प्रिय कवि

रमेश कार्तिक नायक

 

तेलुगु और अंग्रेज़ी से चयन एवं अनुवाद
मट्टा प्रसाद बाबू

 

गुलाबों की ज़मीन 

 

माँ ने कहा था —
“खेता मं मत जइयो रे…
गुलाबन की बगइचा में पाँव मत धरियो रे”
पर मैं चला गया —

बेख़्याल क़दमों से उसी पगडंडी पर,
जहाँ गुलाबों की नर्मी मेरी सूखी चमड़ी पर
काँटों और पंखुड़ियों से दाग़ उकेरने लगी।

 

मैं उस हवा की ओर चल पड़ा
जो हमारे आम के पेड़ों से होकर गुज़रती थी।
दूर हमारी ज़मीन में खिले
मुस्कुराते फूलों को निहारता
मैं घास की मेड़ पर चलता रहा,

 

ठंडी हवा ने मुझे  छुआ —
जैसे नवजात को छूती माँ की साँसें।
मैंने अपनी हथेली पर देखा ख़ून,
गर्दन और बगलों से बहता पसीना —
इनकी मिली-जुली महक आज भी मुझसे अनजानी ही है।

 

उसी मिट्टी में दफ़्न हैं, माँ-बाप की परछाइयाँ
ज़मीन की पहचान बचाने को —हरी जड़ों को तराशते,
सीपियाँ, शंखों के टुकड़े, मक्के की बालियों सब हवा में झूमते हैं —
जैसे कोई भूला हुआ गीत दोहरा रहा हो|

 

हिरन के पदचिन्ह गिनता हुआ,
मोर के पंख चुनता हुआ
मैं पहुँचा खेत के बीचों-बीच,
आम के पेड़ की शीतल छाया में।

 

एक डाल के नीचे खड़ा,
मैंने पंख चढ़ाए उस पत्थर पर
जिसे हम देवी कहते हैं।

 

तभी मेरी नज़र पड़ी —
फूलों के लिए लड़ते कीड़ों पर।
फूलों का जादू
पेड़ों और पहाड़ों तक को मिटा देता है।
और मैं —
अनजाने ही
खुशबू की मूरत बन गया
तितलियों और मधुमक्खियों के लिए।

 

हमारे खेत के फूल
गुलाब जैसे लगने लगे।
एक अजीब-सी कोमलता भीतर पिघलने लगी —
मैं इस जादू पर ठहर-ठहर कर हैरान होता रहा।

 

कुछ घंटों बाद,
दोपहर ने गुलाबी लिबास पहन लिया,
खेत की मेड़ों में भरे पानी पर तैरती नज़र आईं
वो पंखुड़ियाँ — जिन्हें माँ ने बरसों पहले
मेरी किताब के साथ जला दिया था।

 

मुझे अजीब लगा —
जैसे खेत ने पहन ली हो
एक नई पोशाक,
कीड़ों के रंगीन पंखों से सजी हुई,
जैसे हमारी बंजारा औरतें
अपने घेरदार लहंगे पहनती हैं।

 

मैं हिला नहीं, झांकता रहा —
इस जादू से बचने की कोशिश करता रहा।

इन् गुलाबों का अब क्या होगा ?
हमारी बंजारा धरती पर
कौन पूछता है गुलाबों को ?
यहाँ तो बस हरियाली ही सुंदर मानी जाती है।

 

“The Rose Land” – कक्षा 8, CBSE अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तक (PW Publications) (2025) में शामिल।

 

 

जारेर बाटी 

तुम यक़ीन नहीं करोगे,
गर मैं यह कहूँ —
हमारी जारेर बाटी में ऐसा जादू है
जो खींच लाती है सबको
हमारे टांडा की मिट्टी की आग तक,
जहाँ हमारे पेट —
तवे बन जाते हैं
धरती को गरम रखने के लिए।

 

हमारी बाटियों की कच्ची ख़ुशबू,
ज़ुबान की सारी लार खींच लेती है,
और खा जाती है —
चबा-चबा कर।

 

माओं और दादियों की उंगलियों से
जनमी हैं बाटियाँ।
आटे और उंगलियों के बीच की ये जंग ही तो है
जो भूख को तराशती है।

 

गोल बाटी,
कोयले की आग को छूते ही शर्मा जाती है।
जब बाटी के सिरे अंगारों में सेंक जाते हैं,
और प्रकृति की बुरी नज़र उतार दी जाती है,
तो रात के सपनों से आख़िरी सेक लगाकर
दादी एक टुकड़ा आग को चखा देती है।

 

चाँदला की गोद में बैठी
बाटियों की जमात —
जैसे कोई सौर मंडल सजाया गया हो।

 

हम खाते हैं बाटी
हरी मिर्च और प्याज़ के साथ,
और साथ में नसनीर खोदी।

 

हम — लमणी मुसाफ़िर,
बाटी की ब्रह्माण्डी आकृति पर —
हवा के संग, पराग-धूल जैसे उड़ते हैं।

 

बाटी के नीचे हमारे सारे टाँडे
आराम करते हैं,
मक्का और ज्वार की छड़ियों की छांव में।
और हल्दी की उँगलियाँ हमारी ज़िंदगी को
एक हरे मैदान में बदल देती हैं।

 

जारेर बाटी — मकई या ज्वार के आटे से बनी पारंपरिक आदिवासी रोटी
नसनीर — मीठा या खट्टा पेय, छाछ जैसा पारंपरिक पेय
लमणी — बंजारा/घुमंतू समुदाय से जुड़ा व्यक्ति
चाँदला — राख या जलते अंगारों को रखने की मिट्टी की थाली या अंगीठी

“Jarer Bati (Jowar Roti)” – चकमक से चयनित, स्नातक सिलेबस, एस.आर. एवं बी.जी.एन.आर. राजकीय डिग्री कॉलेज, खम्मम, तेलंगाना (2019) में।

 

हमारा टाँडा  

 

हमारा टाँडा – एक परिंदे का घोंसला,
एक टूटा हुआ बसेरा,
और ज़िंदगियाँ — पंखों की मानिंद,
हवाओं में भटकती हुई।

 

चाँद और सूरज,
वक़्त के अंडे सेते हैं जब तक उनका मन चाहे,
फिर समय के होठों पर सिलवटें छोड़कर उड़ जाते हैं।

 

आईने उम्मीदें उगाते हैं,
हमारा ही अक्स दिखाकर।
चुपचाप उँगलियों के जोड़ चटकते हैं,
और फिर —
टूटे हुए टुकड़े सीने में चुभा जाते हैं।

 

बकरी, गाय, भैंसें, भेड़ें — और दिल भी,
ख़्वाहिशों से जंगलों में दरिया खोदते हैं।
बच्चे, रात की काली चादर पर
मीठे पेपरमिंट या दूधिया हलवे का सपना देखते-देखते।
उँगलियों से पंखों वाले घोड़े बनाते हैं,

माएँ लोरी गाती हैं,
दीए रात की चूड़ी पहन
नींद की बारात सजा देते हैं।

 

पिता — घर की पहरेदारी में,
एक आँख ‘झोपड़ी’ पर टिकाए,
दूजी को खेतों पर लगाए,
खिड़की से झाँकते सिर —
जलती मशाल बन जाते हैं।

 

इप्पा के फूल भी रो पड़ते हैं,
अपने नशे की ख़ुशबू छोड़ते हुए —
जब कोई हमारे तंडे की कहानी सुनाता है।

 

टाँडा – आदिवासी या घुमंतू बस्ती
इप्पा के फूल – सुगंध वाले स्थानीय फूल

 

 

काग़ज़ पर ज़िंदगी 

 

मेरा सपना है कि मैं चलूँ
काग़ज़ पर तैरते, बेवज़न ख़्वाबों के बीच।

 

मेरे ख़्वाब में,
मैं एक ख़्वाब में जागता हूँ।

 

पाँवों के नीचे
काग़ज़ की एक अंतहीन चादर फैली है।
उसके बिल्कुल बीचों-बीच मैं खड़ा हूँ —
जैसे एक सफ़ेद संगमरमर की मूर्ति,
अपनी ही खोई हुई नज़र खोजती है।

 

सफ़ेदी
एक नदी की तरह बहती है इस काग़ज़ पर।
उसकी धाराओं में
लाखों पते मछलियों-से तैरते हैं।
मैं उनसे गुहार लगाता हूँ —
कि मेरे दिल के मंज़रों तक
मेरा पता पहुँचा दें।

 

जब पाँव थकते हैं,
आँखें भीग जाती हैं।
मैं दो बार पलकें झपकाता हूँ —
और सफ़ेद मोरों का एक झुंड
काग़ज़ पर भटकता हुआ दिखता है।
क्या वे भी अपना खोया रंग ढूँढ़ रहे हैं?

 

मैं हिल नहीं सकता,
इस काग़ज़ से निकल भी नहीं सकता।
मैं खड़ा जम गया हूँ — एक बुद्धिजीवी की तरह।
लिखने की तड़प दम घोंटने लगती है।
मैं अपनी त्वचा काटता हूँ
कि शब्द बहें —
मगर मेरा लहू भी… सफ़ेद ही बहता है।

 

मैं झुकता हूँ
और काग़ज़ को छूता हूँ —
उसके नीचे एक और दुनिया की धड़कन महसूस होती है।

 

वे कौन हैं?
कैसे रंग हैं उनके?
शायद उन्हें न पसंद हो किताबों और क़लमों का दीवाना मैं।
शायद इसलिए मैं अकेला खड़ा हूँ — ड्रीमलैंड के बीचों-बीच,
शब्दों की भीड़ में, एक अनसुना सन्नाटा ओढ़े।
इन लफ़्ज़ों का बोझ भी महसूस होता है मुझे,
और उनका ख़ालीपन भी।

 

काग़ज़ के नीचे
हँसी है, रुदन है, चीखें हैं —
मैं उन्हें छू सकता हूँ
पर समझ नहीं सकता।
पहचानने से पहले ही वे धुँधले हो जाते हैं।
दिन खुद को मिटा रहे हैं
और मैं वहीं का वहीं खड़ा हूँ।

 

काग़ज़ पर सफ़ेद फफूँदी
उग गई है —
अपने जीवन चक्र में लिपटी हुई।
मेरे ऊपर —
रूई जैसे बादलों में लिपटा एक आसमान है,
न रात है, न सुबह।

दूर कहीं कोई शोर उठता है,

और तुरंत ख़ामोशी में डूब भी जाता है।
चार दिशाओं में, काग़ज़ के चार सिरे खुलते हैं —

 

पहला दृश्य:
सफ़ेद धुआँ
घूमता हुआ आसमान की ओर उठता है —
शायद उन पेटों से निकला हो
जो भूख से मरे थे।

 

दूसरा दृश्य:
आदिवासी तने खड़े हैं —
आसमान की ओर तीर खींचे हुए,
बादलों को ज़मीन पर उतारने की ज़िद लिए।

 

तीसरा दृश्य:
पर्वत लहरों की तरह उठते हैं।
उन पर फ़रिश्ते खड़े हैं —
अपने ही पंख काटते हुए।

 

चौथा दृश्य:
कि कोई दृश्य नहीं था वहाँ — देखने को।
मेरे पाँव, ख़ुद-ब-ख़ुद चल पड़े काग़ज़ के चौथे कोने की ओर।
वहाँ — सफ़ेद चादरों में लिपटे थे शव —
शायर, लेखक, और पत्रकार,
जिनकी क़लम अब सिर्फ़ मौन लिखती है।

 

काग़ज़ पर लिखी ज़िंदगी,
ख़ुद काग़ज़ जैसी होती है —
नाज़ुक, बेठिकाना,
आसानी से फट जाने वाली।
काश कोई इसका फलसफ़ा समझा देता
इससे पहले कि मैं अपनी आँखों की रोशनी खो दूँ।

 

“Life on Paper” विजयनगर श्री कृष्णदेवराय विश्वविद्यालय, बल्लारी (कर्नाटक) के स्नातकोत्तर अंग्रेज़ी पाठ्यक्रम (2024) में शामिल है।

 

हम बंजारे 

 

हर सुबह जब आसमान की पीठ पर
रोशनी की दरार बनती है,
हम भी नये सिरे से,
खुद को बनाते हैं।

 

हर सुबह, हम खुद को, पेश करते हैं
एक कोरे काग़ज़ की तरह,
इस ज़मीन को, इस आसमान को, पेश करते हैं।

 

हम चलते हैं बैलगाड़ियों में,
अपना घर समेटे,
गर्भ में पलते, बच्चे की तरह,
मवेशी, परिंदे और भेड़-बकरियों का टोला साथ लिये।

 

हम बस, अपने पैरों के लाखों निशान, छोड़ जाते हैं,
ज़मीन पर गुड्डे, आकारों की तरह।

 

हमारी सैकड़ों बैलगाड़ियाँ, एक-दूसरे को थामे,
हज़ारों सालों से साथ चल रही हैं,
ज़मीन के बीचोबीच खिंची, एक लकीर की तरह,
जैसे रीढ़ की तरह, उसे सहारा दे रही हो।

 

अब हमारे साये के साथ
हमारे मवेशी और भेड़-बकरियाँ ग़ायब हो रही हैं,
जंगलों और घास के मैदानों की तलाश करते,
हम अपनी यादों का पिटारा साथ लिये,
चलते रहते हैं।

 

और यह ज़मीन और आसमान
हमारी कहानियों को ज़िंदा रखते हैं।

 

इन कहानियों का मरहम
हम अपने घायल शरीर पर, लगाते जाते हैं,
सोचते हैं — हम कौन हैं?
हम क्या हैं?
अपने ही वतन, हम अजनबी कैसे हो जाते हैं?

 

हमारे मवेशी और भेड़-बकरियाँ
दूर, पीछे छूट गईं, एक चीज़ की तरह,

चमकते हैं,

 

बस चले जा रहे हैं,
आँखें मूँदे,
छल करती,
माया की ओर।

 

घूंघटो की छाया 

 

घूंघटो,
जो परनानी का था,
टंगा था सींग पर —
उसके पति की बची आख़िरी छाया,
सजी रही रे, घर की दीवार पे।
वो पीला घूंघटो,
जिसकी किनारी — हथेली-भर गुलाबी,
नीचे से गाढ़े नीले रंग की रेखा  —
जैसे कोई सपना हो,
या किसी लोक-कथा का भटका हुआ जीव।
हर सुबह जब जागता हूँ,
या जब घर की चौखट पार करता हूँ,
वो घूंघटो मेरी नज़र से टकराता है —
और उसमें दिखती है वो —
हिरण के बच्चे और मेमने को
अपने सीने से दूध पिलाती,
उन्हें थपकियों में सुलाती।
मेरी माँ,
मेरी कमीज़ की जेब पर
तीन तरह के आईने और सफेद मनके
सिल देती थी — घूंघटो से तोड़कर,
कहती थी —
तेरी परदादी तेरी परछाईं बन
तेरे साथ चलती है।
गोल आईना —
ज़िंदगी की रोटी है,
जिससे साँसों की आँच जलती है।
लंबा, आयताकार आईना —
मरण के बाद की धरती,
जहाँ आत्माएँ बीज बनकर लौटती हैं।
चौकोर आईना —
घर की मिट्टी है, खेती की ज़मीन।
मनके —
हर मौसम में धड़कनों की गिनती।
दशकों की तरह बीते मौसम,
दीवार की मिट्टी में,
धीरे-धीरे सनते गए घूंघटो,
धागे घुलते रहे जैसे समय की लकीरें।
मेरी कमीज़ पे जो शीशे थे —
सब टूट चुके थे।
तांडा में अब
कोई घूंघटो नहीं बचा —
सब ओझल हो गए
उन लोगों के साथ,
जो उन्हीं घूंघटो में जन्मे थे, पले थे |

घूंघटो – घूंघट; सिर पर ओढ़ा जाने वाला पारंपरिक कपड़ा

 

रमेश कार्तिक नायक

रमेश कार्तिक नायक को वर्ष 2024 में उनके कहानी-संग्रह “ढवलो” के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मात्र 26 वर्ष की आयु में यह सम्मान प्राप्त करने वाले वे पहले जनजातीय तथा सबसे युवा तेलुगु लेखक हैं।
तेलंगाना से आने वाले रमेश एक द्विभाषी कवि, कथाकार और अनुवादक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हैं—पाँच तेलुगु में और एक अंग्रेज़ी कविता-संग्रह Chakmak, जिसे वर्ष 2024 में Muse India Young Writer Award (कविता श्रेणी) मिला।
वे बंजारा समुदाय के जीवन और संस्कृति को तेलुगु साहित्य में सशक्त स्वर देने वाले अग्रणी रचनाकारों में हैं। उनकी कविताएँ Poetry at Sangam, The Wire, Outlook India, Indian Literature और Scroll सहित अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाएँ कई भारतीय भाषाओं में अनूदित हैं और Central Board of Secondary Education (CBSE) की कक्षा 8 की अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तक में भी शामिल की गई हैं।

 

 

 

मट्टा प्रसाद बाबू (अनुवादक)

 

मट्टा प्रसाद बाबू अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह से जुड़े बहुआयामी रचनाकार हैं, जिन्हें फ़िल्म, संगीत और मीडिया के क्षेत्र में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने अपनी रचनात्मक यात्रा All India Radio और Doordarshan, पोर्ट ब्लेयर से आरंभ की।
वे Babu Talkies के संस्थापक और VSA Records के क्रिएटिव डायरेक्टर हैं। फ़िल्ममेकर और कहानीकार के रूप में उन्होंने कई फ़िल्में, म्यूज़िक वीडियो और दस्तख़त जैसी कविता-पॉडकास्ट शृंखलाएँ निर्मित की हैं|
गीतकार और संवाद-लेखक के रूप में उन्होंने स्वतंत्र संगीत और मुख्यधारा सिनेमा—दोनों में कार्य किया है। वे The GOAT, OG और Akhanda 2 जैसी फ़िल्मों के लिए हिंदी संवाद, गीत और डबिंग निर्देशन से जुड़े रहे हैं। वे आगामी फ़िल्म Handumaan के लेखक भी हैं—जो अंडमान से निर्मित होने वाली पहली फीचर फ़िल्म है।
वे हिंदी, अंग्रेज़ी, तेलुगु और तमिल—चार भाषाओं में पटकथा एवं साहित्य का अनुवाद करते हैं। उनके कार्य में संवेदनशीलता, लय और सांस्कृतिक गहराई का सशक्त समन्वय दिखाई देता है।

 

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