कविता के बारे में
बसंत त्रिपाठी 

बसन्त त्रिपाठी का नाम समकालीन कविता में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे पेशे से प्राध्यापक हैं, और कवि भावभूमि के हैं। 22 वर्ष तक महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की पाँच किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित।
बचपन के शहर के छूट जाने का अर्थ
अपने शहर में खाक होने की गारंटी लिये
हम पैदा नहीं हुए
न ही बुजुर्गों ने विश्वास दिलाया
कि हम यही मरेंगे
हमारे पैरों में चकरघिन्नी भी नहीं लगी है
कि बंजारों-सा देशाटन करें
फिर भी हमें छोड़ना पड़ेगा
अपने बचपन का शहर
इस शहर में हम सपने लिए पैदा हुए
इस शहर से सामान लदे ट्रक पर विदा होंगे
हमारे नाम के साथ कभी नहीं जुड़ेंगे
हमारे छोड़े गये घरों के पते
वे बचे रहेंगे केवल
नष्ट नहीं किये गये पुराने खतों में
भूला भटका कोई पुराना परिचित
जब आएगा इस पते पर
तो मायूसी ही मिलेगी उसे
जिन गलियों में हम खेले
जहाँ हमने प्यार किया
जहाँ निरुद्देश्य घूमते रहे
वहाँ अब सैलानी की तरह जाएँगे
जाएँगे मेहमान की तरह
और आश्चर्य जताएँगे कि कितनी बदल गयी हैं गलियाँ!
शहर का चेहरा कितना बदल गया है!!
यह उस तरह भी नहीं
कि अकाल या भुखमरी हो
और तीन के बदरंग बक्से में
दो जोड़ी कपड़े के साथ अलविदा कहें अपने गाँव को
हम भुखमरी और फाके के सम्भावित खतरे से भयभीत हो
छोड़ेंगे अपना शहर
हम छोड़ेंगे अपना शहर
क्योंकि रोज़गार की सुरक्षा मिलेगी किसी दूसरे ठौर
अपनी पुरानी गेंद का उत्तराधिकारी तय किये बगैर
हम छोड़ देंगे अपना शहर
बचपन का शहर ऐसे छूट जाएगा
एक जीवन जैसे बीत गया हो
एक उम्र कि अचानक खत्म हो गयी हो
बचपन के शहर को छोड़
हम अधेड़ ही पैदा होंगे किसी और शहर में
और धीरे-धीरे भूल जाएँगे
अपने बचपन का नाम ।
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मैदानी इलाकों का नागरिक-बोध
हम मैदानी इलाकों की
समृद्ध प्रकृति के बीच जन्मे हैं
थोड़ी अलाली, थोड़ी जागरूकता
बहुत सारे ईश्वर और छिपे हुए अनैतिक कृत्यों के बीच
पले बढ़े हैं
हम सब कुछ हैं थोड़ा थोड़ा
हम यायावर नहीं हैं
फिर भी यायावरी
पहचानी गलियों के बीच करते हैं
जैसे हम भगतसिंह नहीं हैं
लेकिन उस पर बनी फिल्म को हिट करवा देते हैं
तुम हमें कभी पहचान नहीं सकते पूरा
हमारे सैकड़ों चेहरे हैं
हम धर्म के भीतर रहते हैं
भाग्य के भीतर रहते हैं
जाति और लिंग हमें विस्तार देते हैं
और हमारी भाषाएँ हमारा कैदखाना हैं
हम क्रोध से जलते हैं
विरोध भी करते हैं
हम हताशाओं के पुतले लगते हैं
हम जंगलों में नाचते हैं
फसल कटने के बाद नाचते हैं
हम हरेक उत्सव में नाचते और गाते हैं
हम गर्व करते हैं और शर्मिन्दा होते हैं
हम आधुनिकता से डरते हैं और शीतल पेय पीते हैं
हम अतीत से मुक्ति चाहते हैं और सजातीय वर ढूँढ़ते हैं
दो फसलों के बीच हम सपने देखते दिन गुज़ार देते हैं
हमारी परिचित दुनिया खुद इतनी अपरिचित है
कि उसे पुनः पुनः तलाशते हैं
इस तरह हम अनपेक्षित नाकेबंदी के शिकार हैं
हम रमे रहते हैं अपनी ही चिन्ता में
हम महान परिवर्तनों को कुड़ेदान में तब्दील कर देते हैं
फिर उससे उठती गंध पर ऐतराज करते हैं
हम कुछ नहीं करते सिवाय प्रतीक्षा के
हम इस देश के बाकायदा नागरिक हैं।
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नेरुदा
नेरुदा, मेरे प्रिय कवि !
तुम्हारे पास समुद्र
और उसकी नमकीन हवाओं का स्पर्श था
तुम्हारे पास
धूल धुंध पसीना
पथरीली चोटियाँ
और अनगिनत फूलों की ज़िंदा खुशबू थी
तुम्हारे पास
सड़कों और मकानों की खिड़कियों से
फिसलती बर्फ का दृश्य था
और गुदाज स्त्रियों से संभोग की
अविश्वसनीय कथाएँ भी
तुम्हारे पास तानाशाही के खिलाफ
उठे कदमों की कड़क पदचाप थी
संतरों की मादक गंध
और किसम किसम की शराबें थीं
तुम्हारे पास समकालीन कवियों-चित्रकारों की
छटपटाती आत्माओं के विलाप थे
जो झिंगुर की तरह छा जाते थे तुम पर
तुम्हारे पास दुनिया के तमाम रचनाकारों की
अक्षय शुभकामनाएँ थीं
जो हर पल तुम्हें रौशन और तरोताज़ा रखती
तुम जीवन और कविता के बीच
अपना हैट पहने और कलम थामे
ऐसे खड़े थे
जैसे पहाड़ में देवदार का जंगल
और तुम्हारी कविता ऐसे बहती थी
जैसे एक हरे जंगल के बीच से
शोर मचाती कोई झागदार नदी !
मैं जब भी खोलता हूँ तुम्हारी कविता की किताब
तुम हमेशा पन्नों के भीतर से
मेरी ओर हाथ बढ़ाकर कहते हो –
‘आओ साथी,
दुनिया को पहचानने की इस विस्मयकारी दुनिया में
तुम्हारा स्वागत है ।’
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मैं पानी हूँ
मैं पानी हूँ
तरल बहूँगा तो बजूँगा
जैसे संतूर
लेकिन अभी तो रिसता हूँ
रंध्रों से बेआवाज़
पहुँचता हूँ दूर दूर दूर
भीतर ही भीतर
वहाँ
सदियों की नींद टूटती है जहाँ
मैं धरती के भीतर का पानी हूँ
नदियों झरनों या समुद्र में नहीं
धरती के भीतर रहता हूँ
मिट्टी और चट्टानों का लिहा़फ ओढ़
मैं पानी हूँ
मैं तुम्हारी प्यास ढूँढ़ता हूँ ।
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मैं तुमसे प्यार करता हूँ
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
जैसे समुद्र
अपनी मछलियों और शैवालों से करता है
जैसे आकाश
अपने पंछियों की उन्मुक्त उड़ानों से
और पृथ्वी तितलियों की मखमली छुअन से
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
लेकिन वैसे नहीं जैसे मछुआरा
मछलियों से करता है और फेंकता है जाल
जैसे बहेलिया
चिड़ियों से करता है
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
जैसे एक आज़ादी
दूसरी आज़ादी से करती है
जैसे एक देह
दूसरी देह से
जैसे एक दिल की उष्मा दूसरे दिल में
खलबली पैदा करती है
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
और केवल इसी शब्द को
जी पाने की कोशिश करता हूँ
बस मैं तुमसे प्यार करता हूँ.
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अभी अभी
अभी अभी आसमान में एक मिसाइल
तमाम इनसानी मसाइल पर गिरने को दौड़ा है
अभी अभी एक उन्माद ने
दुधीली दाँतों वाली नन्ही को
धमाके से सुलाया है
अभी अभी शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए
मनुष्य नहीं एक युद्धक विमान को नामांकित किया गया है
संघर्षरत जनता की बजाय
परमाणु बम मिलकर गा रहे हैं –
‘हम होंगे कामयाब’
गाँधी की लाठी से
एक सत्याग्रही का सिर फोड़ा गया है
बिल्कुल अभी
अभी अभी समुद्र ने तमाम राष्ट्राध्यक्षों को
एक धमकी भरा पत्र भेजा है
कि तुम्हारी बारूदी दुनिया में नहीं रहना है अब
अपने खारेपन और अपनी लहरों के साथ
सभी जलचरों को साथ लिए
किसी और ग्रह को चला जाऊँगा मैं
अभी दुनिया का हाल कुछ यूँ हो चला है
कि तमाम देश खुद को नक्शों में ढूँढ़ रहे हैं
जबकि नक्शे का हर हिस्सा जल रहा है
और खंजरों से इनसानी कलेजा खाने का हुनर
हर जगह सीखा जा चुका है
खाने की मेज पर रखे छुरी-काँटों तक से
कत्ल के काम लिए जा रहे हैं
दुःस्वप्नों की तरह घट रही
इन घटनाओं को थामने की कोशिश में
बहुत बोलने वाली भाषा भी
कुछ इस तरह लाचार है
जैसे वाक्यों से शब्दों को खदेड़कर
चुप्पी ने आसन जमा लिया हो
क्या आपने अपने इर्द-गिर्द के पेड़ों को
कभी ध्यान से देखा है
देखो, कि उनके पत्तों से ओस नहीं
अब अँधेरा ही टपकता रहता है हर वक़्त.
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