कविता के बारे में

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
  
अनिल अनलहातु 
 
 
तलाश
 
वह दिसंबर की एक सर्द शाम थी,
और तुम्हारी कुर्सी
खाली थी ,
वह खालीपन तैर  रहा है
अब भी मेरी
सूनी आंखों में ….।
सड़कों पर जलते पीले
बल्ब के लट्टुओं  की
 पीली मुरझाई हुई रोशनी में
देखता हूं दूर तक
देर तक…
तुम नहीं हो …….।
गायब हो रहे हैं
बड़ी तेजी से
लोग, चेहरे और हमारी स्मृतियां।
 
एक दरकन है
एक टूटन है
एक स्मृतिभ्रंश में जीता
मैं भटकता हूं
“मिलान” की संकरी गलियों में,
“कामू” को देखा
उन्हीं सुनसान गलियों  में
दीवारों से लग कर रोते।
मैं उठता हूं और
इस बर्फीली तूफानी रात में
“लूसी ग्रे” की अनाम कब्र
तक जाता हूं ।
“हरमन हेस्से” के
फादर-फिक्सेशन को
समझना चाहता हूं,
किस दुख से निजात पाने
हेस्से, पिता की कब्र तक
गए हर बार बार-बार।
अमावस की काली स्याह
रातों में
सुबकते देखा “हरमन हेस्से” को
रियूपालु के कब्रिस्तान में,
“कार्ल ऑटो जोहान्स” की
तड़प भरी बेचैनी
दिखी मुझे
“सिल्विया प्लॉथ” के ‘डैडी’ में।
हज़ार वर्षों की
इस बेचैनी और अनिद्रा को
बांटना चाहता हूं
“जीवनानंद दास” की नाटोर  की
“वनलता सेन” से।
मैं भिक्खु होना
चाहता हूं,
बौद्ध भिक्षुणी  “पटाचार” और “खेमा” से
प्रव्रज्या लेता,
दुखों से मुक्ति का
रास्ता तलाशता
भटकता रहा,
तक्षशिला से मस्की तक,
भद्रबाहु से कुमारगिरि तक,
और पंपोर से कालाहांडी तक।
 
 
 
महात्माओं से माफी मांगते हुए
 
 
 
बेवजह मत बनाओ उसे
क्रांतिकारी और महान
रहने दो उसे मनुष्य ही,
अपनी कमजोरियों और
संस्कारों के साथ, जिसमें
वह हुआ पैदा और एक दिन
चला गया अनंत यात्रा पर;
कि मरने के पहले वह
कांपती आवाज में राम-राम
बोल रहा था ….।
हां! सरशाम में बड़बड़ाता हुआ कभी नेहरू
का हाल पूछ लिया करता था,
यह सही है कि वह चिंतित था
एक उदीयमान राष्ट्र को लेकर
किंतु क्रांति की ओट में खड़े होकर
उस सच को न झुठलाओ कि
वह मरने के समय राम-राम
बुदबुदा रहा था न कि ….
उसे उन उपलब्धियों से न ढको
जो उसकी न थीं क्योंकि
उसने जो कुछ अर्जित किया था
अपने काव्य कर्म से,
अगर उसे समझ सको तो
पर्याप्त है उसे अमरत्व प्रदान करने
के लिए।
और मत लिखो हे राम!
उस नंगे फकीर के समाधि लेख पर
यह झूठ न ही लिखो तो बेहतर
क्योंकि सुननेवालों और देखनेवालों ने
आह और कराह की ही ध्वनि सुनी थी,
वही सुनने दो दुनिया को
जो सच था,
उस पुण्यात्मा को झूठे खिताबों से
न नवाजों
जिसकी सारी जिंदगी
सत्य की शोधशाला में
प्रयोग करते बीती,
उसी की समाधि पर यह कैसा झूठ !
क्यों लिखते हैं ये झूठ ?
क्या उस महान आत्मा की महानता को
और बढ़ाने के लिए
या अपनी राजनीति को और
चमकीला और धारदार बनाने के लिए?
क्या वाकई उन्हें ऐसे झूठ की
जरूरत है महान होने के लिए?
सच्चाई तो यह है मेरे भाई
कि ये झूठ उनकी क्रेडेबिलिटी और
सत्यनिष्ठा को और प्रश्नांकित ही करते हैं।
कहने दो और जानने दो कि
वह ‘मटियानी’
मरने के पहले अर्ध विक्षिप्तावस्था में
दुर्गा सप्तशती का पाठ करता
हत्यारों द्वारा मारा गया।
इसमें कोई शर्म नहीं कि
वह दुर्गा सप्तशती या हनुमान चालीसा
पढ़ता पाया गया,
शर्म इस पर करो कि
भीड़ भरे चौराहे पर
डोमा जी उस्ताद
किसी ‘मटियानी’
की हत्या करता है,
कि
भरे कालेज में मान बहादुर को
हत्यारों ने टुकड़े-टुकड़े काट डाले,
कि सरे बाजार चंद्रशेखर की होती है
हत्या
कि मारा जाता है बेवजह आलोचक
का निर्दोष पुत्र, एक लेखक का मासूम
बेटा ,
विक्षिप्त बना दिया जाता है एक कवि,
एक कवि दिल्ली की घुटन भरे
तंग कमरे में गमछे से फांसी लगा
लेता है,
एक कवि ब्रेन ट्यूमर का शिकार
बना, असमय
काल कलवित कर दिया जाता है,
एक संभावनाशील महान कवि
राजपथ के चौराहे पर रेंगता हुआ
रौंद दिया जाता है …
शर्म करने के लिए बहुत सी
वजहें हैं, देखो और शर्म करो,
शर्म से गड़ जाओ,
शर्म से डूब मरो।
बस उन महात्माओं को
माफ करो,
उन्हें उन उपलब्धियों से
न नवाजों जो उनकी
थी नहीं।
 
 
 
 क्या तुमने कोई बूढ़ा पागल देखा है?
 
 
 
हिंदी के एक लेखक ने
कभी पूछा था हिंदी कथा संसार से,
क्या तुमने कोई सरदार भिखारी देखा है?
मैं पूछता हूँ  पूरे समाज से
क्या तुमने कोई वृद्ध पागल देखा है?
 
उन पागलों को हम बूढ़ा होने नहीं देते,
मार देते हैं हम उन्हें
उनकी जवानी में ही|
 
वैसे भी वे अभिशप्त होते हैं
दीर्घजीवी नहीं होने के लिए,
क्योंकि धूर्तता और कमीनगी
और संवेदनहीनता
न उन्होंने गुणसूत्रों में पाया
और न समाज से सीखा ही।
 
अक्सर वे दिख पड़ते हैं
स्टेशन की भीड़ भरी
संकरी गलियों और सड़कों पर,
या गर्द-गुबार भरे रास्तों  पर।
 
वह नींद से ऊबे और
नींद उनसे ऊबी हुई होती है,
और इसीलिए
कोई पागल कभी सोता हुआ
नहीं दिख पड़ता है।
 
 
–1–
 
 
वे सतत जागरण की
अवस्था में रहते हैं ,
जैसा  कबीर कहते हैं
“जागरण कौ अंग” में।
तो क्या वे  समाधिस्थ होते हैं ?
 
तो क्या पागलपन भी
एक किस्म की समाधि है ?
जब उनकी चेतना हो चुकी होती है
अंतर्मुखी।
क्या यह दुनिया ही
एक अंतहीन पागलखाना नहीं है?
जब कहता है खलील जिब्रान
कि एक पागल खाने से छूटा आदमी
अंततः दूसरे पागलखाने में ही
विश्राम क्यों पाता है ?
 
क्या कोई जन्म से ही
पागल होता है?
 
तो आखिर वह कौन सी
स्थितियां होती हैं?
जो एक सामान्य आदमी को
पागलपन तक पहुंचा देती हैं?
 
वे कौन लोग होते हैं
जो किसी को पागल
बनाए जाने के लिए
जिम्मेदार होते हैं ?
 
 
–2–
 
आखिर वह कौन सी सामाजिक
राजनीतिक परिस्थितियां थीं ,
जिसमें पड़कर
वशिष्ठ नारायण सिंह
नासा से कांके तक पहुंच जाते हैं?
हम उन्हें क्यों नहीं संभाल कर
रख सकते?
 
क्या हर पागलपन
एक हाराकिरी नहीं है?
अपनी आत्मा की निष्कलुषता को
बचाए और बनाए रखने की
आखिरी जिद ही तो नहीं
उसे पागलपन तक ले जाती है?
तो क्या यह मानसिक हाराकिरी  है?
जैसा कि गोरख पांडे के बारे में
कहते हैं चमनलाल
कि विचारों ने जलाया उसे
और विषमता की आग में दग्ध
उसकी आत्मा ने तपाया उसे,
और खुद को बचा लेने
की आखिरी कोशिश में ,
वे पागलपन और अंतत:
आत्महत्या तक गए।
 
क्या पागलों की उम्र
छोटी होती है ?
या पागलपन की उम्र ही कम होती है?
क्यों नहीं उन्हें हम संभाल
कर एक उम्र जीने देते?
 
 
–3-
 
क्यों मार देते हैं हम?
उन्हें असमय ही।
इसीलिए मैं एक बार
फिर पूछता हूं
कि क्या तुमने कोई
बूढ़ा पागल देखा है?
क्योंकि हम उन्हें
बूढ़े होने ही नहीं देते,
यह अलग बात है
कि कोई कोई
तब भी
महाप्राण निराला हो जाता है!!
 
 
    वायरस
 
 
                       “कहीं कुछ आही की ना आही” —- कबीर
 
‘कहीं कुछ है या नहीं’, पूछा उसने
ईश्वर से,
ईश्वर मौन रहा।
उसे बुद्ध याद आये
और उनका मौन याद आया,
वह शौपेनहावर की कुतिया तक गया
और पूछा, ‘आत्मा कौन है ?’
शौपेनहावर मौन है।
चीखता है अहूरमज़्दा
की ईश्वर एक मौन है।
आंखों में उतर आये
मोतियाबिंद की पारभासक रोशनी में
पूछता है वह मोहम्मद से
नन्नार की पहाड़ियों पर
अल्लाह कौन है ?
मोहम्मद मौन है।
स्टीफेन हाकिंग की
इलेक्ट्रो-यांत्रिक आवाज़ में
फुसफुसाता है तब डार्विन
कि ईश्वर एक वायरस है ;
प्रतिकुल परिस्थितियों में मृत पड़ा
ईश्वर वायरस की तरह
अचानक ही सक्रिय हो उठता है
हमारी खून की शिराओं की अनुकुलता में।
वक्र हंसी हंसता है मिखाइल गोर्ब्याचोव।
“ईश्वर के ताबूत में
ठोके गए उसके आखिरी कील को
निकाला किसने” –पूछता है नीत्शे।
और उसके 45 वर्षों बाद
दुनिया को बदल देने की
ग्लासनोत्सी अवधारणाओं में कैद
एक पूर्व कम्युनिस्ट
ईश्वर को निकालता है ताबूत से
और वायरस की भांति
छोड़ देता है मिडिल-ईस्ट में
केमिकल वेपन की तरह
अल-कायदा और मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए।
किसी भी किस्म की सत्ता द्वारा स्थापित
जीवन एवं ज़िंदगी की अनिश्चितता और
मृत्यु की अनिवार्यता के बीच
ज़िंदा है और रहेगा ईश्वर।
 
 

 
 
 
अनिल अनलहातु 
 
 
बिहार के भोजपुर (आरा) ज़िले के बड़का लौहर-फरना गांव में जन्में कवि समीक्षक अनिल अनलहातु ने आई०एस-सी० – सन्त कोलंबस कालेज, हजारीबाग और बी०टेक०, खनन अभियन्त्रण-  इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस, धनबाद से किया है। अनिल जी की कविताएं, वैचारिक लेख, समीक्षाएं एवम् आलोचनात्मक लेख आदि हंस, कथादेश, वागर्थ, समकालीन सरोकार, पब्लिक अजेण्डा, परिकथा, उर्वशी, समकालीन सृजन, हमारा भारत, निष्कर्ष, मुहीम, अनलहक, माटी,आवाज़, कतार, रेवान्त, पाखी, कृति ओर, चिन्तन-दिशा, शिराज़ा, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं साथ ही अंग्रेजी कविताएं पत्रिकाओं एवम् वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित। आपका एक कविता-संग्रह – ‘बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ’ भी प्रकाशित हुआ है।
 
कवि अनिल अनलहातु को ‘कल के लिए’ पत्रिका द्वारा मुक्तिबोध स्मृति कविता पुरस्कार, अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान, इलाहबाद द्वारा ’राष्ट्रभाषा गौरव’ पुरस्कार एवं आई०आई०टी० कानपुर द्वारा हिन्दी में वैज्ञानिक लेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
 
(नोट – कवि अनिल अनलहातु का चित्र और परिचय कविता कोश के आधार पर)
 
 
 
 
 

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