कविता के बारे में

किंशुक शिव

 

धार्मिकता के अतिरेक ने साहित्य से दार्शनिकता को छीन सा लिया है। जीवन केवल वही नहीं जो दिखाई देता है, बल्कि वह भी है जो अन्तर्लीन होता है। एक लेखक का चिन्तन द्विमुखी हो सकता है, दरअसल भीतर झांकने की प्रवृत्ति मनुष्य को बहुत कुछ भीन्न सोचने को बाध्य कर सकती है, और सृष्टि को बेहतर समझने में सहायक होती है। किंशुक शिव की कविताएं इस मामले में बेहद अन्तर्मुखी है, और अज्ञात की पड़तालमें चिन्तन को विस्तृत करती है। यह अन्तर्लीनता संभवतया उनके भौगोलिक परिवेश, अथवा व्यक्तिगत घटना के कारण संभव हो सकती हैं, लेकिन हिन्दी की युवा कविता को अलग मायने जरूर देती हैं। यही कारण है कि किशुंक को पढ़ना जरूरी भी हो जाता है।

 

अरावली

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दीर्घ होने के लिए

पैर जमाने पड़ते हैं

युगो तक,

 

ध्यान में पैवस्त हो जाते हैं तरू,

गिरी के श्रृंग

हो जाते अतीव शरणास्थली

शकुन्त की,

 

समृद्ध हो जाते जिनसे जब

वनवंश

देश और इतिहास

नहीं रह जाते तब पत्थर केवल पत्थर

शिलाएँ नहीं रह जाती तब

केवल जड़,

 

लिए अपनी दृढ़ता उदार,

जीवन का उत्स होता है वहाँ..

 

तैरता कोई आकार नहीं वह

जो नष्ट हो जाएगा काया की भाँति

आत्मा की तरह वह है अनश्वर

पर्वताकार बन रह आया है जो सधा, उन्नत

ऊर्ध्वगामी,

 

जैसे..

विष्णु भुजा पसरी हो

शीश पर चंद्र ठहरा हो

शिवलिंग हो कोई परम

रोम रोम में हो जिसके तपिष्ठ पार्वती,

 

कौन टिका है मान्यताओं में

विचार में स्वयंभू श्रेष्ठ होकर

अभिमान लिए इस धरा पर सदैव,

कोई नहीं..

 

साक्षी बनने इस अभिश्राप का

हम निष्कृष्ट, बलहीन

कृतघ्न ही बचे हैं

जो थूक भी नहीं सकते

अंतहीन पिपासा की ओर

मुख करके, विद्रोह से ।

 

कष्ट है कि इस लोकतंत्र में कितने क्षुद्र है हम

 

 

आत्मा के अंकुर से

 

चेतना से आविर्भाव हुआ है

जगत का,

या जगत ही चेतना का

प्रश्रय है ?

 

याकि प्रतिबिंब..

और आभास है..

जगत और चेतना,

 

स्वयं के

चैत लिए उपजा

एक विस्मय विभोर क्षण केवल,

 

अनुग्रह की लीला है

या कि लीला है

अनुग्रह की

अहं ब्रह्मास्मि के

असीम में,

 

कपट है भीतर

या कि वृत्ति है नैसर्गिक

कपट की,

 

बीज है फल में

याकि आत्मा का ही

अंकुर है, सर्वत्र

 

जो उपस्थिति है

वही अनुपस्थिति का शून्य

अगर है..

तब कितना नश्वर होकर भी

अनश्वर हूँ मैं

स्वयं की सन्निधि में ।

 

 

 

एक स्वप्न का पराभव.

 

जीवन एक परास्त तितिक्षा है

 

जो तुम देखती हो

कि उग आए है

कितने ही व्यर्थ

अंग मुझमें/मुझसे..

चहुं ओर

अपनी ही इच्छा से,

 

मैं जो एक विस्तार था

अगत,अगम्य, अनंत.

 

निधि लिए प्रकाश की,

विचार की कितनी ही

आकाशगंगाएँ

काल के कितने ही

प्रमेय लिए,

 

अबूझ था मैं…

किंतु असंग

 

श्राप तोड़ने को

निहितार्थ स्वयं का

केन्द्र जो रहा

प्रस्तुत हूँ,संसार के मध्य

अनेक होकर,

 

यह हीन इच्छा मेंरी

नाश कर चुकी है

दर्प का मुझमें

 

अक्षत, अखंड़ न रहा

पराभूत अब मैं

वश में हूँ जगत के..

 

यह जो तुम देखती हो

परास्त तितिक्षा मुझमें

एक प्यास का परिणाम हैं..

रेगिस्तान की मरिचिका है जान लो

अस्तित्व मेरा,

 

मैं वह कब था जो दिखता हूँ

अनगिनत बार, अनेक रूपो में

तुम्हारे नेत्रों को,

 

मैं

स्पर्श हूँ स्मृति का मात्र

चाहे तो स्वप्न कह लो ।

 

 

चैतन्यम्

 

आग्रह किसका है बंधु

 

क्रम को सार मानकर

बहुधा

एक से एक को ज्योति

दिखाकर सम्पूर्ण

स्वरूप को जानने की

अभिलाषा में जानते हो

क्या है त्रुटि ?

 

कि जो प्राप्त है

वह सुलभ

चैतन्य,

अधीरता से

ज्योति की चेष्टा से

आ गया है

अपने ही अज्ञान की

स्याह ओट में,

 

स्वरूप को भूलो

“अस्तु”

से लौट जाओ

 

दीर्घ मौन लिए अपना

श्रेष्ठ ही जो प्राप्त है

उसकी सुधि लो

अन्य कोई श्रेय नहीं

हे चैतन्यम् …

 

ठहरो प्राण में

जानकर यह कि

जिज्ञासा पुनः पुनः की तृप्ति भर है,

आस्तित्व की प्रत्यंचा है

वेध की वृत्ति लिए ।

 

पथहीन, संज्ञाशून्य

 

लौटा न पथ

मेरे विराम को..

 

कितनी टूटी

पंक्तियों की आस्था

चुपचाप निर्मूल होकर

धँसी रह गई

श्वास के हिस्से जैसी

भीतर,

 

कांपा कोई स्वर

हृदय की भीत से,

लज्जा से

रह गया शेष, अपूर्ण अतृप्त

जिसकी प्रेत उपस्थिति से

अस्तित्व लरजता था,

 

जो सम्भालता इसे

वह प्रेम डूब रहा है

वह जैसे कभी था ही नहीं,

 

इतने अविश्वास से गिरा

संसार में

प्रकाश पाकर भी,

 

अंततः निरवलम्ब हुआ,,

 

अंधकार निगल रहा है

आकंठ मुझे अपने हिस्से का

गहरे बहुत गहरे.

 

 

 

किंशुक शिव,

होमियोपैथिक चिकित्सक

वर्तमान में स्वयं का व्यवसाय

और फ़ेसबुक पर सक्रिय लेखन में सहभागिता

दो साझा संकलन प्रकाशित ।

 

 

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