समकालीन कविता
फलीहा हसन (इराक)
अनुवाद बृजेश सिंह
स्टालिनग्राद
मैंने कुछ पलों के लिए उन जंगलों की आस की, जो मेरे लिए ही उगे हों,
मैं ख्वाब में उन्हें सहलाते हुए, अपने दिल की धड़कन महसूस कर सकती थी
पसलियों तले छिपकर जो मेरी यात्रा को आशीष देता।
मुझे उस स्पंदन से पुकारता, जिसे वह मुझमें पहचान लेता।
मैंने परवाह के पल से उपजे, लावारिस धुएँ का शोर सुना
जो लालसाओं को ज़बरदस्ती एक अनजानी जगह तक धकेलते हुए मुझसे आ मिला।
मेरी रूह उसकी ओर खिंची चली गई,
साँसों को ज़िंदा निगलने वाले अधरों पर एक सिहरन सी हुई,
मैं लज्जित हुई,
पर मेरी नज़र,
उन पलों में—मुझे शायद ही पता था कि उसे क्या कहूँ—मुझे दूसरी राह पर,
टेलीविज़न की ओर ले गई, जहाँ मैंने मौत बरसाते . . . युद्धक विमान देखे।
ठीक उसी पल, मशीन गनों की गोलियों ने सभी जिस्मों को छलनी कर दिया,
और एक दूसरी अगन ने मेरे जिस्म को घायल कर दिया
जब मैंने अपनी नज़र उसकी ओर घुमाई
जो हिचकिचाते हुए अपना सिर कंधे की ओर झुका रहा था
और युद्ध के सितारों के राज़ से अनजान था
अथवा अनिद्रा में था।
ओह . . . . मैंने अपना सिर उस पर टिका दिया!
और जब उसने इस स्तब्ध इंसान को सहलाया
तो मुझे उसकी उंगलियाँ अपने अन्दर सुलगते अंगारों सी महसूस हुईं।
लज्जा ने वो बहाना थाम लिया, जो इस छुअन ने दिया . . . और विलीन हो गई,
दूरी मिटती रही, जब तक कि हम दोनों एक न हो गए।
और नज़र—वह कराह उठा: शायद मुहब्बत मुझे उस नज़र के लिए माफ़ न करे—
फिर से एक और बहाने की ओर मुड़ गई
उन इंसानों की बौछार की ओर,
जिन्हें एक इमारत में घुसते हुए पायलट की ज़रा सी सरसराहट ने हवा में उछाला था
और जो ब्रेकिंग न्यूज़ के मलबे की तरह स्क्रीन पर आ गिरे।
मगर उसकी साँसें . . . गाल के नीचे बिखरती रहीं,
और उसकी तस्वीर को धुंध में बदलते हुए
मानो स्क्रीन पर लाशों के भँवर हों. . . मौत के अलग-अलग रूप अपने साथ लाए हों।
रूह जिस्म हो गई,
वो जिस्म जो एक छुअन की खातिर बिक गया हो,
जो नज़र उसके व्यक्तित्व पर टिकी हुई थी
अब भीषण आग की लपटों के करीब पहुँच गयी।
हर कोई एक-दूसरे के करीब आ रहा था,
हर कोई,
हर कोई,
हर कोई।
लेकिन उनकी मशीन गनों की गड़गड़ाहट ने उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया:
लाशों पर लाशों के ढेर लग गए,
मेरा मतलब, मेरे ऊपर,
और उनमें मौजूद इंसानों की आँखों की रोशनी बुझ गई। वे खामोशी की खाई में सो गए।
मेरी पलकें खुलीं—एक ऐसी सजगता में, जो उन्हीं ख्यालों में डूबी थी।
मैं उठी… और उदासीनता को गले लगाया,
यह छायाचित्र स्टालिनग्राद-स्मृति समारोह में मुझे ले आया।
मेरी अम्मी की कुकीज़
सामग्री:
“हर तरह का आटा, कुछ खजूर, जरा सा तेल, इलायची, पानी के छींटे, और चुटकी भर चीनी”
बनाने का तरीका:
अगर दुनिया भर की औरतें जमा हो जाएं, तो कोई भी वैसी कुकीज़ नहीं बना सकती जैसी मेरी अम्मी बनाती थीं।
वो दुआ करती थीं
कि गेहूँ के दानों में बरकत हो, ये हवा सी हल्की हो जाए,
कि खजूरों में मिठास भर जाए और स्वाद रच जाए,
तेल में जान आ जाए, और वह समुद्री जीव की मानिंद हिलने-डुलने लगे,
इलायची दाने, ओखली के बीच रेशम के अणुओं से नाचने लगें।
जब यह पक जाती, तो ऊपर से चीनी छिड़की जाती, उनमें गर्माहट भर जाती और चमकने लगती,
वो इसे बाहर निकालते हुए कहती जातीं :
– “हे ! अम्मी-अब्बू, यह आप के लिए है, मन लगाकर और फायदेमंद समझकर खूब खाइए।”
वे चुपचाप आते,
गार्डिनिया के फूल की तरह खिलते हुए, पूरे घर को खुशबू से भर देते,
साल 2006 में
वे उन्हें अपने साथ ले गए
मेरी अम्मी को
और हवेली ढह गई
मेरे बिस्तर पर यतीमी छा गयी
और
ज्यों ज़मीं पर ज़मीन गिर पड़ी हो, मेरे अब्बू भी चल बसे।
युद्ध की बौछार
हमारी अम्मियां, जो हमसे उतना प्यार करती थीं
जितनी हम खुद से भी नहीं करते,
युद्धों से स्तब्ध थीं।
वे हमारी ज़िंदगी पर वो मरहम लगाना ही भूल गईं,
जो युद्ध को हमसे दूर रखता।
इसीलिए, जब भी कोई शहंशाह होश में आता है,
और वफ़ादार सिपाहियों की खाल से बने
जीत के जूते पहनता है,
और फिर हाँफते हुए—
फरेब के मंच से—
सड़ी-गली तकरीर करता है;
जैसे ही वह अपना मुँह खोलता,
उसके शब्दों की बौछार हम पर आ पड़ती है,
और हमारी ज़िंदगी—
युद्ध के फोड़ों सरीखी—
सड़ने लगती है।
कवि, शिक्षिका,
संपादक, लेखिका और नाटककार हैं, जिनका जन्म 1967 में इराक के नजफ़ में हुआ था , वर्तमान में वे अमेरिका में रहती हैं। फलीहा इराक में बच्चों के लिए कविताएँ लिखने वाली पहली महिला थीं। उन्होंने अरबी साहित्य में अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की है और अब तक 29 पुस्तकें प्रकाशित कर चुकी हैं; उनकी कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी, तुर्कमेन, बोस्नियाई, भारतीय, फ्रेंच, इतालवी, जर्मन, कुर्दिश, स्पेनिश, कोरियाई, ग्रीक, सर्बियाई, अल्बानियाई, पाकिस्तानी, रोमानियाई, मलयालम, चीनी, ओडिया, नेपाली और मैसेडोनियाई भाषाओं में किया गया है। वह 2018 में पुलित्ज़र पुरस्कार के लिए और 2019 में पुशकेरेट पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थीं।
एलीसिया पार्टनॉय (Alicia Partnoy) (अर्जेंटीना )
अनुवाद बृजेश सिंह
प्रयोग
बड़े ही ऐहतिहात से, एक शब्द लें
मिसाल के तौर पर, ‘डर’ शब्द।
इस पर छिड़कें, खारे और कड़वे
पलायन का स्वाद।
लौह उंगलियों से इसे निचोड़कर
उदर के मुहाने पर डालें।
आंतों में मिचलन,
टिकने का कोई अडिग आधार नहीं,
पुतलियों में उठता श्वेत ज्वार,
विशाल खंजरों से चीरी हुई हवा।
…यदि इस प्रयोग से नहीं निकलता
नतीजा,
तो पूरा मुंह खोलें और खांसकर उगल दें: नहीं!
भारी बूटों और छर्रों के उस हमले पर।
आर्स …
हर पराजय
एक समय उगा लेती है
विक्षिप्त पंखों का एक जोड़ा
एक अभिशप्त पुष्प
पहलू में
चीरकर खुला हुआ
एक भटका मोती
कंठ से
चीखती हुई आवाज़ के
ठीक बगल में
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी आवाज़
आह
नमक बोए खेत
ह
म
को
कि
त
ना
दुख देते हैं !
काव्य
मैं लिखती हूँ, तलछट से खोजते हुए:
एक पत्थर, एक ज़ंग लगा डिब्बा,
एक टूटी सीप, एक बिछड़ी चप्पल,
लूटे हुए खज़ाने से भरा संदूक,
और कभी-कभी
एक लाश,
जिसे मैं सतह पर लाती हूँ, पुनर्जीवित करती हूँ।
मैं उसे जगाती हूँ
क्रिया और विशेषण के थप्पड़ से,
और फिर वह
लगभग हमेशा ही
मेरे साथ गायब होने का कुटिल छल कर जाता है—
मेरी कविता के स्पर्श मात्र से ।
एलीसिया पार्टनॉय (Alicia Partnoy)
अर्जेंटीना की एलीसिया पार्टनॉय एक मशहूर लेखिका, मानवाधिकार कार्यकर्ता और राज्य-प्रायोजित हिंसा की सर्वाइवर हैं। उनकी मशहूर किताब, ‘द लिटिल स्कूल’, को अर्जेंटीना के नरसंहार मुकदमों में ऐतिहासिक सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। आपकी ‘फ़्लावरिंग फ़ायर्स’ जैसे पुरस्कृत कविता संग्रह के साथ-साथ कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। वे एमनेस्टी इंटरनेशनल की पूर्व उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। वर्तमान में, वह ‘प्रोजेक्टो VOS’ की संस्थापक सदस्य के रूप में दुनिया भर के पीड़ितों (सर्वाइवर्स) की आवाज़ उठाने का काम करती हैं।
अनुवादक- बृजेश सिंह
कवि और अनुवादक बृजेश सिंह
का एक कविता संग्रह ‘अपने-अपने कैनवास’ प्रकाशित हो चूका है। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं। उनकी कविताएं विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकलनों सहित हिंदी और अंग्रेजी की प्रमुख ई – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं, और वह ‘कृत्या’ (Kritya) से संपादकीय टीम के सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं।
स्मृति अमृत
शीर्षक:गुलाब की चप्पल
चौखट के किनारे ही रखी थी,
गुलाब की चप्पल ;
हल्की गुलाबी ,नरम,गद्देदार, सुगंधित
बिल्कुल सपनों जैसी
गुलाब की चप्पल
फीते पंखुड़ियों जैसे कोमल
पिछले शनिवार ही खरीदी थी
बाबा ने मेले से
गुलाब की जिद पर
एक नेता बेच रहा था चौराहे पर
“अपनी गरीब टांगे दे दो
बदले में गुलाब की चप्पल ले लो
मुफ्त बिल्कुल मुफ्त “
अनपढ़ गुलाब बिस्तर पर बैठा
अपनी खरीदी गुलाब की चप्पल देख
मुस्कुरा रहा है
नींद में ही सही पर दौड़ लगा रहा है ।
मैं,तुम और प्रेम
जब अनायास ही कोई प्रश्न करता है मुझसे,
“यह प्रेम क्या होता है?”
चित्त कहता है कि कह दूं,
जब ” मैं ” और “तुम”
“हम” में विलीन हो जाते हैं
तब प्रेम होता है…….
क्षण भर का हठात वियोग
जब हृदय को काले मेघों से घेर लेता है
भावनाओं का भंवर
आंखों में सैलाब बन उभरने लगता है
उस पल में प्रेम होता है…….
नयनों में उसके छलके दर्द को देख
जब “तुम” की भुजाएं फड़कने लगती हैं
वहीं उसकी अधरों की मुस्कान से
जब हृदय में सरगम बजने लगती है
हां !तब प्रेम होता है……
जब रूठ जाए “मैं” ,”तुम”से
फिर अकस्मात ही “तुम” के
स्वर पर “मैं” का दिल जोड़ों से धड़के
तब उस तेज; गहरी; गर्म सांस के प्रवाह
में प्रेम होता है ….
बीहड़, पथरीले राह में
खंडहर को महल बनाने की आस में
जब “मैं” विश्वास से “तुम” के हाथों को थामता है
और सफर इंद्रधनुष सा गुनगुनाता है
हां !तब प्रेम होता है….
“मैं” के चेहरे की सिलवटों में
जब “तुम”अपनी तरुणाई से रूबरू होता है
श्वेत पड़ते उसके केशों में
रजनीगंधा के पुष्पों को जड़ता है
वक्त तब ठहर जाता है
हां !तब प्रेम होता है…..
फ़क़त प्रेम होता है……
–
मेरा गांव
गांव खो गया कहीं मेरा,
मलबे के ढेर में
सुना है किसी शिल्पकार ने
शहर बसा दिया है वहां।
मुट्ठी भर चने में काटी थी जहां दुपहरी
संग दोस्तों के डगों में नापी थी जहां डेहरी
चाची संग गप्पों के जंग में जहां जीती थी
असीम टेकरी
बड़े बाउजी की डांट पर “हिटलर वाले”
तमगे की फिरकी।
कुरेदा बहुत,
खूबसूरत अतीत की यादों के फव्वारे से
सुना है धार ही खत्म कर दी
शिल्पकार ने
जंग लगा कर ईर्ष्या की।
जलाया धीमे धीमे धीमे
प्रेम को जलन की भट्टी में
सींचा उसे स्वार्थ और लालच के पानी में
जो निकली मतलबी ईंटें
करीने से जोड़ी उससे इमारतें
सजाया उन्हें लालच की
चमकदार रोशनी की झालरों से
बांधा आंखों को आंगन द्वार से बड़ी
स्क्वेयर फीट वाली पट्टी से
चेहरे तो अभी भी वही थे लोगों के
संग वस्त्र अनोखे नगरों के
बस नहीं था तो गांव
शहर बसा दिया है उस शिल्पकार ने दिलों में
गांव खो गया कहीं मेरा, मलबे के ढेर में।
सुतली अगरबत्ती
चर्र चर्र करती अलमारी की सिटकनी
धूल जमी कसी साड़ी की पोटली
दम तोड़ चुकी जिसमें डिग्रियों की मूर्ति
उसे पूजती गंध विहीन सुतली अगरबत्ती l
थी शिक्षित,योग्य, समर्थवान सुतली
बांधे जब विभक्त को तो बन जाए मृत्युंजयी
लताएं लिपट जिससे असमां को उछली
खूंटे से बंध जाए तो है सीमा की चौकी
जल जाए जो दीप संग, दे डाले तम को चुनौती
बंध जाए जो पतंग से तो अनंत उड़ान चूमती
एक दिन बन गई विवाह योग्य युवती
ऊंची चहारदीवारी संगमरमर के फर्श वाले
महल में ब्याही गई
सपनों में लिए नई बुलंदी
चुनरी में शर्माते रखी अलमारी में
उसने अपनी डिग्रियों की पोटली
मुंह दिखाई में आई
” समाज लाज ” की सिटकनी
बावली प्रेम में ,सजा बैठी अलमारी पर वह सिटकिनी
अगरबत्ती बन जल रही अब
सुतली की गंधविहीन जीवित पुतली ।
स्मृति अमृत, बिहार की निवासी, साहित्य में रुचि, वित्तीय संस्थान में कार्यरत।