कवि अग्रज
हम ऋतुसंहार का हिन्दी अनुवाद दे रहे हैं, जिसे हिन्दी के प्रशस्त साहित्यकार रांगेय राघव जी ने किया था।
प्रिये ! आई शरद लो वर!
मधुर विकसित पद्म वदनी कास के अंशुक पहनकर,
मत्त मुग्ध मराल कलरव मञ्जु नूपुर सा क्वणित कर
पकी सुन्दर शालियों सी देह निज कोमल सजा कर
रूप रम्या शोभनीय नववधु सी सलजं अन्तर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
कास कुसुमों से मही औ” चन्द्र किरणों से रजनी को
हंस से सरिता सलिल औ” कुमुद से सरवर सुरम को,
कुमुद भार विनीवसप्तच्छदों से उन वनान्तों को
शुक्ल करती, प्रतिदिशा में दीप्ति फैला अमल शुचितर,
प्रिये ! आई शरद लो वर!
चटुल शफरी सुभग काञ्ची सी मनोरम दीखती है
हंस श्रेणी धवल बैठी निकट मुक्ताहार सी है
वे नितंबों से सुमांसल पुलिन विस्तृत है रुचिर तर
एक प्रमदा सी नदी होती प्रवाहित मन्द मंथर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
रिक्त जल अब रजत शंख
मृणाल से सित गौर उज्ज्वल
खंड शतशः व्याप्त दिशि दिशि
पवन वाहित शुभ्र बादल
व्योम नृप का व्यजन करते
चमर शत शत ज्यों लहर कर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
प्रभिन्नाञ्जन दीप्ति से
अतिकान्तिमय है व्योम सारा
अरुण है बंधूक जैसी
वसुमती हो पुष्पभारा
कमलवन आच्छादित-
सरसी पुलकती है सदैव लो
कर नहीं देते समुत्सुक
रूप यह किसके हृदय को?
प्रिये ! आई शरद लो वर!
मदिर मंथर चल मलय से
अग्रशाख विकंप आकुल
प्रचुर पुष्पोद्गम मनोहर
चारुतर ले नर्म कोंपल
मत्त भ्रमरों ने पिया
मद प्रस्रवण हो विकल जिस पर
मधुर चमरिक वृक्ष चित्त
विदीर्ण किसको दें नहीं कर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
सुभग ताराभरण पहने
मुक्त घन अवरोध से अब
चंन्द्र वदनी, अमल ज्योत्सना
के दुकूलो में रुचिर सज
मुग्ध प्रमदा यामिनी
संवर्धित है प्रति दिवस त्वर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
घर्षिता है वीचिमाला
मुखों से कारण्डवों के
तीर भू आकुल हुई
कलहंस और सारस कुलों से
कमल के मकरंद से
आरक्त शैविलिनी मनोहर
हंस रव से जन हृदय में
प्रीति को जाग्रत रही कर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
रश्मि जालों को बिछा
आल्हाद भरता जो हृदय हर
नयन उत्सव, हिम फुही झर
इंदु भी है अब कठिनतर
पति विरह विष सिक्त शर क्षत
नारियों का ताप दुखकर
प्रिये ! आई शरद लो वर!
मत्त हंस मिथुन विचरते
स्वच्छ फुल्लाम्भोज खिलते
मन्द गति प्रातः पवन से
वीथियों के जाल हिलते
ज्योति में अवदात वे सर
हृदय हर लेते अवश कर
प्रिये ! आई शरद लो वर!