प्रिय कवि

राजेंद्र नागदेव

 

पानी

 

बुद्ध! तुमने अछूत कन्या के हाथ से पानी पीया था
क्या तुम नहीं जानते थे पानियों की भी जातियाँ होतीं हैं?
जानते थे बुद्ध!
तुम्हारी प्यास केवल बहाना थी
तुम पानी को शस्त्र बना शुरू करना चाहते थे एक युद्ध
तुम्हारा वह युद्ध तुम सदियों बाद भी जीत नहीं पाए
रणांगण में वह अभी चल ही रहा है,
हाँ, अछूत कन्या की बस्ती में युगों से पसरा अंधकार
थोड़ा-थोड़ा फटने लगा है
भोर की मंद हवा में वहाँ बज रहा है संतूर‌-
बुद्धं शरणम् गच्छाsssमि
धम्मं शरणम् गच्छाsssमि
संघं शरणम् गच्छाsssमि.

 

स्लेटों के, ब्लैकबोर्ड के टुकड़े
कुछ टूटी कुर्सियाँ, कुछ फूटी मटकियाँ
ढह चुकीं दीवारों की ईंटें
कुछ अब तक खड़ी ईंटों की दीवारें
टीन की चद्दरों और कवेलुओं की छतें
कुछ सँकरी गलियाँ
कुछ बड़े रास्ते
दुकानों के काउंटर
घिसे हुए टायर, गाड़ियों के कलपुर्जे
साइकिलों के अस्थिपंजर
कुछ कब्रें, कब्रों से झाँकते नर-कंकाल,
हजारों साल बाद
मरी हुई एक नदी का पोस्ट्मार्टम करेंगे पुरातत्वविद
और बताएँगे नदी के उदर में क्या-क्या मिला
खंगालेंगे जंग लगा कबाड़,
लिखेंगे रिपोर्ट में
भरापूरा कस्बा रहा होगा कभी यहाँ,
चलते-चलते कार्बन डेटिंग की राह पर अतीत की धुंधमय दुनिया में चले जाएँगे
भग्नावशेषों की गहराई में डूब कर लिखेंगे
किसी नदी ने अकस्मात् उदरस्थ कर लिया था कस्बे को
घटना इक्कीसवीं सदी के किसी दिन घटी थी,
यहाँ हरसूद नामक कोई कस्बा था.

 

शब्द जुबानों पर जम गए
कप ठहर गए हवा में
चाय भाप बन उड़ती रही
अचानक छा गया सन्नाटा,
विश्व भर में लोग परदे पर
देख रहे थे उनका बह जाना
वह हृदय विदारक लाइव टेलिकास्ट था,
जल का सम्मोहन, सेल्फी का आकर्षण दोनों भयानक होते हैं,
निर्जीव सी थी नदी
कंकड़-पत्थरों के बीच लड़खड़ाती रेंगती,
दूर नदी बीच आर्द्र हवा में अलसा रही चट्टानों में
ऐसा कुछ आकर्षण था सब खिंचे चले गए
पिता, बच्चे को छाती से चिपटाए माँ
हँसते-खिलखिलाते तीन बच्चे
फिर कुटुम्ब पूरी धरती पर
दर्द की सनसनाहट बन शिराओं में उतर गया,
फटी-फटी आँखें देखतीं रहीं स्तब्ध
निर्जीव नदी का अकस्मात् जी उठना
और चट्टानों पर टिकी असहाय जिंदगियों का
एक-एक कर कुपित हिलोरों के आगोश में समा जाना,
बच्चे को छाती से चिपटाए
माँ अंत तक खड़ी रही चट्टान पर नदी से लड़ती
फिर वह भी बह गई.

 

इन दिनों शर्म से पानी पानी होने वाली कहावत
पानी पानी होकर जाने किस दिशा में बह गई!
गई होगी किसी कब्रिस्तान में
अपनी मौत का मर्सिया पढ़ने

 

बेशर्मी की नदियाँ अब निकलती जातीं हैं
एक से दूसरी , दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौंथी
जैसे वृक्षकी डालियों से डालियाँ
डालियों से फिर फिर डालियाँ
काली नदियों का जाल बिछा है,
गुप्त सुरंगों से नहीं
बेशर्मी की नदियाँ सिंहद्वार से घुसतीं हैं अब
संसद में, विधानसभा में, दफ्तर में
मस्तिष्क और मन में
सूखे हमामों को पानी से भरतीं
जहाँ सभी नंगे हैं,
सड़कों पर नग्न शरीर
आकाश तक सर उठा कर चलते हैं,
कोई कुछ नहीं कर सकता
सुना है, नंगे से खुदा भी डरता है

 

कैसा काल है बंधु!
चुल्लू भर क्या
समुद्र भर पानी में डूब कर भी
ज़िंदा रहते हैं लोग.

 

आकाश से धरती पर अंगारों की वर्षा
हवा में तपन का ताँडव
क्षितिज तक सनसनाती आग में ऊँटों की क‌तारें
हर दिशा भटक कर लौट आतीं नजरें
कहीं पानी की बूँद नहीं,
भ्रम का पीछा करते-करते
थक कर लड़खड़ा गए हरिण पर ऊँटों के नथुने फड़फड़ा रहे हैं
उन्होंने भाँप ली कहीं दूर टीलों के उस तरफ से हवा में आ रही पानी की गंध,
मुठ्ठी भर हरियाली में ओझल
ओक भर अमृत मिला पपड़ाए अधरों को,
मरु के आक्षितिज महासमुद्र में
सुकून-से नखलिस्तान के द्वीप
जैसे अँधेरे खण्डहर के किसी सुनसान कोने में जल रही
मोमबत्ती की थरथराती लौ.

 

पानी छोटी-सी बावड़ी के अँधेरे गर्भ में सो रहा था
हरी काई की भारी चादर लपेटे
अंगारों की बारिश से अपने को बचाता, और पूरा गाँव दौड़ रहा था
नदी, पोखर, झील की तरफ,
हर कहीं पपड़ाई जमीन
भयानक सन्नाटा,
कमर और सर पर बैठीं धूप में तंदूर सी जल रहीं गगरियाँ
ठाँव-ठाँव भटकतीं
अंतत: बावड़ी तक पहुँचीं
वहाँ छिप कर सो रहा था थोड़ा सा गँदला जल,
स्त्रियाँ दो सदी पुरानी दीवार में फँसी
दो हाथ चौड़ी फिसलन भरी सीढ़ियों से
बावड़ी तल में उतरीं एक पीछे एक,
वह मटकी भर पानी के लिए
जीवन का मृत्यु की घाटी में उतरना था
तनिक विचलन कि, साँसों का खत्म स्पंदन
बहुत निर्मम होता है पानी कभी-कभी!

 

स्त्री रो सकती है, रो लेती है
माँ बहा देती है अंतर में पछाड़ें मारता वेदना का समुद्र
आँखों से,
पिता रोते नहीं नदियाँ पिता की आँखों में भी होतीं तो होंगीं
पिता की नदियों में बाढ़ भी आती होगी
उनके लिए तट की मर्यादा भंग करना निषिद्ध
वे आँखों की कोर तक आकर ठहर जातीं हैं
पिता दुखों की मरुभूमि में चलते हैं नंगे पाँव
पूरा कुटुम्ब पीठ पर, कंधों पर उठाए
पिता अंतर में छिपा कर रखते हैं रुदन का हाहाकार.

 

पानी बहुरूपिया
आस्था पर आरूढ़
हिमालय की दुर्गम कंदरा में
शिवलिंग हो जाता है कभी
कभी गगनचारी हरकारा बन
संत्तप्त यक्ष की विरह वेदना
रामगिरि से सहस्त्र कोस दूर अलकापुरी में राह देखती
उदास यक्षिणी तक पहुँचाता है
कभी पानी, पानी बन कर उतरता है धरती पर
गगन की ऊँचाइयों से
उतारता कोकिल-कंठ में रागिनी
डालता अमराइयों में झूले
प्रणयबिद्ध हृदयों में मधुर पीड़ा
कटी-फटी धरा की देह पर मलता है
मुलायम हरा मरहम
कभी रुद्र सा कुपित
अकस्मात् कर उठता है कड़कड़ाती बिजलियों के ताल पर ताँडव
फिर थक कर निकल जाता है धीरे-धीरे कहीं दूर,
पानी जरूरत है, पानी अमृत है, पानी विष भी है.

 

अठ्ठारहवाँ दिन
मुंबई पर जमे हुए हैं मेघ
यक्ष का संदेश पहुँचा चुके
अब कहीं जाने की जल्दी नहीं,
भायखला छोड़ते रुक गई लोकल
आगे पानी, पीछे पानी
ऊपर पानी, नीचे पानी, पानी ही पानी
बहुत सारी मुंबई लौट रही है घरों को दफ्तरों से
कलाई पर छोटी सुई रेंगती ग्यारह तक चली गई,
अनिश्चय और हताशा की धुंध
पटरियों पर उमड़ता पानी गुलाटियाँ मार रहा
लोकल मात्र इंतजार कर सकती है, कर रही है,
श्रांत- क्लांत स्त्री-पुरुष
कंधों पर निढाल सिरों का पराया बोझ
आँखों में अधजगी नींद का खुमार
गीली रात पसर रही है हवा में,
कहीं दूर दादर, परेल, अँधेरी, माटुंगा की बस्तियों में
प्रतीक्षा की मोमबत्तियाँ
जलते-जलते गल कर बुझने लगीं हैं
रात्रि के कौनसे प्रहर कारावास से मुक्ति मिलेगी
बादल ही जानता है
पर मुंबई डूब रही है जलप्रलय में
और वह आकाश में बैठा
नीरो की शैली में बाँसुरी बजा रहा है.

* * *

 

सपना

 

उसके सपनों में इन दिनों
गिद्ध आने लगे हैं
इसलिए वह रातों में जगने लगा है
पर गिद्ध गिद्ध हैं
दिन में भी आ जाते हैं
अब वह न रातों में सोता है, न दिन में
उसने अपनी नींद
तब तक के लिए स्थगित कर दी
जब तक कि गिद्ध थक कर
किसी और रेगिस्तान में न चले जाएँ
जब तक कि
उसका आकाश छोटे परिंदों के लिए
खाली न हो जाए,
वह इन दिनों
उम्मीद के रंगीन कोमल परिंदों के लिए
दाने जोड़ रहा है
कि एक दिन
ज़िन्दगी के उजाड़ रेगिस्तान में
परिंदे आएंगे
परिंदे गाएंगे
परिंदे पर फड़फड़ाएंगे
परिंदे कंधों पर बैठेंगे
परिंदे कानों में गुनगुनाएंगे
परिंदे ज़िन्दगी को
फूलों की तरह महकाएंगे,
उसने रातों के साथ अनुबंध कर लिया है
वे बिना सपनों के आएंगीं
या सपनों में अपने साथ
गिद्धों को नहीं लाएंगीं।

 

 

भेड़िये

 

जब हम भेड़ियों के जंगल से गुज़र रहे होते हैं
और भेड़िये चुपचाप गुज़रने देते हैं
दाल में कुछ काला होता है
भेड़िये किसी बड़े जाल के ताने-बाने बुन रहे होते हैं,
भेड़िये जन्मजात भेड़िये होते हैं
जब वे कुछ नहीं कर रहे होते
बहुत कुछ कर रहे होते हैं
जब लगता है सुस्त पड़े हैं
पंजे और दाँत घिस कर
पैने कर रहे होते हैं,
कभी भौंकते हैं कुत्तों की आवाज़ में
तब कुत्तों की खाल ओढे होते हैं
बहुत वक्त़ नहीं लगता
बाहर निकलने में,
भेड़िये अपनी मांद तक
भेड़ों को प्रेम से पुचकार सकते हैं
कुछ भी कर सकते हैं भेड़िये,
इन दिनों भेड़िये शहर में रहते हैं
मिल जाते हैं कहीं भी दफ़्तर, बाज़ार, सड़क, राजनीति हर जग़ह
उनका वहाँ होना अपवाद नहीं नियम है,
हर जग़ह भेड़िये ही भेड़िये
और दूर तक
आग तो आग
चिन्गारी तक नहीं।

* * *

 

बिटिया से संवाद

 

“पापा! उस पानी में कौव्वा क्या कर रहा है?”
“बिटिया! कौव्वा नहा रहा है?”
“तो पापा! उसका टावेल कहाँ है?”

“पापा! एक और एक दो क्यों होते हैं?”
“मुझे नहीं पता बिटिया! बस होते हैं”
“पर क्यों होते हैं?”
“- – – – – -”

“अच्छा पापा! चंदामामा अपने घर क्यों नहीं आते?
वो दूसरे वाले मामा तो आते हैं”
“बिटिया! उनको हमारे घर का पता नहीं मालूम”
“तो पापा! चिठ्ठी लिख के बता दो ना”

“पापा! उजाला दिन में ही क्यों होता है?”
“क्योंकि, सूरज दिन में उगता है”
“पर पापा! सूरज रात में क्यों नहीं उगता?”
“ – – – – – -”

“पापा! मेरे पंख कब उगेंगे? मुझे मिठ्ठू जैसे उड़ना है”
“उगेंगे बिटिया! तेरे पंख भी उगेंगे कभी
और तू उड़ जाएगी”
“पापा! आपकी आँखों में पानी क्यों आ गया?”
“बिटिया! मेरी आँखों ने तेरे पंख देख लिये”
* * * *

 

राजेंद्र नागदेव-कवि चित्रकार वास्तुकार
प्रकाशित पुस्तकें
काव्यसंग्रह- ‘सदी के इन अंतिम दिनों में’ , ‘एक पत्ता थरथराता रहा’, ‘गूँगी घंटियाँ’, ‘चक्रवात सा घूमता है
शून्य’, ‘अंधी यात्राएँ’ , ‘पत्थर में बंद आदमी’, ‘सूर्य गिरा है अभी-अभी नीचे’, ‘आवाजें अब नहीं आतीं’, ‘उस
रात चाँद खंडहर में मिला’, ‘सुरंग में लड़की’, ‘चुनी हुईं कविताएँ’, ‘धूप में अलाव सी सुलग रही रेत पर’, ‘लौट
लौट कर आते हैं परिंदे’ आदि 17 हिंदी काव्यसंग्रह . यात्रावृत्त ‘धुंध और आकार’. अंग्रेजी काव्यसंग्रह
‘सायलेंटली शी बर्न्स एंड अदर पोएम्स’. अनुवाद- मराठी में अनूदित कविताओं का संग्रह ”अनेक रात्री पाहिजेत
“. कविताओं का जापानी, बांग्ला, उड़िया, मराठी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी में अनुवाद.
सम्मान / पुरस्कार ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’, हिंदी अकादमी, दिल्ली का ‘साहित्यिक कृति सम्मान’,
‘अ. भा. अम्बिकाप्रसाद दिव्य रजत अलंकरण’, ‘स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान’, भारत- एशियाई साहित्य
अकादमी, दिल्ली का ‘साहित्य सृजन सम्मान’, ‘सैयद अमीरअली मीर पुरस्कार’ आदि .
जलगाँव विश्वविद्यालय द्वारा ‘राजेंद्र नागदेव के काव्य में अभिव्यक्त समकालीन भावबोध’ शोध ग्रंथ पर पी एच
डी प्रदान की गई.
सम्पर्क मो – 8989569036
ईमेल – raj_nagdeve@hotmail.com

 

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