कृत्या की कल्पना 2005  में साकार हुई थी, हालांकि कविता पत्रिका की जरूरत बहुत पहले से अनूभूत हुई थी। यह वह दौर था, जब भारत
निपट निरंजन की वाणी   महाराष्ट्र की नाथ परम्परा में निपट निरंजन का बड़ा नाम है, नाथ कवियों की वाणी में सूफी कवियों के समान जीवन के
सुदीप एक खूबसूरत कलाकार हैं, और मंच पर बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति देने में कुशल हैं, इस बात का परिचय मुझे 2013 में कृत्या  फेस्टीवल के
समकालीन कविता में दुनिया के दो अलग छोरों से तीन कवयित्रियों की कविताएं प्रस्तुत हैं। यह समकालीन कविता की विशेषता है कि महिलाएं देश-दुनिया की
किंशुक शिव   धार्मिकता के अतिरेक ने साहित्य से दार्शनिकता को छीन सा लिया है। जीवन केवल वही नहीं जो दिखाई देता है, बल्कि वह भी है
फलीहा हसन (इराक) अनुवाद बृजेश सिंह   स्टालिनग्राद मैंने कुछ पलों के लिए उन जंगलों की आस की, जो मेरे लिए ही उगे हों,मैं ख्वाब में उन्हें सहलाते हुए,
चण्डीदास चण्डीदास बंगाल की अप्रतिम भक्त कवि परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे जयदेव के समकक्ष लोक मन में काव्य प्रेम को जागृत करने में समर्थ
दुनिया का चक्कर लगाने सेदुनिया के अंत तक नहीं पहुँचा जा सकता हैलेकिन अंत तक पहुँचे बिनादुनिया के दर्दों से छुटकारा भी तो नहींतभी तो
राजेंद्र नागदेव   पानी   बुद्ध! तुमने अछूत कन्या के हाथ से पानी पीया था क्या तुम नहीं जानते थे पानियों की भी जातियाँ होतीं हैं? जानते थे बुद्ध! तुम्हारी प्यास केवल
हशम तुरबी काम हम करते हैं सदियों से रईसों के लिये , कब पहनने को भला हमको मिला रेशम है। इन पंक्तियों के रचयिता, रेशम के ताने में