समकालीन कविता
लोरेना कुरुहिंका (Lorena Curruhinca)
अनवादक -बृजेश कुमार
मुझे ऐसी कविता चाहिए जिसमें भाव हो छूने का,
चीज़ों को नजदीक लाने का, पर लेखन के समय ,
वो उनके बीच के टकराव में बदल जाए।
एक ऎसी कोशिश हो सकती है:
उन पंखों का क्या
आसमान में वो पंख कैसे हैं
बारिश के
बिना किसी प्रवाह के
कौन सी ताकत पंखों से टकराती है?
पखेरुओं के
परों का फैलाव गौर से देखो
एक वायु-क्षेत्र
वहां हवा है, पानी नहीं है
उन पंखों का क्या
देखो मत
बारिश एक अजेय शक्ति है
अरे हाँ, पंखा बनता है पंखों से
जो टकराते हैं निर्मल तरल से
और हमारे लिए छोड़ जाते हैं, बहती हुई मंद-मंद हवा ।
मुझे इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पसंद हैं
खासकर उन लड़कियों की
जो अपना अधनंगा बदन दिखाती हैं
सिर्फ़ एक बार अपने लिए या कुछ उनके लिए
जो चौबीसों घंटे उन चंचल इच्छाओं के साक्षी बनते हैं
बेशक, थोड़ी सी नाटकीयता, फिर भी मैंने इसे देखा, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता
तुम्हारी ब्रा की लेस के रंग से
पर तैयारी के लिए बार-बार फ्रेमिंग करनी पड़ती है
लेकिन कौन जाने कि हम नकल करना चाहते हैं
इसके मजे की, यह कामुक पूंजी स्वयं को मैनेज करती है
किसी और को ही अटकाव में रहने दें
मुझे बताओ कि कौन सा गाना बज रहा है
जब तुमने अपना सर झटका तो एक लट तुम्हारा आधा चेहरा ढक लेती है
और जो तुम्हें लाइक करता है, वह खयालों में डूबा बेतरतीब उंगलियां दौड़ा रहा है
जिससे तुम्हें देख सके और फिर चूम सके
मुझे इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पसंद हैं
खासकर उनकी जो सचेत रहती हैं कि महीन से महीन लकीरें, छोटे डिम्पल और तिल तक दिखाई दें,
कभी भी कोई तुम्हें ऐसे जवाब न देने पाए जो पहले ही दिल से तय हों
समझ लो कि अब हम तुम्हें चाहत भरी नज़र से नहीं देख रहे हैं,
बल्कि यह देख रहे हैं कि अधनंगे बदन का सेल्फी संग्रह क्या कहता है,
चौबीसों घंटे खुश रहने वाले बदन, दुनिया की कैसी छवि पेश करते हैं?
लोरेना कुरुहिंका
विदमा, कारमेन डे पैटागोन्स में जन्मीं कवियत्री लोरेना कुरुहिंका बहिया ब्लैंका में रहती हैं। वह एक अध्यापिका हैं। उनकी कविताएं मैगज़ीन और वेबसाइट (जैसे Op. cit और Revista Ardea) द्वारा प्रकाशित तथा कई लिटरेरी एंथोलॉजी में सम्मिलित हुई हैं। गेरोनिमो यूनिबासो के साथ मिलकर, उन्होंने “एस्टो नो एस ऊना लिटरेरिया रेविस्टा” को एडिट किया, कोलेक्टिवो सेमिला पब्लिशिंग हाउस में सहनिर्देशन किया और फेरिया डे एडिटोरियल्स ऑटोगेस्टियोनाडास डे बाहिया ब्लैंका को ऑर्गनाइज़ किया।
उन्होंने अना चिका डे रियो, नोटा पैरा अन कैबलो एट्रोपेलाडो एंट्स डे लेगर ए इंग. व्हाइट, इन ला कुअद्रा दे मी कासा हे अन लिमोनेरो एन ला वेरेडा (कोलेक्टिवो सेमिला, 2012, 2023 और 2025) और लीर अल सोल (एडिटोरियल अर्वेजा, 2025) किताबें पब्लिश की हैं। वह एक्सप्लोरंडो लो पॉसिबल रीडिंग और राइटिंग वर्कशॉप चलाती हैं।
शैलेंद्र चौहान
मैने देखा, किनारा अदृश्य था
पानी किसी का पक्ष नहीं लेता
वह केवल बार-बार
एक ही देह से
उसकी ज़िद का उच्चारण करवाता है।
हाथ जल में नहीं चलते
वे अदृश्य भविष्य की ओर फेंके गए
दो प्रश्नचिह्न हैं।
पैर उत्तर नहीं देते
बस डूबने की भाषा को
थोड़ा-टालते रहते हैं।
किनारा हर बार थोड़ा और
अपनी जगह बदल लेता है
पीछे लहरों के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता
न परिश्रम, न प्रमाण, न ताली।
फिर भी
पानी की स्मृति में एक ताप
धीरे-धीरे जमा होता रहता है
शायद जीवन, शायद साहित्य, शायद मनुष्य।
इनमें से कोई भी
किनारे तक पहुँचने का दूसरा नाम नहीं
बल्कि उस जल में
अपनी गति बचाए रखने की कला है
जो हर क्षण तुम्हें अपने जैसा स्थिर
कर देना चाहता है।
जल का दूसरा अर्थ
मैंने जल में उतरकर जाना
जल केवल जल नहीं था
वह मेरे चारों ओर धीरे-धीरे अपना अर्थ भरता रहा
मैं तैर नहीं रहा था
अपने ही भार से बार-बार ऊपर आने की एक पुरानी स्मृति
दोहरा रहा था
डूबना अचानक नहीं आता
वह पहले हाथों की भाषा बदलता है, फिर आँखों की
फिर विश्वास की
छटपटाहट देह की नहीं होती
वह उस शब्द की होती है
जो अभी लिखा जाना चाहता है
बहुत देर बाद मैंने देखा
किनारा कहीं नहीं गया था
अदृश्य मेरी दृष्टि हुई थी
तब से मैं जल को
हर बार एक नए अर्थ में पढ़ता हूँ
और हर बार थोड़ा-सा डूब जाता हूँ।
अनकहा
न होता जल
तो शायद डूबने का अर्थ भी किसी शब्दकोश में
अधूरा रह जाता
न होती गहराई
तो कौन जानता कि छटपटाहट साँस की नहीं
अर्थ की भी होती है
जल ने ही सिखाया
ऊपर दिखाई देना बचा रहना नहीं होता
और नीचे चले जाना हमेशा हार जाना नहीं
कई बार
सबसे अधिक जीवित वही होता है
जो अपनी अंतिम साँस से पहले एक और हाथ बढ़ाता है
अदृश्य की ओर
जल हर बार लौटा देता है एक दूसरी देह
भीगी हुई, थकी हुई, लेकिन अपने भ्रमों से कुछ हल्की
शायद इसीलिए
मैं हर कविता में थोड़ा-सा जल छोड़ देता हूँ
ताकि जो उसे पढ़े
वह केवल पढ़े नहीं
एक क्षण के लिए
अपनी ही किसी अनकही गहराई में उतर जाए।
मौन
अनकहा जो भी है
वह
मौन नहीं
वह
शब्दों के बीच
बची हुई
वह नमी है
जिसे
भाषा
बार-बार
छिपा लेती है
जो कहा गया
वह अक्सर
समय के साथ
अर्थ बदल देता है
जो नहीं कहा गया
वही
भीतर
धीरे-धीरे
मनुष्य बनता रहता है
अनकहा
किसी उत्तर का
अभाव नहीं
वह
प्रश्न का
सबसे धैर्यवान रूप है
वह
जल की तरह
दिखता कम है,
घेरता अधिक है
वह
अँधेरे की तरह
डराता नहीं,
आँखों को
नई दृष्टि देता है
शैलेंद्र चौहान (जन्म : 8 फ़रवरी 1954) समकालीन हिंदी के महत्वपूर्ण कवि, कथाकार, आलोचक, स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यिक संपादक हैं। पिछले लगभग पाँच दशकों से वे हिंदी साहित्य में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, जनपक्षधर दृष्टि और सृजनात्मक हस्तक्षेप के कारण विशिष्ट पहचान रखते हैं। कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत तथा सामाजिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक और राजनीतिक विषयों पर उनका लेखन समान रूप से उल्लेखनीय है। उनकी रचनाओं में लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय और मानवीय सरोकारों का सशक्त समन्वय दिखाई देता है।
मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने बी.ई. (इलेक्ट्रिकल) की उपाधि अर्जित की। विद्यार्थी जीवन से ही लेखन आरंभ करने वाले शैलेंद्र चौहान ने साहित्य को केवल सृजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप और वैचारिक प्रतिरोध का उपकरण बनाया।
उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं—नौ रुपये बीस पैसे के लिए (1983), श्वेतपत्र (2002), कितने प्रकाश वर्ष (2003), ईश्वर की चौखट पर (2004), सीने में फाँस की तरह (2023) तथा चयनित कविताएँ (2023)। कहानी-संग्रह नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) और गंगा से कावेरी (2023), संस्मरणात्मक उपन्यास पांव ज़मीन पर (2010), आलोचना-पुस्तक कविता का जनपक्ष (2020) तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारी (2023) उनकी बहुआयामी रचनात्मकता के प्रमाण हैं। क्यूबा-यात्रा पर आधारित उनके संस्मरण भी विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।
शैलेंद्र चौहान लंबे समय से अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका ‘धरती’ का संपादन कर रहे हैं। इस पत्रिका के त्रिलोचन, समकालीन कविता, ग़ज़ल, शील, शलभ श्रीराम सिंह, कश्मीर, पत्रकारिता, किसान एवं कृषि-कर्म, वैज्ञानिक चेतना, भारतीय समाज, कथेतर गद्य और आलोचना-केंद्रित विशेषांक हिंदी की गंभीर साहित्यिक बहसों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
रचनाकार, आलोचक और संपादक—तीनों भूमिकाओं में सक्रिय शैलेंद्र चौहान समकालीन हिंदी साहित्य के उन महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं जिन्होंने साहित्य को समाज, लोकतंत्र और मनुष्य की गरिमा के पक्ष में निरंतर सक्रिय रखा है। वे वर्तमान में जयपुर (राजस्थान) में निवास करते हैं तथा स्वतंत्र लेखन और पत्रकारिता में निरंतर संलग्न हैं।
संपर्क : 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033
मो.7838897877
पैट्रिक विलियमसन (Patrick Williamson)
अनवादक -बृजेश कुमार
यहीं और अभी
हम तुच्छ चीजें हैं, हे प्रभु! लगभग कुछ भी नहीं हैं,
कदाचित हम बस स्मृति भर हैं, हवा के एक झोंके से,
गुज़रते लोगों की परछाईं, हमारे अपनों की,
किसी के खोये जीवन की स्मृति,
एक गर्जना, जो हमें दूर से वापस बुलाती है,
बिना जाने ही हम आगे बढ़ जाते हैं, शोहरत के गीत गाते हुए,
और हमारे लिए कुछ नहीं बचता, हमारी दी गयी सेवाओं में से
ठीक वैसे ही, जैसे कोई बिना अहसास बस तैरता जाता है;
मगर
बर्फ़ तुम्हारी रूह को सुकून दे सकती है तुम्हारी सोच से भी कहीं ज़्यादा
अपनी परेशानियों को बहुत दूर तलक बह जाने दो
चेरी ब्लॉसम की स्मृतियां, पाले की ठंड और
डूबते सूरज की गर्माहट का अनुपम मेल।
यह मुझे उम्मीद देता है।
कोमोरेबी (झरती रोशनी)
सूरज चलता है, और परछाईं भी चलती है,
बड़े ही सधे और बेहतरीन क्रम में
धाराओं में झरती रोशनी,
चीजों को उनके पहले, और बाद के रूप में दर्शाती है
और ज़मीन के करीब, अचरज से
निहारती, दो आँखों की मुस्कान।
अपने जंगल की छतरी तले
मैं तुमसे मिलने, और बतियाने आता हूँ।
क्योंकि मुझे तुममें अपनी जड़ें दिखती हैं।
एक परछाईं के माफिक। मैं हूँ भी, और नहीं भी।
पैट्रिक विलियमसन
अंग्रेज़ी भाषा में कविता लिखते हैं, वह फ़्रेंच और इटैलियन भाषाओं से अनुवाद करने वाले और अनुवाद अध्ययन के रिसर्चर हैं। उनके हालिया कविता संग्रह हैं: ‘गेट अप एट’ (Cyberwit.net, 2025) और ‘प्रेज़ेंस/प्रेज़ेंज़ा’ (Samuele Editore, 2023)। फ़्रेंच-भाषी अफ़्रीका और अरब दुनिया के कवियों के दो एंथोलोजी भी हैं: ‘टर्न योर बैक ऑन द नाइट’ (The Antonym, 2023) और ‘द पार्ले ट्री’ (Arc Publications, 2012)।