मेरी बात

दुनिया का चक्कर लगाने से

दुनिया के अंत तक नहीं पहुँचा जा सकता है

लेकिन अंत तक पहुँचे बिना

दुनिया के दर्दों से छुटकारा भी तो नहीं

तभी तो जानकार बुद्धिमान

पहुँचने की कोशिश करते हैं, दुनिया के अंत तक

एक बार जान लें अंत को, शांति में तो

नहीं रहती चाहना दुनिया की, या किसी और की

(गौतम बुद्ध)

 

 

आखिर क्या है यह अंत? दुनिया का अंत? या अंत में दुनिया, या फिर दुनिया में अंत? ना जाने कितने सवाल भटकते हैं मेरे दिलो-दिमाग में। ना जाने कितने दार्शनिकों ने बातें की हैं, दुनिया के बारे में, और इसके अंत के बारे में, और अंत के बाद की जिंदगी के बारे में। ज्यादातर कवियों ने इस पहेली को खोलने की कोशिश भी की है। लेकिन जब हम केवल जिंदगी की बात करते हैं, तो भी हम अंत के बारे में बात कर रहे होते हैं। यानी जिंदगी की खोज उसके अंत की खोज भी है। जिंदगी के भीतर जो ठसाठस भरी रहती है, वह है जिंदगी की अनुपस्थिति। जिंदगी के साथ जीते हुए हम हर पल ना जीने की अनुभूति को भी जीते हैं। फिर भी जिंदगी से ऊबते नहीं। हम चक्कर लगाते रहते हैं दुनिया का, कि किसी तरह पहुँच जाएँ जिंदगी के अंत तक। ज्यादातर हमारी पुकार पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाती रहती है। हम चार नहीं, पाँच दीवारों के बीच फँसे रहते हैं। जी हाँ, पाँच दीवारें… पाँचवीं दीवार हमारे सिर के ऊपर होती है। लेकिन क्या जादू है शब्दों में, किसी भी भाषा में लिखे हों, किसी ने भी लिखे हों, कहीं भी लिखे गए हों, यदि उनमें शक्ति है तो पहुँच जाते हैं पिपासुओं के पास, पाँचों दीवारों को भड़भड़ाते हुए, पाँचों दीवारों को तोड़ते हुए।

कृत्या के इस अंक में हमने इराक की फलीहा हसन की कविताओं को चुना है। उनकी कविताओं में सादगी से अपने आसपास की दुनिया को परखा गया है। हालांकि वे उस दुनिया की हैं, जिसने युद्ध की विभीषिका को महसूस किया है, फिर भी वे दुनिया के प्रति एक विचित्र ममत्व दिखाती हैं, जैसे अम्मी की कुकीज़ बनाने से पहले अम्मी दुआ करती हैं, कि गेहूँ में बरकत हो, खजूरों में मिठास भर जाए, तेल में जान आ जाए। यह सहजता जिंदगी की आध्यात्मिकता है, जिसे पढ़ने के लिए किताबों की जरूरत नहीं।

 

एलिसिया पार्टनोय की कविताएं कृत्या ने अनेक बार प्रस्तुत की हैं। विचित्र बात यह है कि एलिसिया की एक कविता में भी रसोई चली आई है। बड़े ही ऐहतियात से, एक शब्द लें/मिसाल के तौर पर, ‘डर’ शब्द। इस पर छिड़कें, खारे और कड़वे/पलायन का स्वाद।/लौह उंगलियों से इसे निचोड़कर/उदर के मुहाने पर डालें।

 

एलिसिया तो स्वयं युद्धपरक भयानक आतंक की भुक्तभोगी हैं। कन्सन्ट्रेशन कैंप में रह चुकी हैं, और आतंकी शासक के विरुद्ध खड़ी रही हैं, लेकिन इस कविता में एलिसिया भयानक स्थिति को बेहतर तरीके से परोसती हैं।

 

इन दोनों कवियों की कविताओं का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद बृजेश सिंह ने किया है।

 

तीसरी कवि हैं स्मृति अमृत, जो कृत्या में नयी हैं, लेकिन कविता विशेष अर्थ खोलती हैं। एक व्यंग्य देखिए: एक नेता बेच रहा था चौराहे पर/“अपनी गरीब टांगे दे दो/ बदले में गुलाब की चप्पल ले लो/ मुफ्त, बिल्कुल मुफ्त”

 

कविता के बारे में प्रस्तुत हैं रेशम का ताना-बाना बुनने वाले कवि हशम तुरबी-

काम हम करते हैं सदियों से रईसों के लिए,

कब पहनने को भला हमको मिला रेशम है।

उन्होंने कबीर की परंपरा का पालन करते हुए शब्दों को भी बुना है। उनकी गजलों का अंग्रेजी में अनुवाद बहुभाषाविद अनुराधा जी ने किया है।

प्रिय कवि के रूप में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कवि राजेन्द्र नागदेव, उनकी कविता की बानगी देखिए

जब हम भेड़ियों के जंगल से गुजर रहे होते हैं/और भेड़िये चुपचाप गुजरने देते हैं/दाल में कुछ काला होता है/भेड़िये किसी बड़े जाल के ताने-बाने बुन रहे होते हैं,/भेड़िये जन्मजात भेड़िये होते हैं/जब वे कुछ नहीं कर रहे होते

बहुत कुछ कर रहे होते हैं।

कवि अग्रज हैं चण्डीदास-चण्डीदास बंगाल की अप्रतिम भक्त कवि परंपरा के महत्वपूर्ण कवि हैं, उन्हें पढ़ना पुनः एक युग को महसूस कराता है।

 

आशा है यह अंक पाठकों को पसंद आएगा

शुभकामनाएं

रति सक्सेना

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