* All the legal application should be filed in Kerala, India, where the Kritya Trust is registered.

हशम तुरबी
काम हम करते हैं सदियों से रईसों के लिये ,
कब पहनने को भला हमको मिला रेशम है।
इन पंक्तियों के रचयिता, रेशम के ताने में सुनहरा बाना बुनने वाले जुलाहे हशम हैं, जिन्होंने कबीर की परंपरा का पालन करते हुए शब्दों को भी बुना है। उनकी गजलें समाज से सवाल करती हुई अपनी पीड़ा को सामने रखती हैं। लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह है शिल्प और शैली में परिपक्वता। हाशम जितनी शिद्दत से कपड़ा बुनते हैं, उसी शिद्दत से गजलें लिखते हैं।
उनकी गजलों का अंग्रेजी में अनुवाद बहुभाषाविद अनुराधा जी ने किया है। हाशम जी ने अपनी गजलों को देवनागरी में उपलब्ध करवाया है।
आपबीती
लहू को करके पसीना बहा रहा हूँ मैं ,
अलग सब से नज़र सबको आ रहा हूँ मैं ।
जहाँ को तर्ज़-मशक़्क़त सिखा रहा हूँ मैं ,
पहाड़ काट के रस्ता बना रहा हूँ मैं ।
बहुत बुलन्द है इन चोटियों की ऊँचाई ,
इन्हें सलीक़े से धरती पे ला रहा हूँ मैं ।
मेरे क़बीले की हर एक फ़र्द है मज़दूर ,
सुनो कि अपना तआरुफ़ करा रहा हूँ मैं ।
मुझे मिली है जो मेहनत-कशी विरासत में ,
क़ुबूल करके रिवायत बचा रहा हूँ मैं ।
करम किये हैं जो दुनिया ने इक ज़माने तक ,
वो चाह कर भी नहीं भूल पा रहा हूँ मैं ।
मेरी कराह से उनको सुकून मिलता है ,
वो हँस रहे हैं जो आँसू बहा रहा हूँ मैं ।
शराफ़त और सदाक़त ग़रीबी कम-इल्मी ,
सज़ा सुनाएँ ख़ताएँ गिना रहा हूँ मैं ।
लिये हुए थे जो अजदाद ने अमीरों से ,
वो ख़ानदान का क़र्ज़ा चुका रहा हूँ मैं ।
किसी की राहबरी अब मुझे क़ुबूल नहीं ,
ख़ुद अपने हाथ में पर्चम उठा रहा हूँ मैं ।
करा न पाएगा क़दमों पे अब कोई सजदा ,
सुनों बग़ौर ये सबको बता रहा हूँ मैं ।
दबाव ज़ेह्न पे दोनों के है बराबर का ,
वो मुझको और उन्हें आज़मा रहा हूँ मैं ।
जो कर रहा हूँ मैं ख़ुद को उठाने की कोशिश ,
उन्हें ये लगता है उनको गिरा रहा हूँ मैं ।
मुक़ाबला है अँधेरों से मेरी आँखों का ,
शिकस्त देने को मिश्अल जला रहा हूँ मैं ।
हवेलियों के चराग़ों में खलबली क्यों है ,
जो जुगनुओं की तरह झिलमिला रहा हूँ मैं ।
हुआ सवेरा उठो काम पर चलो पर भाई ,
ख़फ़ा न होना जो तुमको जगा रहा हूँ मैं ।
सुनी सुनाई कहानी इसे न समझो हशम ,
है आपबीती जो तुमको सुना रहा हूँ मैं ।
परिन्दों का
ना ज़मीन है ना ही आसमाँ परिन्दों का
फिर भी ज़ेह्न रहता है शादमाँ परिन्दों का ।
सिर्फ़ चन्द तिनके हौसलों का सरमाया ,
शाख़ पर दरख़्तों की आशियाँ परिन्दों का ।
बारिशों का मौसम हो या हवाओं के झोंके ,
कितना सख़्त होता है इम्तेहाँ परिन्दों का ।
हैं तड़प रहे बच्चे माँ को ले गया सय्याद ,
पासबाँ नहीं कोई बे-अमाँ परिन्दों का ।
तुम अज़ाबे-क़ुदरत से ख़ौफ़ क्यों नहीं खाते ,
क्यों शिकार करते हो बे-ज़बाँ परिन्दों का ।
तुम पे क़त्ल का फ़तवा कोई क्यों नहीं देता ,
तुम उजाड़ देते हो ख़ानदाँ परिन्दों का ।
रात होने वाली है रुक नहीं रही बारिश ,
हाय कैसे लौटेगा कारवाँ परिन्दों का ।
काट कर दरख़्तों को घर बना लिया हमने ,
अब गुज़र नहीं अपने दरमियाँ परिन्दों का ।
क़ैद करके रक्खा है छीन ली है आज़ादी ,
और ख़ुद को कहते हैं क़द्रदाँ परिन्दों का ।
आबो-दाना देता और रब की नेमतें पाता ,
क्या नसीब वाला है मेज़बाँ परिन्दों का ।
ऐ हशम बयाँ उनका काश हम समझ पाते ,
मिल नहीं रहा कोई तर्जुमाँ परिन्दों का ।
रेशम है
जैसे किमख़ाब में सोने से मिला रेशम है ,
उसकी चाहत है ज़री अपनी वफ़ा रेशम है ।
मत करो मुझ पे यक़ीं ख़ुद ही परख कर देखो ,
मेरे एहसास में कुछ और है या रेशम है ।
सिन्फ़े-नाज़ुक की नज़ाकत की हिफ़ाज़त के लिये ,
हम बनारस के जुलाहों ने बुना रेशम है ।
हम फ़क़ीरी में कबीरी को जिया करते हैं ,
अपने हाथ आते ही अनमोल हुआ रेशम है ।
सारी दुनिया में बनारस की बुनाई जैसे ,
सारे धागों से नफ़ासत में जुदा रेशम है ।
काम हम करते हैं सदियों से रईसों के लिये ,
कब पहनने को भला हमको मिला रेशम है ।
सिर्फ़ तारीफ़ मिली मोल नहीं मिल पाया ,
फिर भी दुनिया को सदा बुन के दिया रेशम है ।
आओ नायाब सी यक-जहती की चादर बुन लें ,
पास अपने अभी थोड़ा जो बचा रेशम है ।
अहमियत इसकी है दरबारे-एलाही में हशम ,
इसको मलमल न समझ माँ की दुआ रेशम है ।
डॉ अनुराधा बनर्जी कवि,
नाटककार और अनुवादक हैं, वे पांच भाषाओं में काम करती हैं। उनके महत्वपूर्ण अनुवाद हैं संस्कृत महाकाव्य रक्षत गंगम का अंग्रेजी में अनुवाद, ताओ की सूक्तियों का अनुवाद हिन्दी और अंग्रेजी में, टैगोर के पांच नाटकों और ११० कविताओं का हिन्दी में अनुवाद, बुद्धिनाथ मिश्रा और रामावतार पांडे की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद, के कविताओं की पुस्तकें रचीं, एक पुस्तक नाटकों की है। अनुराधा जी को अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं।