समकालीन कविता
रविचंद्र पी. चिट्टमपल्ली
गहरे समुद्र में डुबकी
I
अगर किसी शांत धूप वाले दिन
तुम समुद्र में डुबकी लगाते हो
तो तुम मुझे पाओगे, विश्राम करते हुए
अपने बाएँ पैर के सहारे टिके हुए
पत्थर के खंभों के मध्य,
मौसमी मार से नष्ट-प्राय सिर वाले
धुंधले से संगमरमरी देवता की बगल में।
डरना मत, अगर मेरी उंगलियाँ तुम्हें
लहरों में बहते हुए पकड़ लें।
ना, ऐसा जान-बूझकर नहीं, बिल्कुल भी नहीं।
पुरावशेष या खजाने की तुम्हारी खोज
तुम्हारे लिए कितनी अहम है, मुझे इसका भान हैं।
मगर फिर भी तुम्हें ऐसा क्या मिलेगा जो मुझे
सदियों से यहाँ रहते हुए नहीं मिला?
II
इन गुफाओं में, यहाँ नीचे
जहाँ सारी रोशनी बिखर जाती है, फैल जाती है
या क्षीण हो जाती है, यहाँ कोई भेद नहीं रहता।
इंसानी आँख, जो सब देखना चाहती है, यहाँ अंधी है।
इस बेरंग जंगल में, तुम्हें क्या सुनाई देता है?
ना कोई त्रिशूलधारी देवता यहाँ आवाज करता है
और ना ही जलपरियों की रसिक कल्पनाओं में डूबा मन
तुम्हारे कानों तक यह आवाज़ सुना पाएगा
कि अपने विशाल बहाव में
धीमे-धीमे घिसटते हुए रुक रही है,
बर्फ की लम्बी कतार,
अथवा नीली व्हेल की हृदय विदारक धुन,
“ओ ! बरछी चलाने वाले, तुम क्यों
मेरा शिकार करते हो, इस बर्फीले पानी में
जहाँ मैं सिर्फ़ क्रिल पर जीवित हूँ?”
III
तुम्हें बस एक दमक दिखाई देगी
जो मेरी श्वेत पड़ चुकी अस्थियों से झर रही है,
तुम्हें लालच और रोमांच की कहानी सुनाती हुईं
जीवन के ख़िलाफ़ अपराध और सज़ा की,
हृदय के उस अजेय साहस की,
जो इंसान को उस बिंदु से आगे ले जाता है
जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं, वह गाद और अंधेरे में विलीन हो जाता है।
मस्तिष्क-अग्नि कहीं प्रखर होती है
समुद्र की तलहटी पर फैलते लावा के झाग से।
यह लालच से वापसी का अंतिम पड़ाव है
बहाव, शांति और भंवर
धीमे-धीमे आत्मा और इंद्रियों को ऐसी जागृति की ओर
ले जाते हैं,
जो धरती के चमकीले तटों के लिए सर्वथा अनभिज्ञ है।
अनुवादक : बृजेश सिंह
मेरी आंटी डाक टिकट संचित करती थीं
मेरी आंटी डाक टिकट संचित करती थीं,
और यीट्स तितलियाँ एकत्र करते थे,
जब तक कि उन्हें कविता की प्रेरणा नहीं मिली।
मैंने उनकी शादी से पहले के
उनके डाक टिकट देखे हैं,
और उन जगहों को देखकर हैरान रह गया:
अनोखे, मनोरम और मेरे विचारों की
गाड़ी से इतर, जो अक्सर पटरी से उतर जाती।
उन्होंने उन्हें नोटबुक में चस्पा कर रखा था,
और बड़ी सावधानी से छोटे-छोटे बंडलों में
रबर बैंड से बांधकर रखा हुआ था, या फिर
सफ़ेद अथवा बादामी रंग के लिफ़ाफ़े में
रख दिया था, जैसे उनके ज़्यादातर ख़वाब और अरमान।
मैं सोचता हूँ कि उस वीणा का क्या हुआ
जिसे वह अपनी युवावस्था में बजाया करती थीं?
इस विषय में मुझे नहीं पता कि फिर क्या हुआ
उनके उन सभी टिकटों का, उन सपनों जैसी जगहों का,
उन यात्राओं का जो कभी की ही नहीं गईं, पर कितनी अनोखी थीं!
वह मुझे आइसक्रीम खरीदकर देतीं
जब वह ‘फ़र्स्ट डे कवर’ खरीदने सिटी सेंटर ले जाती थीं।
शौक इंसान को हताश भी कर सकता है,
खासतौर पर जब इंसान उसे पूरा न कर पाए।
उनके टिकटों को देखकर मैंने सपने देखना सीखा,
सरहदों के पार सफ़र करने की हिम्मत की।
अब, जब मुझे अपनी बेटी से कोई सचित्र पोस्टकार्ड मिलता है
तो मुझे अपनी आंटी की याद आती है और मैं सोचता हूँ कि उन्हें कितनी खुशी होती होगी
कार्ड हाथ में लेकर, डाक टिकट और तारीख को निहारते हुए।
मगर आजकल ख़त कौन लिखता है? हाँ, डाक टिकट, वो अब भी मौजूद हैं।
अनुवादक : बृजेश सिंह
रविचंद्र पी. चिट्टमपल्ली
सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, कवि और अनुवादक रविचंद्र पी. चिट्टमपल्ली भारत की मैसूर यूनिवर्सिटी के इंग्लिश डिपार्टमेंट के प्रमुख के रूप में कार्य कर चुके हैं । वे कनाडा में टोरंटो यूनिवर्सिटी के विक्टोरिया कॉलेज में ‘नॉर्थ्रॉप फ्राई’ फेलो रहे हैं इसके अलावा दो बार ‘शास्त्री फेलो’ भी रहे हैं। द संडे मेल (इंडिया), लेकव्यू इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ लिटरेचर एंड आर्ट्स, ईयरली शेक्सपियर, अदरवाइज़ एंगेज्ड: ए लिटरेरी एंड आर्ट्स जर्नल, ऑरोरा एंड ब्लॉसम्स, एलो मैगज़ीन, ड्रेइच मैगज़ीन, द डिलीडाउन रिव्यू, इन पैरेन्थेसिस, हैविक: द लास पॉसिटास कॉलेज जर्नल ऑफ़ आर्ट्स, लिटरेचर, एंड एकेडमिक राइटिंग, व्यूलेस विंग्स, और काइंड राइटर्स ने उनकी कविताएँ प्रकाशित की हैं। वे Q’s Blue World द्वारा होस्ट किए जाने वाले वीकली ज़ूम पर अपनी कविताओं का पाठ करते हैं। वर्तमान में वह मलेशिया में रहते हैं।
दिमित्रिस पी. क्रानिओटिस
Dimitris P. Kraniotis
भू-तल से एक नीचे
मैंने पृथ्वी को खींचा
आज की रात हमें ढकने के लिए
ताकि जरूरत पड़ने पर हम ओढ़ सकें
अस्त्र विहीन और बिना रक्तपात वाले
वे शब्द ! जो कल हमने उगले थे
बीजों के मानिंद
मगर आतुरता में मुझे उत्तर मत दो
अपने मौके का इंतज़ार करो
कतार में
मैं इंतज़ार कर रहा हूँ उत्तरों का
तुमसे और स्वयं से भी
बार-बार, बारम्बार
बीते कल तक ऊपर
लिफ़्ट के सुनिश्चित
और अनपेक्षित -1 पहुँचने तलक
बेसमेंट में अनिश्चित समय तक
और क्रोध में अडिग होकर
(आज रात की मेरी कल्पना के
किस तर्क से इसे उधार लिया था?)
मगर मैं नहीं चाहता कि कींच
हमारे बदन को गलाए
आने वाले कल को ‘माइनस वन’ से भरते हुए
कमल नाल और मिथक।
अनुवादक : बृजेश सिंह
शालीनता की टाई
मैंने उतारनी आरम्भ की
अपनी पोशाक
जब तक कि मैं निर्वस्त्र नहीं हो गया
कहीं वीराने के मध्य में
चीखता हुआ
किसी अनजान भाषा में
(वैसे भी,
मुझे कौन समझता?)
फिर भी उन्होंने मुझे गिरफ्तार नहीं किया
सार्वजनिक शालीनता भंग करने के लिए
चीखें रोकने के लिए
उन्होंने मुझे एब्सिंथ पिलाई
और मुझे शिख से नख तक सजाया
परन्तु मेरे जूतों के फीते
उनकी टाई से मेल नहीं खा रहे थे
मैंने चिल्लड़ नहीं छोड़ी
बख्शीश देने के लिए
मैं तिरछा होकर नहीं गिरा।
अनुवादक : बृजेश सिंह
कवि
प्रसंगों की दिशा
वह निर्धारित करता है
उजाले के अनदेखे पहलुओं को
वह प्रतीक बनाता है
दोषियों की तूलिका से
दिखावटी वर्तमान और
नग्न शरीरों को
वह चित्रित करता है
हवाओं के पंख
पानी के पाखी
वह गढ़ता है
पाषाण पिंजड़े
बेगुनाहों की काल कोठरियां
वह ढहा देता है
खेतों में गेहूं की बालियां
खाली मौसमों की फसल
वह काटता है
प्राचीन ऋषियों के
बुने हुए विचारों से
कवि
सदैव अंत में
एक नई शुरुआत रचता है।
अनुवादक : बृजेश सिंह
दिमित्रिस पी. क्रानिओटिस थेसली
(ग्रीस) के लारिसा प्रीफेक्चर में जन्में दिमित्रिस पी. क्रानिओटिस पेशे से एक चिकित्सक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कवि हैं। वे लारिसा (ग्रीस) में रहते हैं और एक मेडिकल डॉक्टर (इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट) के तौर पर कार्य कर रहे हैं। अब तक उनके 11 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और वह अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित इन्टरनेशनल एंथोलोजी के एडिटर-इन-चीफ हैं। उन्होंने कविताओं के लिए अनेक इंटरनेशनल अवॉर्ड जीते हैं, उनकी रचनाओं का 37 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उन्हें विश्वभर में कई प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक पुरस्कारों तथा ‘डॉक्टर ऑफ लिटरेचर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
दिमित्रिस पी. क्रानिओटिस 22वें वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ पोएट्स (UPLI)’ के प्रेसिडेंट, ‘वर्ल्ड पोएट्स सोसाइटी’ के अध्यक्ष वर्ल्ड पोएट्स मैगज़ीन के फाउंडर और एडिटर, और PEN ग्रीस की ‘राइटर्स फॉर पीस कमेटी’ के चेयरमैन सहित कई वैश्विक साहित्यिक संस्थाओं (जैसे- WPM, POP, WOW) के प्रमुख पदों पर आसीन हैं।
बलजीत सिंह “बेनाम
ग़ज़ल 1
तू नहीं है तेरा ख़्याल नहीं!
ज़िंदगानी में अब बवाल नहीं!
जंग लड़ना मुझे गवारा पर!
बेबसों को बना के ढाल नहीं!
ऐसे लीडर को लानते भेजो!
चल सका जो सियासी चाल नहीं!
पा लिया जो ख़ुदा की रहमत थी!
खो दिया तो किया मलाल नहीं!
भूख का मसअला सुलझ जाए!
इतना सीधा भी ये सवाल नहीं!
ग़ज़ल 2
किसी से अगर दिल लगाने की आदत!
मोहब्बत में रख भूल जाने की आदत!
जो हँसता रहा तू ज़माने की ख़ातिर!
न पड़ जाए आँसू बहाने की आदत!
तुम्हे घर बसाने की ज़िद है अगर तो!
हमें उम्र तन्हा बिताने की आदत!
सभी दिन नहीं एक जैसे जहां में!
ग़मो में भी रख मुस्कुराने की आदत!
जवां बेटियों पर चलाना हुक़ूमत!
सदा से है ऊँचे घराने की आदत!
ग़ज़ल 3
लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ!
मैं तो लेकिन नगर में तन्हा हूँ!
साथ मेरे है क़ाफ़िला फिर भी!
है तआज्जुब सफ़र में तन्हा हूँ!
चाहने वाले हैं हज़ार मगर!
हर किसी की नज़र में तन्हा हूँ!
बुझ चुका इक चराग़ हूँ गोया!
कौन सा मैं असर में तन्हा हूँ!
मिल ही जाएगा हाँ मुक़ाम मुझे!
गर यक़ीनन हुनर में तन्हा हूँ!
—
ग़ज़ल 4
शराफ़त का जो गाएगा तराना!
उसे ही काट खाएगा ज़माना!
जो खुद डूबे हुए हों उनकी ख़ातिर!
बताओ लाज़िमी क्या डूब जाना!
फ़क़त मांगी मोहब्बत कब कहा था!
सितारे आसमां से तोड़ लाना!
कोई जब थामने वाला न आया!
मेरे क़दमों ने छोड़ा लड़खड़ाना!
ज़रूरत सील देती है लबों को!
बहुत मुश्किल है खुल के मुस्कुराना!
—
ग़ज़ल 5
हाँ में हाँ कहने की आदत अब नहीं!
मुझ पे दुनिया की इनायत अब नहीं!
उम्र के इस दौर को ताक़ीद है!
प्यार करने की इजाज़त अब नहीं!
भर गया है जी मेरा भी आजकल!
उसको भी पहले सी निस्बत अब नहीं!
क्या ज़रूरी ग़ैर की हों साज़िशें!
घर में भी महफूज़ इज़्ज़त अब नहीं!
वक़्त था कल तक शराफ़त का मगर!
इस मुसीबत की ज़रूरत अब नहीं!
बलजीत सिंह “बेनाम” –
हाँसी-125033, जिला हिसार, हरियाणा, भारत।
आकाशवाणी कवि। Raven Cage (जर्मनी) पृष्ठ 99-101 में प्रकाशित।