मेरी बात

अक्टूबर के महीने में शरद के आगमन में, प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करना, शहर के लैपटॉपजीवी हम जनों के लिए दुर्लभ ही है। पहाड़-जंगल अब बदला लेने लगे हैं; शहर से प्रकृति के निष्कासन के साथ हम हरियाली को महसूस करने वन-जंगलों में धावा मारते हैं, जिससे प्रकृति और बौखला जाती है।

लेकिन क्या हम चित्त से भी प्रकृति को अनुभूत न करें? कृत्या के अक्टूबर महीने के अंक में हम ऋतुसंहार की शरद ऋतु को अनुभूत करते हुए, अग्रज कवि कालिदास और महान साहित्यकार रांगेय राघव का स्मरण करते हैं।

समकालीन कविता में अंग्रेजी के भारतीय कवि रविचंद्र पी. चिट्टमपल्ली की कविताएँ सृष्टि के सम्मुख खड़ी होती हैं; कवि समुद्र के साथ ब्रह्मांड की शांति में डुबकी लगवा देते हैं—

अगर किसी शांत धूप वाले दिन तुम समुद्र में डुबकी लगाते हो, तो तुम मुझे पाओगे, विश्राम करते हुए, अपने बाएँ पैर के सहारे टिके हुए, पत्थर के खंभों के मध्य, मौसमी मार से नष्ट-प्राय सिर वाले धुंधले से संगमरमरी देवता की बगल में। डरना मत, अगर मेरी उंगलियाँ तुम्हें लहरों में बहते हुए पकड़ लें।

ना, ऐसा जान-बूझकर नहीं, बिल्कुल भी नहीं। पुरावशेष या खजाने की तुम्हारी खोज तुम्हारे लिए कितनी अहम है, मुझे इसका भान है। मगर फिर भी तुम्हें ऐसा क्या मिलेगा जो मुझे सदियों से यहाँ रहते हुए नहीं मिला?

ग्रीस के कवि दिमित्रिस पी. क्रानिओटिस धरती में शब्दों के बीज बोते हैं—मैंने पृथ्वी को खींचा आज की रात हमें ढकने के लिए, ताकि जरूरत पड़ने पर हम ओढ़ सकें अस्त्र-विहीन और बिना रक्तपात वाले वे शब्द! जो कल हमने उगले थे बीजों के मानिंद।

बलजीत सिंह “बेनाम शहर” की उदासियों को खूब बयान करते हैं—

लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ!

मैं तो लेकिन नगर में तन्हा हूँ!

साथ मेरे है काफिला फिर भी!

है ताज्जुब सफर में तन्हा हूँ!

प्रिय कवि के रूप में प्रस्तुत हैं जुआना एम. रामोस (JUANA M. RAMOS), जो अपनी कविताओं में विस्थापन की पीड़ा के साथ स्मृति और विस्मृति के बीच शब्दों के पुल खड़ा करती हैं।

बहुत दूर, यह शहर मेरे लिए अपरिचित, अपनी रगों में दौड़ती भीड़ के बारे में डींगें हांकता है।

इमारतों की कतारें बैरिकेड के ठीक मध्य में सूरज की राह रोकती हैं। फुहार मेरे कटे हुए बालों को

भिगोने को तैयार है, किरणें मुझसे पार जा रही हैं, और मैं तुम्हारे बारे में विचारने लगती हूँ,

ग्रिड पर तुम्हारे केंद्र के बारे में, तुम्हारे मद्धम लैंप-पोस्ट और तुम्हारी गलियों के बारे में,

एक मात्र वह दुर्गम सड़क जहाँ सूरज सैर करता है उस पथरीली राह पर। जिन्होंने तुम पर नीची नज़रें डालीं,

कविता के बारे में हम बसंत त्रिपाठी से नयेपन को महसूस करते हैं। अपनी स्थिरता और भटकन, दोनों के बीच वे शिद्दत से महसूस करवाते हैं—

अपने शहर में खाक होने की गारंटी लिए

हम पैदा नहीं हुए

न ही बुजुर्गों ने विश्वास दिलाया

कि हम यहीं मरेंगे

हमारे पैरों में चकरघिन्नी भी नहीं लगी है

कि बंजारों-सा देशाटन करें

फिर भी हमें छोड़ना पड़ेगा

अपने बचपन का शहर

कुल मिलाकर अक्टूबर का कृत्या अंक पाठक के लिए अनेक सामग्रियां लेकर आता है।

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना

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