मेरी बात
यदि हम साठ सत्तर के दशक की बात करें तो उस वक्त रात-रात भर चलने वाले कवि सम्मेलन प्रचलित थे। मुझे याद है मेरे बचपन में गर्मियों में चित्तौड़गढ़ में इन कवि सम्मेलनों की आवाज गूंजा करती थी। रात में किसी चौराहे के पास तम्बू लगवा कर भौंपू के द्वारा कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जाता था। मुझे व्यक्तिगत तौर पर देखने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन कविता और शायरी की आवाज को घर की छत पर बैठ कर अनेक बार सुना है। हां, उस वक्त कवि और शायर को फीस देकर आमन्त्रित किया जाता था। विष्णु प्रभाकर जी ने कभी अपनी यादें शेयर करते हुए कहा है कि लोग उनके पास बच्चन जी को आमन्त्रित करने के लिए सहायता करने आते थे। प्रभाकर जी का बच्चन जी से अच्छा व्यवहार था। वे प्रभाकर जी के माध्यम से आए हुए व्यक्ति से बातचीत करते, और प्रभाकर जी से कहते, “आप जाइए, लेन-देन की बात हम कर लेंगे।” एक बार अमिताभ के मुंह से सुना है कि बाऊ जी पूरी रात कवि सम्मेलन में गाकर लौटते थे, तो उनकी जेब में चार सौ रुपये होते थे। आज लोग समझ नहीं पाएंगे कि उस वक्त चार सौ का क्या दाम होता था? जी हां, उस वक्त चार सौ एक इंजीनियर को भी नहीं मिल पाते थे। जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी, वह यह थी कि कवि या शायर के साथ आम जनता का संबंध होता था। यहां टिकट खर्च करके संभ्रांत जन नहीं, अपितु जन सामान्य बिना टिकिट के आते थे। बच्चन की मधुशाला और नीरज के गीत इन्हीं सम्मेलनों में लोकप्रिय हुए। वक्त की नदी में काफी पानी बह गया और हम आज देख रहे हैं कि कविता बहुतों को लिखना पसंद है, लेकिन कवि बनने का अर्थ है, स्वयं अपनी किताबें छपवाना, पाठकों को भेजना और उनकी प्रतिक्रिया के लिए चिरौरी करना। दरअसल अब कवि पाठक खोजता भी नहीं है, वह साहित्य के किन्हीं नामी-गिरामी लोगों को चुनता है और उनसे लिखवा कर धन्य-धन्य हो जाता है। साहित्यिक गोष्ठियों में जन साधारण नहीं, अपितु कवि लेखक ही शिरकत करते हैं। सोचने की बात है जो स्वयं लिख रहा है, वह आपकी कविता या लेखन पढ़ने का वक्त मुश्किल से निकाल पाएगा। यदि मेरे सामने पठन के चुनाव का सवाल उठेगा, तो मैं वह सब पढ़ना चाहूँगी, जो मुझे बिल्कुल नहीं मालूम है।
अधिकतर पत्रिकाएं भी उन लेखकों कवियों को छापती हैं, जिनका नाम है। निस्संदेह मंजे हुए लेखक को पढ़ना जरूरी है, लेकिन किसी न किसी गैर साहित्यिक क्षेत्र के लेखक को भी मंच उपलब्ध करवाना उचित होना चाहिए, जिससे कविता, जो वस्तुतः आम जन की अभिव्यक्ति है, पुनः उनके पास तक पहुँचे।
कृत्या इस अंदाज़ का विशेष ख़याल रखती है।
इस नए अंक में आप पुनः साहित्य से इतर क्षेत्र में लिखने वालों को भी पढ़ेंगे।
रति सक्सेना