हमारे अग्रज

तेलगु कवि इस्माइल की कविता

 

डा वी कोण्डाल राव के अंग्रेजी अनुवाद का रति सक्सेना द्वारा हिन्दी में रूपान्तर

 

अनुभव

 

मुझसे कहा गया कि
“हमे अपने अनुभव से सीखना चाहिए”
मैंने गढ़े हुओं को खोदा,
और अवशेष बाहर निकाले

 

ओह! नरम और कड़े
एक नया जन्तु तैयार
पाँच लाख वर्ष पहले खत्म हो चुका था जो

 

झरना

 

मैं‍‍ ‍–

कैसे गाते हो तुम हरदम
प्रतिध्वनित होती लय में

 

झरना–

देखो, मेरी जिन्दगी पत्थरो से भरी है
ना गाऊँ तो कैसे पिघलेंगे वे?

 

चक्रवात

 

मैं तो बस घूमर हूँ सूखी पत्ती का प्रेम- तूफान

 

लेकिन यह तूफान अलग किस्म का है
दूर है पर अलग नहीं
नीचे झुकता है, चिन्ता की रेखाओं की तरह
और लौट आता है पेड़ का हिस्सा बनते हुए

 

खिड़की

 

क्या होना चाहिये
भीतर‍ बाहर
यह सब मैं जानती हूँ
लेकिन यहाँ
न भीतर कुछ, न बाहर कुछ
किस लिए

 

वह

 

कहा जाता है कि
जब वह छोटी थी,
अपनी प्यारी गुड़िया को आग में झौंक दिया था
देश के लिए
कोई आश्चर्य नहीं कि
बड़े होने पर उसने
देश को ही झौंक दिया आग में
अपने लिए

 

साइकिल

 

अपनी कविता की तरह
मुझे मालूम नहीं है, कि
यह मुझे उठा रही है या
मैं इसे

 

आकाश और सड़क के बीच
पहिए घूमते ‌और फिसलते हैं बीच में
ज्यादा भाग आकाश का
थोड़ा सा जमीन पर

 

घर पर पहुँचने के बाद
शहरी गुण्डों की फुस्स होती हवा की तरह
उड़ती भाप की तरह
एक पहिया जमीन पर घिसटता
‌और एक तैरता सपने में
रिटायर होता, सोने का मन बनाता
मेरी और मेरी कविता की तरह

 

खेल

 

तुम्हे याद हैं वे राते
जो हमने बिताईं थी मैदानों में
गाँव से दूर
लोगों से दूर

 

क्या वे हम ही थे
जो आसमान के पटरे पर चला करते थे?

 

क्या तुम्हे याद है
प्रेम के खेल में
चमगादड़ की अपने अंगों को प्रेम दाह में फेलाते
हम ही तो थे जो
तारो को उन्हीं से टकराते रहे
खेल की गोटियों की तरह
सारी सारी रात

 

कहाँ गईं वे राते प्रिया!
वह हवा जो हमारी लिए बहती थी
आज नहीं बहती
लेकिन खेल चलता रहा एक से दूसरे के पास
बस खिलाड़ी बदले, खेल नहीं

 

तुम

 

जब तुम होती हो नग्न
अपने कपड़ों की चिन्ता किए बिना
तुम मेरी होती हो
नहीं तो
इस दुनिया की
किसी दिन मैं इस दुनिया को चीर दूँगा
और पिरों दूँगा धागे में

डा वी कोण्डाल राव के अंग्रेजी अनुवाद का रति सक्सेना द्वारा हिन्दी में रूपान्तर

Post a Comment