हमारे अग्रज
तिरुकुरल
दो हजार पुराने तिरुकुरल, दक्षिण भारत का वेद है। जिन्दगी को ना नकारते हुए, मानवियता को जीने की कला, इन कुरलों में निहित है। सप्त समुद्रों का ज्ञान आहित है , इन कुरलों में।
तिरुकुरल, किसी जानि या वर्ह का ज्ञान नहीं , बल्कि मानवियत का ज्ञान है।
अनुवादक
त.शि. क. कण्णन
भयकारी कर्म करे, करे प्रजा को त्रस्त
निश्चय जल्दी क्रूर वह, हो जावेगा त्रस्त। 563
बिना टले निज धर्म से, जो हो संयमशील।
पर्वत से भी उच्चतर होगा उसका डील।। 124
ओछो से डरना सदा, उत्तम जन की बान।
गले लगाना बन्ढ़ु सम, है ओचों की बान।।
अल्प दुष्कर्म करते जो, गिरिसम क्यों ना
ऊँचे, होते हैं बदनाम।। 97
निर्मल चरित्रवान की मैत्री लेना जोड़
दाता हो चाहे अयोग्य, मैत्री देना छोड़।। 80
बाहर बैठा हो अतिथि, भीतर बैठे आप
देवामृत सम क्यों ना हो, भोजन करना पाप।। 82
जिस तपी को प्राप्त , तप की महान शक्ति
यम वह विजयी वह, जान ले तू।। 269
राजा को भाला नहीं देता है विजय
राजदण्ड दे विजय, यदि उसमें हो सीध।। 546
मित्र बने जो गणन कर, स्वार्थ लाभ का मान
धन गाहक गणिका तथा चोर एक सा जान।।813