मेरी बात

कविता में प्रतिरोध

अधजली हालत में, बेड़ियों से जकड़ा इतिहास ऐन आँखों के सामने सलीब पर लटका था। नेरुदा की कविता बच्चे की लाश के पास बिछी पड़ी थी। दृष्टि और आवाज को घोंटने की साजिश को नकारती युवा शक्ति स्याह साया बने खड़ी थी। हथेली की लकीरों को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। …… यह सब कहाँ हो रहा था, या क्यों हो रहा था, सवाल इस बात का नहीं, बल्कि इस बात का है कि यह वह प्रतिरोध था जिसे प्रतीक बना इन सब स्थितियों की संरचना की गई थी, और यह संरचना मेरे लिए एक कविता बन कर खड़ी थी। यदि इसी बात को सिर्फ शब्दों के माध्यम से दिखाया जाता तो संभव था उसमें कविता जन्य आकर्षण ना हो पाता। हालांकि कविता को शब्दों से अलग कर देखना लगभग असंभव सा ही है। सवाल यह नहीं कि कविता में प्रतिरोध के लिए कितना स्थान है, सवाल यह है कि शब्दों के अभाव को कविता कैसे माना जा सकता है? यह सवाल मेरे सामने भी था, पर मैं इसे कविता मानने के अलावा और कुछ मान ही नहीं पा रही थी। चित्र इसलिए नहीं कि ये पूरी तरह चित्रित नहीं थे, इनमें काफी कुछ सामने चलता- फिरता था, जैसे कि जंजीर से जकड़ी पुस्तक वस्तुतः पुस्तक थी, स्याह साया जीती- जागती लड़की थी, नेरुदा की कविता की भाषा बदल गई थी किन्तु अर्थ नहीं। चित्र में चित्रित विषय केनवास पर उतरते ही वर्तमान से भूत की ओर खिसक जाता है, लेकिन यहाँ अधिकतर आँखों के सामने घटित हो रहा था। ऐसे में उसे मैं चित्र कैसे मान लूँ, क्योंकि इनमें जीवन धड़क रहा था। मेरे लिए अब यही आसान था कि मैं उन सब स्थितियों को सीधे- सीधे कविता मान लूँ—-जीती जागती कविता, शब्द रहित कविता, अभिनीत कविता। इस अंक में उस समस्त भाव विचारों को चित्रों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उम्मीद है कि पाठक स्वयं बताएंगे कि यह कविता है या नहीं? कविता… प्रतिरोध की कविता!! या फिर कविता में प्रतिरोध!!

 

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना

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