समकालीन कविता

समकालीन कविता में दुनिया के दो अलग छोरों से तीन कवयित्रियों की कविताएं प्रस्तुत हैं। यह समकालीन कविता की विशेषता है कि महिलाएं देश-दुनिया की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से ज्यादा रूबरू हो रही हैं। उनकी विषय-वस्तु भी समकाल से प्रभावित है।

 

 

पारुल पुखराज

 

1-

 
हर सुबह एक नई चुनौती है 
कल का जाना हुआ 
सूर्योदय के साथ 
हो गया पुराना 
 
फीके पड़े उस दिन का 
फिलहाल 
कुछ नहीं हो सकता 
वह शायद ही किसी काम आए 
 
आज सुलझाने के लिए 
नई पहेलियाँ हैं 
गोता लगाने के लिए ठंडा गहरा पानी 
वह भी अरसे से ठहरा हुआ 
 
 कहना है नए तरीके से 
 उसी एक शख़्स से बात 
 
 दोहराने के लिए जुमले चाहे लाख पुराने हों
 
……….
 
2-
 
जनगणना सर्वेक्षण करने आई महिला 
अधीरता से दरवाज़ा खटखटाती है 
गुस्से में प्रश्न दाग कर अनमनी सी बैठ जाती है 
कोई रोटी खाए या चावल उसे परवाह नहीं 
कहती है सरकार को वास्ता इन बातों से 
 
 
कोई दोपहिया रखे या चारपहिया 
उसे अपने पैरों पर दर दर भटकना है समूचा दिन 
अरुचि से पूछती है कितने स्मार्ट फोन हैं घर में 
कितने सदस्य 
फ्लोर मार्बल का है या टाइल जड़ा 
 
चाय पूछने पर हिकारत से देखती है 
उठती है ऊब कर 
ढपक कर चलती चली जाती है 
 
बैसाख के इस दिन जब पारा चढ़ता ही जाता है गर्मी का 
शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर बल्लियों के सहारे 
तान दी गई है हरी एक चादर 
कि निरंतर बरसती धूप से 
 
 लोग 
अंधरा न जाएँ कहीं
……….
 
 
3-
 
फल से रिक्त
वृक्ष पर
नियमित कई दिवस

जीव
लौटता है

डाल को
सरसा देती है
उदासी
………..
4-

कोई नहीं
देखता
न ही चुनता

निर्जन में
झरने के निकट

वनखंडी

और
एक बेचैन
रूह

लिपटी है
मादक गंध से

………..
5-
 
कांधे से पीछे गिरा जल रिक्त घट
उसने अंतिम बार
पिता को लगभग चिल्ला कर आवाज़ दी
जीवन में अंतिम बार पुकारा पिता

धू धू जलते काठ को पुत्र का वह रुदन
भेद सका या नहीं
कौन जाने

हज़ारों मील दूर
किसी नगर की सुबह
आर्तनाद वह

मेरे कलेजे के बीचोबीच
घुप गया

कटार की तरह
…………
6-
 
पड़ती होगी तुम्हारे नगर इतनी ठंड
कि रात भर गिरा पाला
सुबह बर्फ की पतली चादर सा प्रतीत हो

करते होगे वैसा ही स्वांग

अपरिचित
पारिवारिक मित्र बन जाते होंगे पल में
जीवन मरण होने लगता होगा साथ

आंगन में उतरती होंगी सीढ़ियां
फिसल जाते होगे उन पर
पांव ख़ाली चले जाते होंगे तुम्हारे

मोर की पुकार
कांधे पर तिरता
पंख सुग्गे का

चुनकर भेजते होगे किसी को पत्र में

प्राण पन न्योछावर कर
हर लेना प्राण खूब आता है
उदास ताकना सूनी गली भी

कलेवा के पीढे पर उभरता
धूप का चकत्ता
अब भी ढकते होगे हथेलियों से

कहो
खीर के लिए मन बेचैन होता है
हलक में अटकती है सूखी रोटी ?
 

परिचय-

पारुल पुखराज

दो कविता संग्रह प्रकाशित-‘जहां होना लिखा है तुम्हारा’, ‘सम्पूर्ण मालकौंस’

एक डायरी प्रकाशित- ‘आवाज़ को आवाज़ न थी’

जन्मस्थान – उन्नाव उत्तर प्रदेश

इन दिनों राउरकेला उड़ीसा में निवास

 

 

कैरोलिना रिवेरा एस्कैमिला

Carolina Rivera Escamilla

 

अनुवादक- बृजेश सिंह

 

अग्नि पुष्प


मेरे कुनबे की औरतें
नारंगी अग्नि पुष्प खिलाती हैं,
नारंगी रोशनी के फूल
अपने केशों में।
वे बादलों को चीरकर
बनाती हैं: खाइयां
झीलें,
नदियां,
और समुद्र।
उनकी बाहें हैं
जलावन लकड़ी के गट्ठर।
उनके हाथ भट्ठियां हैं,
जिनमें वे पनाह देतीं
रोशनी को।
उसे राख और बूटी संग गूंथकर
और पीस कर एक लेप बनाती हैं,
फिर उस दवा को मल देतीं
मेरे नन्हें पैरों पर,
सफ़र के उस पार जाने के लिए।


एल मोज़ोटे/उन्नीस सौ इक्यासी
(एल साल्वाडोर के एल मोज़ोटे गांव में हुए बाल-हत्याकांड की याद में)

 

तुम अपनी
मुट्ठी खोलती हो,
सात साल की बच्ची,
पर मैं, जुगनू,
उड़ान भरने में सकुचाती हूं।

 

चमकते सितारो,
हम तुम्हारे उस भय को रोशन करते हैं
जो खो गया
उस विशाल ब्रह्मांड के भीतर,
इस ‘कैंटन एल मोज़ोटे’ के
घने अंधेरे के अंधकार में।

 

झींगुरों की धुन पर,
तुम उस जगह कदम रखती हो
जहां तुम्हें सिखाया गया
कि प्रभु तुम्हारी रक्षा करेंगे।

 

हंसता हुआ सिपाही
उस्तरा निकाल लेता है।

 

बच्ची, पर तुम
महसूस करती हो
मानो लाखों जुगनू
तुम्हारे दिल में धड़क रहे हों।

 

रात की स्पंदित रोशनियां
तुम्हारे दिल में जान डाल देती हैं,
और तुम अलाव देखती हो
फिर चूल्हे को निहारती हो
जहां तुम्हारी माँ
अंगारों को फूंकती है
मानो सिपाहियों की रात की हँसी
धीमी पड़कर बुझ गयी हो।

 

तुम प्रवेश करती हो,
‘एल मोज़ोटे’ की धरती के
गर्भ में समाए अंधकार में ।

 

मैं तुम्हारी चीखों को लेकर
तुम्हारे हाथ से उड़ जाती हूं।

 

मैंने उन चीखों को
तुम्हारे गांव के पेड़ों के बीच
बांध दिया है।

 

सदियों तक
तुम्हारी रोशनी वहीं रहेगी,
तुम जब भी लौटोगी
—एल मोज़ोटे की उस रात के बच्चों संग ।

 

समय का पीछा

 

समय का पीछा
समय और अंतरिक्ष
है भी और नहीं भी
तुम बेचैनी में खोज रही हो
जो कुछ शेष है, उसके रेशे,
वो अनछुई स्मृति,
त्वचा,
रोशनी,
शाम, रात और दिन।
विचार की बयार कितनी अजनबी है
विस्थापित,
विस्थापित,
ढोंग कर रही है,
पर तालमेल के साथ
खुल रही है
निर्वासित समय-तट के सम्मुख,
निर्वासित समय-तट के सम्मुख।

 

क्या तुम्हें याद है, बहन?

हमने अपनी जवां पलकें झपकाईं,
और बरौनियां ऊपर उठाईं
उस पूरे लाल चांद की ओर
जो आम के पेड़ के पीछे,
गुआज़ापा की पहाड़ियों के ऊपर था ।

हम उसे खाना चाहते थे, पर,
हम अपने मुंह में,
सिर्फ़ मुट्ठी भर धूल ही भर सके ।

 

हमने गंदला बारिश का पानी पिया,
उन बच्चों की तरह जो गत्ते के घरों में रहते थे,
जिनकी छतें लहरदार टीन की थीं,
जिनका भविष्य सेना और गोलियों में उलझा था।

 

युद्ध छिड़ गया।
और हम बच्चे नहीं रह पाए ।

 

हमने एक-दूसरे को
खत लिखना शुरू कर दिया।
तुमने मुझे लिखा कि वह रास्ता
जिससे हम घर से स्कूल जाया करते थे
अब क्षत-विक्षत लाशों से भरा पड़ा है।
मैं तो पहले से ही निर्वासन में थी।
अब हम, पुरानी लड़ाइयों के बच्चे, आज के युद्धों में उलझे हुए हैं।

बहन, निर्वासन ऐसा माइग्रेन है
जो पूरे बदन में होता है।
मैं आज भी उन पलों को कैद करना चाहती हूं
जब हम बच्चे थे…

 

कैरोलिना रिवेरा एस्कैमिला

अल साल्वाडोर में जन्मीं कैरोलिना रिवेरा एस्कैमिला एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, लेखिका, कवयित्री, डॉक्यूमेंट्री निर्माता सांस्कृतिक कार्यकर्ता और साहित्यिक कार्यक्रमों  की आयोजक हैं। साहित्य में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए वे ‘पेन अमेरिका इमर्जिंग वॉयसेस फेलो’ (PEN America Emerging Voices Fellow) रह चुकी हैं।

उनका पहला कहानी संग्रह “…after…” 2015 में वर्ल्ड स्टेज प्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया। 2023 में उनका पहला नाट्य काव्य संग्रह “इन अ कॉर्नर ऑफ़ योर कंट्री” प्रकाशित हुआ, जिसका स्पेनिश संस्करण “एन उना एस्क्विना डे टू पाइस” (En una Esquina de tu País) मार्च 2024 में आया। उन्होंने 2011 में “मैनलियो अर्गुएटा, पोएट्स एंड वोल्केनोस” नामक डॉक्यूमेंट्री का सफल निर्देशन, लेखन और निर्माण किया है।

कैरोलिना की रचनाएं ‘कोलैटरल डैमेज: वुमन हू राइट अबाउट वॉर एंथोलॉजी’, ‘माइग्रेंट एंथोलॉजी’, ‘समव्हेयर वी आर ह्यूमन्स’, ‘अल्टाडेना पोएट्री रिव्यू एंथोलॉजी 2026’ और ‘सेंट्रल अमेरिकन वुमन इन डायस्पोरा एंथोलॉजी 2026’ जैसी कई प्रतिष्ठित एंथोलोजी और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

 

अनुवादक- बृजेश सिंह

 

कवि और अनुवादक बृजेश सिंह का एक कविता संग्रह ‘अपने-अपने कैनवास’ प्रकाशित हो चूका है। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर बृजेश वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं। उनकी कविताएं विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकलनों सहित हिंदी और अंग्रेजी की प्रमुख ई – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं, और वह ‘कृत्या’ (Kritya) से संपादकीय टीम के सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं।

 

 

बबिता  कुमावत

 

1..

 

यह पिछली सदी के
थकान से भरे आख़िरी दिनों की बात है
जब दुनिया बदलने की घोषणाएँ
अख़बारों और भाषणों में बहुत थीं
पर आदमी भीतर से
धीरे-धीरे पत्थर होता जा रहा था।

 

तभी तुम मिले थे मुझे
अपने कंधों पर घरों की चिन्ताएँ ढोते हुए
आँखों में अधूरी नींद
और जेब में कुछ टूटे हुए सपने लिए।

 

तुम्हें देखकर लगा था
अब भी बची हुई है पृथ्वी पर
थोड़ी-सी मनुष्यता।
कि अब भी कोई पुरुष
सिर्फ़ कमाने की मशीन नहीं हुआ
अब भी उसके भीतर
एक बच्चा छिपा बैठा है
जो बारिश में भीगना चाहता है
और बिना डरे रो लेना चाहता है।

 

मुझे लगा था
एक दिन ऐसा आएगा
जब पुरुषों को
लोहे की तरह मज़बूत होने की शर्त पर
स्वीकार नहीं किया जाएगा।

 

जब उनसे नहीं कहा जाएगा
“मर्द हो, दर्द मत दिखाओ।”
और वे
अपने पिता की तरह
चुप्पियों में बूढ़े नहीं होंगे।

 

2….

 

तुम मेरे जीवन में
किसी पुराने बरगद की छाँव की तरह आए थे।
धीरे-धीरे जाना मैंने
कि पुरुष होना
सिर्फ़ अधिकार नहीं होता
वह एक लम्बी थकान भी है।

 

घर की दीवारों पर
जितनी उम्मीदें टँगी होती हैं
उनका वज़न
अक्सर एक पुरुष की पीठ पर रखा जाता है।

वह मुस्कुराता है
ताकि घर में भय कम लगे
वह हारकर भी कहता है
“सब ठीक हो जाएगा।”
जबकि भीतर
बहुत कुछ टूट रहा होता है।

तुम्हारी हथेलियों में
मैंने श्रम की कठोर रेखाएँ देखीं
और उन रेखाओं के बीच
एक अजीब-सी कोमलता भी।

 

तुम बहुत कम बोलते थे
शायद इसलिए कि
तुम्हें सिखाया गया था
भावनाएँ कमज़ोरी होती हैं।
मैं तब कहाँ समझती थी
कि पुरुषों की चुप्पी भी
एक भाषा होती है।


3..

अब इतने बरस बाद
जब समय और अधिक निर्मम हो गया है
मैं देखती हूँ
पुरुष लगातार
अपने भीतर से निर्वासित किए जा रहे हैं।

 

उनकी संवेदनाएँ
मज़ाक में बदल दी गई हैं
उनके आँसू
असफलता मान लिए गए हैं।

वे प्रेम करते हैं
पर स्वीकार नहीं करते
वे टूटते हैं
पर बिखरने की अनुमति नहीं पाते।

 

समाज ने उनके लिए
कुछ तयशुदा चेहरे बना दिए हैं
कमाने वाला चेहरा
मज़बूत चेहरा
निर्णय लेने वाला चेहरा।

 

इन चेहरों के पीछे
जो थका हुआ मनुष्य है
उसे कोई नहीं देखता।

और फिर भी
वे हर सुबह उठते हैं
अपने भीतर के अँधेरे को
जेब में रखकर।

 

प्रेम आज भी
उन्हें बचा सकता है
अगर कोई
उनकी चुप्पियों को सुन सके।

 

अगर कोई कह सके
तुम्हें हर समय मज़बूत होने की ज़रूरत नहीं।
चार
मैं आज भी मानती हूँ
दुनिया तब बेहतर होगी
जब पुरुषों को भी
मनुष्य होने की पूरी छूट मिलेगी।

 

जब वे
अपनी थकान कह सकेंगे
अपने डर स्वीकार सकेंगे
और प्रेम को
कमज़ोरी नहीं समझेंगे।

उस दिन शायद
युद्ध थोड़े कम होंगे
और घरों में
थोड़ी अधिक रोशनी होगी।

 

क्योंकि संवेदनहीन पुरुष
सिर्फ़ स्वयं को नहीं
पूरे समाज को कठोर बना देते हैं।

 

और प्रेम
वह आज भी
सबसे बड़ा प्रतिरोध है।

4…

 

दियों के किनारे बैठी
पृथ्वी रो रही है
वन कट रहे हैंपहाड़ टूट रहे हैं
नदियाँ सूख रही हैं
हिमखंड पिघल रहे हैं
ऋतुएँ मर रही हैं…
संवेदनाएँ मर रही हैं
नागरिको!

 

मनुष्य हार रहा है
डूब रही है करुणा
विश्वास डूब रहा है
संबंध डूब रहे हैं
भाषाएँ डूब रही हैं
लोकगीत डूब रहे हैं

 

भविष्य के बच्चों की हँसी
कारखानों के धुएँ में घुट रही है…
नगरों में
काँच की इमारतों के भीतर
अकेलापन चीख रहा है
गाँवों की पगडंडियों पर

भूख नंगे पाँव चल रही है
विद्यालयों के बाहर
अपने सपनों को बेच रहे हैं बच्चे
अस्पतालों की कतारों में
मृत्यु टिकट बाँट रही है…
विज्ञान के हाथों में
विनाश के औज़ार हैं
राजनीति के मुख पर।

 

झूठ का उत्सव है
धर्म के बाज़ारों में
ईश्वर नीलाम हो रहा है,

 

सभाएँ मौन हैं
संविधान थका हुआ है
न्यायालयों की सीढ़ियों पर
सत्य घायल पड़ा है…

समुद्रों में
तेल के साथ बह रही हैं मछलियाँ
आकाश में
धुएँ के साथ उड़ रही हैं चिड़ियाँ
धरती के सीने पर
बारूद बो रहे हैं शासक,

सीमाओं पर
युवाओं की देह से
राष्ट्रगान लिखा जा रहा है…
सब कुछ टूट रहा है

 

मनुष्यो!
सभ्यता अपने ही हाथों
अपनी कब्र खोद रही है।

 

कब जागेगी हमारी चेतना?
हम कब सीखेंगे
एक दूसरे की आँखों में
मनुष्य को पढ़ना?
कब रोकेंगे
घृणा की मशीनें?

कब बचाएँगे
पृथ्वी की अंतिम हरियाली?
सूरज तप रहा है
नदियाँ रो रही हैं
आकाश बीमार है
हवाएँ जल रही हैं।

 

 

बबिता कुमावत(सहायक प्रोफेसर)

शिक्षा -एम ए. बी एड. नेट, पीएचडी शोधार्थी,

ई मेल- bkumawatbarni13@gmail.com

मोबाईल नंबर- 9928291605

संप्रति –

सहायक प्रोफेसर, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना, सीकर(राजस्थान)

प्रोफेसर बबिता की कविताएँ-देश विदेश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गजल, कविता, कहानी, लघु कथा व शोध आलेखों का प्रकाशन, मन की उमंग (साझा काव्य संग्रह ), सब अंधकार मिट जाएगा (साझा काव्य संग्रह) दो रोटी की बात (साझा काव्य संग्रह) सड़क किनारे सपने (साझा काव्य संग्रह) व विभिन्न पुस्तकों में शोध आलेख ।

लेखन का उद्देश्य – समाज में व्याप्त महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को दूर करना, लोगों में जागरूकता पैदा करना, अपनी भावनाओं को लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त कर आत्म संतुष्टि प्राप्त करना।

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