समकालीन कविता
लगन
गरीब का रात्रिभोज पानी है
नंगे पाँव,
तारकोल की सड़क पर चलते
इधर-उधर भीख माँगते बच्चे।
शीशा बंद,
गाड़ी के भीतर
ठंडी हवा में सोया हुआ एक व्यक्ति।
शीशा खटखटाकर
उसे जगाया गया।
“दे दो न दस-बीस रुपये।”
उसने रुपये थमाते हुए पूछा,
बताओ,
जब बारिश होती है
या भीख नहीं मिलती,
तो खाली पेट
रात कैसे कटती है?
कोमल हृदय से
सहज उत्तर आया—
“पानी पी लेते हैं
और सो जाते हैं।”
मानदारी छोटी ईमानदारी है
प्रिंट मीडिया से
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक
एक ही खबर
तेज़ी से चलती रही
कंडक्टर ने
ईमानदारी दिखाई,
“लौटा दिया
लाखों का फोन।”
खबर पढ़ते-पढ़ते
मन में
एक सवाल ठहर गया
क्या ईमानदारी
राशि देखकर तय होती है।
अगर वही फोन
सस्ता होता,
और लौटाया जाता,
तो क्या
यह खबर बनती,
तब शायद
उसे कहा जाता
मानदारी,
ईमानदारी नहीं।
सस्ती चीज़ें
खो जाएँ
तो ढूँढी नहीं जातीं,
क्योंकि
खोज भी
कीमत देखकर होती है।
गरीब खो जाए,
तो कोई खबर नहीं बनती
खबर बन जाती है,
मीडिया को अमीर बनाना पड़ता है ।
ईमानदार चोरी
चोरी की है मैंने बहुत बार,
आज फिर की एक बार।
पुस्तकालय से किताबें,
पढ़कर वापस वही रख देता हूँ।
कहानियाँ जो पढ़ीं,
दूसरों को सुनाता हूँ—
जो किताबों तक नहीं पहुँच पाते।
चोरी की है मैंने बहुत बार,
आज फिर की एक बार।
नाखूनों का कवच
सोशल मीडिया में ख़बर
आग की तरह फैल गई—
नागासाकी और हिरोशिमा पर
फिर बरस रहे हैं परमाणु बम,
दुनिया सहम गई।
न्यूज़ की पुष्टि में
जांच एजेंसियां जुट गई,
भ्रांति फैलाने वाले व्यक्ति को
न्यायालय में पेश किया गया,
सख्ती से सुनवाई हुई।
अपने बयान में उसने कहा—
“जंगल से कुछ लोग लौटे हैं,
जो वहाँ बम फेंककर आए हैं।
अब वे निडर होकर घूम रहे हैं—
उनके गले में सोने की चेन है,
और हाथों में स्वर्ण अंगूठियाँ चमक रही हैं।”
उन्हें इनाम में
जंगली जानवरों के नाखून दिए गए हैं,
जिन्हें वे बहुत शान से पहनते हैं—
चेन में पिरोकर,
अंगूठी में जड़ाकर।
वे कहते हैं,
“अगर परमाणु बम भी गिरा
तो हमें कुछ नहीं होगा,
क्योंकि हम
सुरक्षा-कवच पहने हुए हैं।”
जब भी कोई हो आए पास,
बन आओ एक उजास —
न बातों से,
न तोहफों से,
सिर्फ़ एक सादे लम्हे में
उनकी मुस्कान उग आए।
जैसे
अँधेरे कमरे में
किसी ने हल्के से साँस ली हो
और दीया
झिलमिला कर
कह उठा हो — “मैं यहाँ हूँ!”
डायन — एक दर्पण की कथा
गाँव में एक डायन है,
सारी औरतें उसका ज़िक्र करती हैं,
दुपट्टे के कोने में मुँह छिपाकर
चुपके से एक-दूजे को बताती हैं —
“उसके घर में अजीब चीज़ें होती हैं।”
उन्होंने अपने पति से कहा,
जो खांसी की तरह टाल गए।
बुज़ुर्गों को बताया,
जिनकी आँखों में सिर्फ़ अंधविश्वास बसता था।
डायन की एक कहानी मैंने भी सुनी है
वो दरअसल कोई और नहीं,
एक दर्पण जैसी होती है।
जो भी उसमें झाँक ले,
अपना असली चेहरा देख लेता है।
उस दर्पण में कोई आँखें झुका लेता है,
कोई हँसकर मुड़ जाता है,
पर जो रुक जाता है,
जो पहचान लेता है
कि वह छवि उसी की है
उसका स्वरूप बदल जाता है,
और अंतत: “डायन” हो जाता है।
गौरैया जब संसद में जाएगी
न्यायपालिका, कार्यपालिका
यह सब क्या है ?
पक्षी असमंजस में हैं ,
पिंजरे में बंद तोता,
दूर से देखता है चुपचाप :
” विधानपालिका के दोस्त हैं, “
वह कहता है ।।
सुनाई पड़ती है सरगोशियां,
“जंगली जानवरों के भी अधिकार होंगे।
खगों का भी एक संविधान होगा “।
पर ऐसी पहल करने वाले माननीय,
अगर संसद में खड़े होंगे,
तो आने वाले चुनाव में ,
अवश्य उनका काम तमाम होगा।
वन्य प्राणी, सूची में अपवाद हैं,
फिर ये देशभर में हो रहा नुकसान ,
कौन सा बड़ा विवाद है।
यहीं से तो आय मिलेगी भविष्य में,
वन्य नुकसान तो एक सूक्ष्म सा अवसाद है ।।
आख़िर में,
पक्षी फिर आकाश की ओर देखते हैं—
वे सोचते हैं,
क्या लोकतंत्र केवल इंसानों का है?
या कभी ऐसा दिन भी आएगा
जब संसद की दीवारों पर
कोई गौरैया भी बैठेगी
और उसकी चहचहाहट अधिकारों की बहस बनेगी।
जन्म स्थान: टकोली,
जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश, बम निरोधक विषय में प्रशिक्षण – नेशनल सिक्योरिटी गार्ड, मानेसर (राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के अंतर्गत), पुलिस अधिकारी, बम निरोधक दस्ता।
वर्तमान तैनाती: जिला कुल्लू, हिमाचल प्रदेश, हिंदी एवं कुल्लू क्षेत्र की स्थानीय बोली में कविता लेखन। कविताएँ “विपाशा” एवं “हिमतरु” पत्रिकाओं में प्रकाशित, 7084 मीटर ऊँची सतोपंथ चोटी का सफल आरोहण।
विनय मिश्र
(1)
इन दुखों में ज़िन्दगी का गीत होकर
गा मेरे मन गा खुशी का गीत होकर
आज चलकर सुर मिलाता हूँ इसी में
रास्ता है अजनबी का गीत होकर
इन अँधेरों में चमकता आज भी कुछ
हौसला है रौशनी का गीत होकर
देर तक सुनता रहा है वक्त मुझको
मैं रहा हूँ खामुशी का गीत होकर
मुस्कुराने की कहाँ फ़ुर्सत है मुझको
इस उदासी की सदी का गीत होकर
मेरे सिर पर हाथ उसका है यक़ीनन
सोचता हूँ मैं किसी का गीत होकर
जल रहा हूँ एक दीपक- सा तिमिर में
अपने घर की देहरी का गीत होकर
एक मीठी प्यास ही ठहरी हुई है
मेरी आँखों में नमी का गीत होकर
क्या करोगी तुम हवा जो आ के पूछे
तुमसे कोई दोस्ती का गीत होकर
(2)
कई रंगों की इक बौछार होकर
कोई उतरा है दिल में प्यार होकर
बरसते इन दुखों के बादलों में
स्वयं मैं भी हूँ पानीदार होकर
अभावों की सुलगती रेत पर हूँ
अभावों से भरा संसार होकर
अकेलेपन से ऐसी निभ रही है
अकेला ही हूँ मैं परिवार होकर
वहाँ तो भीगता है मन मेरा भी
जहाँ पर आग हो जलधार होकर
न जाने कौन है वो मेरे दिल में
किसी वटवृक्ष का विस्तार होकर
अभी तो रास्ते में हैं उमीदें
कहाँ तुम चल दिए तैयार होकर
उजाला ढाल होकर सामने है
अँधेरा है भले तलवार होकर
(3)
यूँ रवानी में प्यास थी फिर से
आ गई ध्यान में नदी फिर से
फिर से कुछ दूर हो गया पानी
हो गई धूप कुछ कड़ी फिर से
अनसुना कर गया था मैं लेकिन
किसने आवाज़ मुझको दी फिर से
इस तरह उसने आंँख भर देखा
आँख सूखी थी भर गई फिर से
अपनी ख़ामोशियों को रखती है
मेरी बातों में ज़िन्दगी फिर से
रोज़ की उलझनों में होकर भी
लौट ही आती है खुशी फिर से
यूँ लगा अब न कट सकेगी रात
शुक्र है इक सुबह हुई फिर से
(4)
एक अच्छी रस्म का पालन नहीं होता
चाहता हूँ पर करूँ क्या मन नहीं होता
कौन देता आ के मेरे हाथ में सूरज
मैं जो अपने आप ही रौशन नहीं होता
सूख भी जाए तो उसको बहना पड़ता है
एक दरिया की तरह जीवन नहीं होता
इक अदद इंसान ही होता है हर कोई
कोई बाभन या कोई हरिजन नहीं होता
राम कैसे राम बनते सत्य के पथ पर
जो कथा में झूठ का रावण नहीं होता
उसके ही चेहरे पे रौनक देखता हूँ मैं
बदनुमा जिसका कभी दामन नहीं होता
हाथ से कैसे पकड़ता याद की तितली
आज जो मुझ में मेरा बचपन नहीं होता
(5)
कोई बादल होकर फिर बरसा है क्या
आँखों से जो बहता है सपना है क्या
हाथ पकड़कर ले चलते हैं मेरे ख़्वाब
मैं क्या जानूँ आगे का रस्ता है क्या
इस चमकीले पानी में पानी होकर
जो चमका है वो तेरा चेहरा है क्या
आज गद्य की भाषा में जो उतरी है
अपनी लय खोकर भी वो कविता है क्या
उड़ने की भूलूँ इतना आराम मिले
अपना जीवन सोने का पिंजरा है क्या
सबके मुँह पर ठहरी है पानी की बात
हम जैसे प्यासों का ही मेला है क्या
घर आँगन में उड़ती है उम्मीदों की
तुम ही बोलो वो कोई चिड़िया है क्या
विनय मिश्र-
ग़ज़ल संग्रह “सच और है” – (2012) गीत संग्रह “समय की आँख नम है” -( 2014), कविता संग्रह “सूरज तो अपने हिसाब से निकलेगा” -( 2015) दोहा संग्रह “इस पानी में आग- 2016, ग़ज़ल संग्रह “तेरा होना तलाशूँ” – 2018 ग़ज़ल संग्रह “लोग ज़िंदा हैं”-2021, ग़ज़ल संग्रह ‘ ज़िन्दगी आने को है ‘ – 2023 , ‘रंग बारिश’ -2025
वरिष्ठ कवि आलोचक नचिकेता द्वारा संपादित 8 प्रतिनिधि ग़ज़लकारों के महत्वपूर्ण संग्रह “अष्टछाप” में शामिल, वरिष्ठ जनधर्मी आलोचक डॉ. जीवन सिंह की पुस्तक “आलोचना की यात्रा में हिंदी ग़ज़ल” में प्रतिनिधि ग़ज़लकार के रूप में शामिल
– लब्धप्रतिष्ठ आलोचक डॉ जीवन सिंह द्वारा दस प्रतिनिधि ग़ज़लकारों की संपादित पुस्तक – – “दसखत “में शामिल, अनेक पत्रिकाओं का संपादन,’विनय मिश्र का रचना कर्म: दृष्टि और मूल्यांकन'(सन् 2023) – संपादन – श्रीधर मिश्र
उदयपुर विश्वविद्यालय, अलवर विश्वविद्यालय से कविताओं और ग़ज़लों पर शोधार्थियों को पीएचडी डिग्री अवार्ड। गोरखपुर विश्वविद्यालय और रांँची विश्वविद्यालय में समग्र रचना कर्म पर शोध कार्य पंजीकृत।
मोबाइल- 0-9414810083
ईमेल- mishravinay18@gmail.com
वेबसाइट – www.vinaymishrapoet.com
योगेश कुमार ध्यानी
मेरे बस में होता यदि तो
मेरे बस में होता यदि तो
उसको ले आता अपने घर
सारे टापू और मछली संग
बैग में भर ले आता सागर
लाने को तो ले ही आता
लेकिन मेरी मुश्किल ये है
जो खुद में भर पाये सागर
इतनी बड़ी नहीं कोई गागर
माना चलो अगर बन जाती
सागर जितनी बड़ी सी गागर
अगर मैं सागर को ले आता
यह नावों को ज़रा न भाता
बिन पानी के नाव न चलती
मछुआरे क्या करते फिर तो
कैसे अपने घर को जाते
गये हुए हैं दरिया में जो
इसीलिए मैं उसे न लाया
लाया केवल यादें उसकी
उसकी रातें, उसकी सुबहें
उसकी सिहरन उसकी सिसकी।
सब चीजों की जगहें तय हैं
उनको नहीं हटाना अच्छा
पर्वत , पर्वत पर ही जंचता
सागर , सागर में ही अच्छा।
फरवरी: कुछ कविताएं
(1)
ये फरवरी के परिचित दिन नहीं हैं
इनकी हवा में
जनवरी की ठंड है
मार्च बहुत दूर दिखता है अभी…।
(2)
फरवरी यदि मलाल है
साल के एक माह के यूं ही बेकार बीत जाने का
तो उम्मीद भी है
कि ग्यारह अब भी शेष हैं
(3)
सफेद है
फरवरी का रंग
बर्फ पर चमकती हुई धूप की
गर्माहट सा
(4)
बड़े-बड़े भाइयों के बीच
चहेती
छोटी बहन सी
फरवरी
(5)
इस फरवरी
देश में कोई चुनाव नहीं
इस फरवरी कुछ कम हैं
हवा में षड्यंत्र
(6)
बहुत बढ़ गयी हैं
संसार में नफरतें
पिछली फरवरी से
इस फरवरी
इस बार होना तुम
और भी प्रेम से भरी
प्रिय फरवरी…।
चलना
दीवार पर चींटियों की कतार चल रही है
जिस जहाज को मैं आया था छोड़कर
वह भी चल रहा होगा बीच समुद्र में
शहर में तेज रफ्तार मेट्रो चल रही है
चक्की चल रही है
बाज़ार में खरीद-फरोख्त चल रही है
खातों में लेन-देन चल रहा है
संसद में लोकसभा की कार्रवाई चल रही है
यहाँ पड़ोस में भागवत चल रही है
गिरने की आशंका के बगैर
सरकार चल रही है
संसार के कुछ हिस्सों में चल रहा है युद्ध
युद्ध विराम के लिए वार्ताएं चल रही हैं
सेवानिवृत्त आदमी की पेंशन चल रही है
कितने ही आई सी यू में कितने अचेत मरीजों की
साँस चल रही है
इस लगातार चलती हुई पृथ्वी पर
दिन रात अनथक चल रहे हैं जीवन के कारोबार
फिर क्यों ठहरा हुआ है यह मन
इसे आखिर कौन सी गति की तलाश है?
श्मशान (कुछ चित्र)
(1)
जीवन की सेवानिवृत्ति है मृत्यु
अन्तिम संस्कार
उस सेवानिवृत्ति का जलसा।
(2)
जब जीवन का कारोबार ख़त्म हो जाता है
तब शुरु होता है
मृत्यु का कारोबार
वह भी कम बड़ा नहीं
लकड़ी, चादर, फूल, घी, कलश….
एक आग को
मुकम्मल करने का सारा सामान
पर मृत्यु जीवन से भिन्न नहीं
मृत्यु से जुड़ा कारोबार करने वाले लोग भी
देखते हैं जीवन से भरे हुए स्वप्न।
(3)
आग है जो स्वीकारती है
तुम्हारा सबसे प्रिय पत्र
वही लिखती है सबसे छुपाकर
उस पत्र के ऊपर पता
वही पहुँचाती है पत्र को उस पते पर
जहाँ से कोई जवाब नहीं आता..
(4)
कच्चा दस्तावेज़ है
एक मृत देह
उस दस्तावेज़ पर
मृत्यु की मुहर है अग्नि।
(5)
जैसा प्रतीत हो सकता है
वहाँ कुछ भी ठप नहीं है
लकड़ी के लगातार चटखने की आवाज़ है
हवा में उड़ते हुए राख के कण हैं
मृत से अपनी निकटता के अनुपात में
दुखी हैं लोग
कुछ का दुख इतना घना है
कि आँखों से बह रहा है
कुछ का मन के भीतर मनन के रूप में है
कुछ लोग सिर्फ संख्या हैं….
(6)
श्मशान मृत्यु के बोध से भरा हुआ है
पर जीवन जिद्दी है
बंजर ज़मीन पर कहीं-कहीं खरपतवार सा
यहाँ भी उगा हुआ है जीवन
आये हुए लोग
किसी अचानक बन गये चुटकुले पर
दबी आवाज़ में हंस रहे हैं
कुछ अपनी अगली कारोबार-संबधी
ज़रूरी मुलाकात का वक्त तय कर रहे हैं
इस सबके बीच एक काली बकरी है
पता नहीं कहाँ से आई हुई
जो जलती चिता के नज़दीक
चिता की तरफ देखते हुए
चुपचाप बैठी है।
(7)
आज तक
कोई नहीं कर सका
उस गिरोह की जासूसी
उसमें शामिल होने वाले लोग
अपनी शपथ के पक्के हैं
कभी नहीं खोलते अपने मुंह
उसका हुलिया, उसकी चाल, उसके इरादे
हम कुछ नहीं जानते
मृत्यु के बारे में आज तक
हमारे पास
मृतक का एक भी बयान नहीं है।
(8)
इस शहर के सबसे आखिर में
एक श्मशानघाट है
जैसे जीवन के सबसे आखिर में मृत्यु
शहर के ठीक बाद
बहती है एक नदी
जीवन के बाद
जलती है एक आग।
किस दिशा में है?
किस दिशा में है
हर चिन्ता से मुक्त
करवट का मुंह
किस कमरे की हवा
सबसे हल्की है
संसार में
कौन सा पहर है
जब पलकों पर कोई भार नहीं
क्या है
सुकून का अक्षांश और देशान्तर
समय के
किस खंड में है वह
क्यों हैं हम
धातु की तरह भारी
किस गुफा में है
हवा सा हल्का होने का रहस्य
कौन सा समुद्र है
हवा से अविचलित
कहाँ है
संसार की
सबसे सुन्दर नींद का द्वीप?
………………………………………………………
योगेश कुमार ध्यानी,
मैरीन इंजीनियर, साहित्य में छात्र जीवन से रुचि, हंस, वागर्थ,आजकल, परिन्दे, कादम्बिनी, कृति बहुमत, बहुमत , प्रेरणा अंशु, देशधारा, अन्वेषा आदि पत्रिकाओं मे कविताएं प्रकाशित
हिन्दवी, पोषम पा, जानकीपुल, इन्द्रधनुष, अनुनाद, कृत्या, इरा वेब पत्रिका , लिखो यहां वहां, बिजूका, नवरूपभ, मलोटा फोक्स, कथान्तर-अवान्तर, हमारा मोर्चा आदि साहित्यिक वेब साइट्स पर कविताएं तथा लेख प्रकाशित प्लूटो, किस्सा कोताह, प्रेरणा अंशु तथा शतरूपा पत्रिकाओं तथा जानकीपुल और वाग्मी की वेबसाइट पर बाल कहानियां प्रकाशित, नोशनप्रेस की कथाकार पुस्तक मे सन्दूक कहानी चयनित, एक अन्य कहानी गाथान्तर पत्रिका मे प्रकाशित, किस्सा कोताह में कहानी तथा लघुकथा प्रकाशित
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देशज पत्रिका तथा अनुनाद ई पत्रिका में लेख प्रकाशित
सदानीरा, पोषम पा तथा अनुनाद वेबसाइट पर कुछ विश्व कविताओं के अनुवाद प्रकाशित
कृति बहुमत, परिन्दे तथा आधारशिला साहित्यम पत्रिकाओं और अनुनाद ई पत्रिका मे विश्व कहानियों के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित
समुद्र पर आधारित कविताओं की दो किताबें “समुद्रनामा” तथा “समुद्रनामा 2” प्रकाशित हुई हैं।
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