी हुई
एक डोर है
जो मरी स्मृतियों के कपाट से बँधी है
दुख के विरुद्ध विद्रोह
बुलबुलों की तरह उभरते दृश्य हैं
जो शुष्क पुतलियों में
आस का अश्रु है ।
ऋतु त्यागी
सम्प्रति-पी.जी.टी हिंदी केंद्रीय विद्यालय एनटीपीसी बदरपुर,
रचनाएँ-विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ तथा कहानियाँ प्रकाशित.
पुस्तकें- कुछ लापता ख़्वाबों की वापसी, समय की धुन पर,मुझे पतंग हो
जाना है तथा तितलियों के शहर में (काव्य संग्रह),एक स्कर्ट की चाह(कहानी
संग्रह)
पता-45,ग्रेटर गंगा, गंगानगर, मेरठ
मो.9411904088
अनवर सुहैल
नवरात्रा की कविताएँ निस्संदेह वैचारिक भाव यात्रा का पड़ाव भर हैं। उनसे बड़ी उम्मीदें है। ऋतु त्यागी और योगेंद्र पांडे की कविताएं भी प्रभावकारी हैं।