अजंता देव अजंता की इन कविताओं को मैंने उनके मुंह से बेहद अनौपचारिक काफी बैठक के दौरान ही सुना था। ये कविताएं न व्यक्तिगत पीड़ा की
कविता ने अनेक वीथियाँ पार की हैं, राजप्रकोष्ठों से लेकर साहित्यिक प्रकोष्ठों से होते हुए गली कूचों तक, लेकिन हम अक्सर उनसे संवाद करना भूल
श्री. तान्हाजी रामदास बोऱ्हाडे.हिंदी अनुवाद- स्वाती दामोदरे  १)पसीने की बारोमासी नदी किसने देखा हैआसमान से धरतीपर गंगा उतारने वालेपुराणकथाओ के भगीरथ को ?मैने अपनें बचपन से देखा
नवरात्रा हमारी प्राथमिकता हमारी प्राथमिकतावो रोज़ सबसे पहले उठकरसूरज को जगाती है,सबके लिए अलग-अलगनाश्ते बनाती है,दौड़-भागकर घर के सारे काम निपटाती है,फिर चाँद को पहरेदार बनाकरसबसे आखिरी
प्रताप नारायण मिश्र   प्रताप नारायण मिश्र मूलतया गद्यकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, किन्तु आपकी काव्य शक्ति भी अपने समय की कसौटी पर खरी उतरती है।
मौला रहम करे गुजरे साल की पगडन्डी पर चलते फटी एड़ी वाले कदमों पे कदमों के नीचे तलवों के छालों पर रसोई में टनटनाते बासनों पर किसान के खेत में
जितेन कुमार दास   फातिमा शेख   चारदीवारी में क़ैद एक पूरी सदी की चुप- जहाँ लड़कियों की किताबें सिर्फ़ कुरान की आयतों तक सीमित थीं, और धूप भी परदों को चीर अंदर आने
'मान्योशु' जापानी कविता अनुवाद और टिप्पणी‍-रीतारानी पालीवाल उचित के विस्तृत समतल इलाके मेंआगे बढ़ते घोड़ों की कतारभोर की इस बेला में-सोचती हूँ वे घोड़े की पीठ पर
गोपाल माथुर एक पीड़ा की नीली देह सौंपती अपने दुःख किसी अदेह वनचर को दीवारों पर से रिसते रहते पुराने घाव जैसे किसी खण्डहर के पत्थरों के बीच बह रहा हो लहू इ ति हा स बन कर कहाँ से
मृदुला गर्ग एकान्त नहीं कोरोना काल में मुझे एकान्त की आदत हैमुझे एकान्त प्रिय हैएकान्त में स्मृति जगती हैबेआहट,बेआवाज़ऐसे कैसे आ जाता प्रेमीनिःशब्द अचानक पासइतने कितने चुम्बन