मेरी बात
पोलिश साहित्य अपने आप में महत्वपूर्ण रहा है। इस साहित्य ने दो नोबेल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार दिए हैं: 1980 में ज़ेस्लॉ मिलोज़ (Czeslaw Milosz (1911 – 2004)) और 1996 में विस्लावा शिम्बोर्स्का (Wislawa Szymborska) (1923 – 2012)। इसके अतिरिक्त पोलिश साहित्य में “थ्री बर्ड्स” के नाम से प्रसिद्ध हैं: एडम मिकीविच (Adam Mickiewicz (1798 – 1855)), जूलियस स्लोवाकी (Juliusz Slowacki (1809 – 1849)), और ज़िग्मुंट क्रासिंस्की (Zygmunt Krasiński (1812 – 1859))। कवि, नाटककार और उपन्यासकार तादेउज़ रोज़विक्ज़ (Tadeusz Różewicz (1921 – 2014)) भी पोलिश साहित्य के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। फिर भी यह अद्भुत है कि अधिकतर क्लासिक पोलिश साहित्य पोलैंड से बाहर रचा गया है।
हममें से अधिकतर नहीं जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के नाजी कैंपों में यहूदियों के अलावा पोलिश भी बंद थे; उन्हें भी वह सारी यातना सहनी पड़ी, जो यहूदियों ने झेली। यही नहीं, युद्ध के बाद सबसे अधिक विस्थापन उनका हुआ। नए देश में वे पुनः अशिक्षित कहलाए, क्योंकि भाषा नई थी और व्यवहार भी। अधिकतर पोलिश जन मजदूरी का काम करके परिवार पालते रहे, जिससे उनकी दूसरी पीढ़ी को बेहतर शिक्षा और जिंदगी मिली।
पोलिश नए देश में जाकर बसे, लेकिन उन्हें सदैव ही अपमान झेलना पड़ा। जोन गुजलास्वकी ने कृत्या से एक इंटरव्यू में कहा था कि बचपन में उन्हें अपने माता-पिता के रहन-सहन और बोलने के अंदाज पर शर्म आती थी, इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी साहित्य पढ़ा, जिससे वे बेहतर अंग्रेजी लिख और बोल सकें। लेकिन धीरे-धीरे जब उन्होंने माता-पिता के किस्सों पर ध्यान देना शुरू किया, तो पाया कि उन्होंने बेहद अपमान और शारीरिक-मानसिक वेदना झेली। वे दोनों बुकनवेल्ड कन्सन्ट्रेशन कैंप में बंदी थे, जो भाग्यवश जिंदा बच गए। अप्रैल 1945 में अमेरिकी सैनिकों ने बुकनवेल्ड कन्सन्ट्रेशन कैंप के बंदियों को आजाद करवाया। विवाह के उपरांत उन्हें विस्थापित के रूप में अमेरिका में रहने का मौका भी मिल गया, लेकिन अमेरिका में जिल्लतें कम नहीं थीं।
पोलिश डायस्पोरा की कविताएं न केवल युद्ध को याद करती हैं, बल्कि विस्थापन के उपरांत नए देश और समाज से मिले अपमानजनक जीवन की कहानी भी कहती हैं।
मारिया जस्त्रज़ेबस्का (Maria Jastrzebska) अपनी कविता में बताती हैं कि किस तरह जब वे मां के साथ सामान लेने वाली लाइन में खड़े थे, तब किसी ब्रिटिश ने उन्हें गाली देकर कहा कि “तुम बल्डी विदेशियों (Bladdifor aynerr.) अपने देश वापस जाओ”। ये शब्द इतने प्रचलित हुए कि हम उसके आदि बन गए।
अभी हाल ही में जब इंग्लैंड यूरोपीय यूनियन से अलग हुआ, तो सबसे अधिक प्रभाव वहां रहने वाले पोलिश विस्थापितों पर पड़ा, क्योंकि वे अधिकतर कारखानों में काम कर रहे थे। साथ ही उन कंपनियों को भी नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि अधिकतर पोलिश कामगार अन्य यूरोपीय देशों में लौट गए, जबकि वे अपने कार्य में बेहद कुशल होते हैं।
पोलिश जीवन के दुख-दर्द और यादों के अतिरिक्त अनेक भावनाएं यहां प्रस्तुत हैं।
जोन की एक कविता है, जो हमें झकझोर देती है:
“मैंने पिता से पूछा, वे चार साल बुकनवेल्ड में रहने के बावजूद बच कैसे गए?
पता नहीं कैसे, उन्होंने जवाब दिया, लेकिन उनके कई दोस्त पीट-पीट कर मार दिए गए।
भूख से मर गए, या सलीब पर चढ़ा दिए गए, लेकिन वे बच गए।
मैंने मां से सवाल किया, उन्होंने कहा कि एक जर्मन सैनिक ने उनका बलात्कार किया।
फिर दया करके छोड़ दिया।
मैं यही कह सकता हूं, भाग्य ने उन्हें बचाया मुझे इस दुनिया में लाने के लिए।
कृत्या ने पुनः कुछ पोलिश डायस्पोरा के कवियों का पाठ करवाया, और मुझे लगा कि उनकी कविताओं को फिर से सुनना और समझना होगा।
रति सक्सेना