समकालीन कविता

श्याम सुधाकर (मलयालम)

 

अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद – ब्रजेश सिंह

 

मकड़ी का सुसाइड नोट

 

आज सुबह ही
मुझे इस बारे में पता चला
कि हम मकड़ियों के परिवार नहीं होते।

 

सहवास के दौरान,
मात्र मेरी प्यास बुझाने के लिए
अपने नेत्र और त्वचा छोड़कर,
तुम स्वयं को पीस लोगे।

 

हमारे बच्चों और मेरी स्वयं की सेहत के लिए —
तुम्हारे द्वारा भोजन के लिए
बनाए गए जाले के मिटने से पहले ही

मैं उन्हें बाहर निकाल दूँगी,
रोते और तड़पते;
अपने पिता को खोजते हुए,
उनकी आठों टांगें
टिकी होंगी मेरे सीने पर।
उनके छोटे-छोटे दांत
हमें अलग कर रहे होंगे।

 

चूंकि मैं ऐसा कुछ नहीं चाहती,
तो मुझे यह करने दो।

मेरे लिए
तुम्हें जीना चाहिए।
मेरे लिए
तुम्हें पिता नहीं बनना चाहिए।

 

 

मुहर

 

गांधी की मूर्ति ने

यीशु की प्रतिमा को पाँच रुपये लगा

एक लिफाफा प्रेषित किया :

“यदि तुमने क्रूस उठाकर

अपने सभी पापों का  

प्रायश्चित कर लिया है,

तो दो चोरों के बीच

धूप में मत म्लान हो ।

चर्च छोड़ो

और यहाँ आ जाओ;

मेरे लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे।”

यीशु ने उत्तर दिया:

“तुम्हारे लिए धूप कोई समस्या नहीं है,

क्योंकि तुम्हारा दिमाग शांत है;

दंगाई तुम पर हमला नहीं करेंगे,

क्योंकि तुम्हारे पास लाठी है।

तुम सुरक्षित हो।

मैं निहत्था हूँ।

अगर मैं बाहर आया,

तो तुम्हारे लोग मुझ पर हमला करेंगे।”

पोस्टमैन

जिसने पत्रों से टिकटें चुराईं

‘डाक टिकट अपर्याप्त’  की मुहर लगा दी

दो युगों के बीच के पत्राचार पर।

 

नगर में बिल्ली

 

आख़िर
कितना समय लगेगा
मेरे मन के नगर की
बिल्ली को बड़ा होने में?

 

भले ही बिल्ली
स्वयं को कहीं छिपा ले,
वो हमेशा दिखाई देती है।
नगर में
हॉर्न उसके कानों में बजते हैं,
धूल उसके नथुनों में जम जाती है,
उसे हर रोज़ फिर वही खाना मिलता है।

 

वह सुनती है
वही पुराने नारे,
समानता को लेकर वही पुरानी चिंताएं।

 

वह देखती है
प्रतिरोध के वही टेम्पलेट,
थकित झरने,
नावें और पॉपकॉर्न फुरसत के पलों में।

 

ज्यों ही वो चिड़ियाघर की तरफ सड़क पार करती है,
एक ज़ेब्रा अपने खुर खींचता है,
अपनी पूंछ हिलाता है।
जब नजदीक एक कार उलटती है,
उसे बार-बार गिलहरी की चिचियाहट सुनाई देती है।
दूर! एक टैंकर लॉरी चिंघाड़ती है।
अंधकार में
एक जंगली घोड़ा उससे टकराया है—
अश्वनालों की तीखी टापें!
कहीं कोई दहाड़
रात से उलझ गयी है।

 

मेरे मन के नगर की बिल्ली
बड़ी और बड़ी होती जा रही है,
उसकी पूंछ लंबी और लंबी हो रही है,
चमकते दन्त-नख और नुकीले हो रहे हैं,
जिव्हा मांस और हड्डी के हर टुकड़े का स्वाद ले रही है
उसका वजूद हर मार्ग पर सरपट दौड़ रहा है,
हर छत पर कब्ज़ा कर रहा है—
झुलसाती गर्मी में शीत जैसी,
किटकिटाती ठंड में गर्माहट भरे अहसास सी
अनसुने पदचाप सी,
फरफराती मूंछ,
अनजानी भाषा के सपनों की मुसाफिर
परछाइयों में से सहज रूपांतरित हो
मेरे पूरे शहर को खौफज़दा करती है।

 

अजन्मी विडालवंशिनी के
दो नुकीले कान
इन दिनों मुझे डराते हैं;
मेरी पीड़ा को नोंच रही है
वो दिन-ब-दिन तेज़ी से बड़ी हो रही है।
मेरे हृदय की दीवारों को
अपने पंजों से खरोंच रही है,
आठ नाखून भीतर धँस जाते हैं।

 

विनती

 

इरादतन लौटना भूले,
डूबते हुए नाविक ने
एक इंद्रधनुष तोड़ा,
और उसे रख दिया पानी में सीधा
और विनती की एक चप्पू के लिए
तबाह हुए जहाज के
गुमनाम कप्तान से।

 

 

कवि

श्याम सुधाकर मलयालम भाषा के युवा कवि हैं। केरल के पलक्कड़ में जन्मे श्याम अपनी मातृभाषा मलयालम और अंग्रेजी में लिखते हैं। उनकी रचनाओं का अनुवाद चीनी, हिब्रू, फ्रेंच, तमिल और बंगाली सहित कई वैश्विक भाषाओं में हुआ है। आपकी प्रमुख कृतियाँ ईरपम, अवसानते कोल्लीमीन और कादलिनते कावलक्करन (मलयालम), ड्रेंच्ड बाय द सन (Drenched by the Sun (English)), मद्रास विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में पी.एच.डी. प्राप्त डॉ. सुधाकर वर्तमान में सेंट थॉमस कॉलेज, त्रिशूर (केरल) में अध्यापन कर रहे हैं।

 

अनुवादक
बृजेश सिंह द्विभाषी कवि, अनुवादक तथा काव्य-संग्रह ‘अपने-अपने कैनवास’ के रचयिता हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि प्रबंधन (Law Management) में स्नातकोत्तर सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं। ‘कृत्या (Kritya) की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।

 

शैलेन्द्र चौहान

 

स्क्रीन संवाद

 

आजकल लोग

न मिलते हैं, न हालचाल लेते हैं

जैसे रिश्ते

किसी पुराने कैलेंडर की तारीख़ हों

जिन पर पेन चलाना छूट गया हो

फोन पड़े रहते हैं

फुल बैटरी के साथ

पर आवाज़ें

लो-पावर मोड में चली गई हैं

घंटी नहीं बजती

सिर्फ़ नोटिफ़िकेशन की चुप्पी

टिमटिमाती है

हाँ..

सोशल मीडिया पर

लोग अति तत्पर हैं

शुभकामनाओं की वर्षा

बधाइयों की आतिशबाज़ी

“शीघ्र स्वस्थ हों”

तीन इमोजी और एक फ़ॉरवर्डेड वाक्य में

पूरा कर दिया जाता है

सामाजिक उत्तरदायित्व

उँगलियाँ तेज़ हैं

भाव सुस्त

संदेश तुरंत पहुँचते हैं

पर मन

कभी रास्ते में ही उतर जाता है

मैं अपने बारे में

जो चाहूँ बता सकता हूँ

क्योंकि कोई सुनने वाला

बीच में टोकता नहीं

कोई पूछता नहीं

“वाक़ई तबियत कैसी है?”

शब्द अपने आप

पंक्तियों में आ खड़े होते हैं

वाक्य बिना बुलाए

मेरी तरफ़दारी करने लगते हैं

अॉपरेटिंग सिस्टम सुनियोजित है

अब संवाद

आत्मकथ्य हो गया है

और संबंध

एकतरफ़ा प्रसारण

इस दौर में स्क्रीन पर उंगलियों से बोलना

जीवंत होने का प्रमाण है

 

 

जीवन से बाहर का कौतुक

 

जन्मदिन से अलग होता है जीवन

जहाँ केक नहीं कटते

केवल समय की खट्टी कड़वी फाँकें

चुपचाप गले से उतरती हैं

अल्प मुस्कानें

चेहरे पर टाँकी जाती हैं क्षण भर

रंग सजाए जाते हैं

ताकि थकान

नज़र न आए

तालियाँ

क्षणिक शोर हैं

उल्लास हल्की परत

अगले दिन

फिर अपनी जेब में

खाली लौट आते हैं भुरभुरे शब्द

क्षणिक कौतुक हैं

जैसे सड़क किनारे

रंगीन खिलौनों की दुकान

जो चमकती है

पर किसी की ज़रूरत नहीं बनती

बाक़ी सब

नितांत ऊबड़खाबड़ है

दिनों की टूटी पगडंडी

रातों का अनमना अँधेरा,व

और सुबह

जो फिर उठने को कहती है

बिना किसी सहारे के

यह जीवन

तारीख़ है

मोमबत्तियाँ जलाने की

चलते रहने की ज़िद है,

और थककर भी

रुक न पाने की आदत

 

गरीबों का कैसा जन्मदिन

 

जन्मदिन के आसपास

हर साल इसी तारीख़ के पास

कुछ टूटता है

कोई फ्रेम नहीं

बस भ्रम

बातें अचानक कर्कश हो जाती हैं

लकड़ी में

बर्फ सी ठंडक उतर आती है

जो साल भर चुप थे

आज अहीकार से चुभते हैं

मेरी कोई इच्छा या ख्वाहिश नहीं

फिर भी इस बस्ती में

उपेक्षा बाँटी जाती है

तोहफ़े की तरह

भला हो दानवीरों का

जन्मदिन

उत्सव नहीं,

एक अदृश्य अदालत है

जहाँ गवाह यादें होती हैं

और फैसला

मेरे ख़िलाफ़ सुनाया जाता है

मैं लुटा-पिटा नहीं,

बस देर से समझा हूँ

कि कुछ लोग

मेरे जीवन में

सिर्फ़ तारीख़ जानते हैं

मुझे नहीं

और फिर भी

मैं अगला साल उठाकर चलता हूँ

इस उम्मीद में नहीं

कि कोई रुकेगा

इस हठ से

कि मैं बचा रहूँ

 

उम्र के बदहवास पड़ाव पर

 

बीत नहीं रहा

घिसट रहा है जीवन

जैसे किसी ज़ंग लगी रेल पर

फँसा डिब्बा

जिसकी खिड़कियों से

दृश्य नहीं

सिर्फ़ बीते मौसमों की धूल

अंदर गिरती है

रिसता हुआ समय

सुबह की ओस

रात की थकान को

धो नहीं पाती

बस हड्डियों तक

ठंडा कर देती है

दिन ढलता है

हर रोज़

किसी बुझते दीपक की

अंतिम काँपती लौ की तरह

जो न हवा से डरती है

न तेल की प्रतीक्षा करती है

बस

अपने ही धुएँ में

धीरे-धीरे

काली हो जाती है

बीत गया और एक वर्ष

मुरझाए फूल

झरते पात

घर की दीवारों में उगी

सीलन की नसें

सब मिलकर

चेहरे पर

समय की कठोर लिपि

उकेरते हैं

दुश्मनी निभाती है

हर शै

ये झुर्रियाँ नहीं

ये वे वाक्य हैं

जो कभी कहे नहीं गए

अधूरे, दबे हुए

कंठ में अटके

शब्द

जो अब

मेरी त्वचा

पढ़ रही है

आईना अंधा नहीं होता

हर सुबह

उसकी आँखें खुली होती हैं

वह

देखने की ज़िम्मेदारी

मुझ पर छोड़ देता है

और खुद

चुप्पी ओढ़ लेता है

उम्र चढ़ती जाती है

किसी अदृश्य सीढ़ी पर

जिसके पायदान

गिने नहीं जाते

वे

टूटते हैं

हर साँस के साथ,

नीचे

अंधेरा

और गाढ़ा होता जाता है

यह सीढ़ी नहीं

बल्कि गिरने की

धीमी

सहज प्रक्रिया है

जिसमें शरीर

पहले थकता है

फिर स्मृति,

और अंत में

आवाज़

स्मृतियाँ अब

नहीं रहीं ताज़ा

वे धूप में पड़े

पुराने काग़ज़ हैं

जिन पर लिखे नाम

धुँधला गए हैं,

और ज़रा-सी हवा

उन्हें

चरमराकर

बिखेर देना चाहती है

भीतर कहीं

अब भी

एक मद्धम स्पंदन है

जैसे

बहुत गहरे दबा

कोई रोता हुआ प्रश्न

वह पूछता नहीं

सिर्फ़

धड़कता है

साँसों के जाल में

अब भी

फँसी है

एक अधूरी चाह

जैसे मकड़ी के जाले में

फड़फड़ाता

एक कीड़ा

जिसे पता है

उड़ान अब

संभव नहीं

शाम उतरती है

धीरे-धीरे

मेरे भीतर

और मैं

दिन को विदा करते हुए

खुद से कहता हूँ

अभी पूरी तरह

टूटना

बाक़ी है

 

शैलेंद्र चौहान

 


कविता संग्रह:’नौ रुपये बीस पैसे के लिए’,’श्वेतपत्र’ दो दशकों के अंतराल के बाद ’और कितने प्रकाश वर्ष’(श्वेतपत्र,पुनर्प्रकाशित) ’ईश्वर की चौखट पर’ ‘सीने में फाँस की तरह’,
चयनित कविताएं, कहानी संग्रह:’नहीं यह कोई कहानी नहीं’ ,’गंगा से कावेरी’ कथा रिपोर्ताज:
‘पांव जमीन पर’ 2010 में, बोधि प्रकाशन, जयपुर।
आलोचना पुस्तक:
‘कविता का जनपक्ष’ 2020 में,
अन्य:
‘भारत का स्वाधीनता संग्राम और क्रांतिकारी’ 2023,
संपादन :
रामकिशोर मेहता का रचना संसार, 2023,
’धरती’ अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका 1979 से प्रकाशित। इसके अनेक विशेषांक चर्चित रहे।
नौकरी के सिलसले में विदिशा के बाद नांदेड़, इलाहबाद, कानपुर, मैनपुरी, मुरादाबाद, कोटा, जयपुर, गाजियाबाद, फरीदाबाद, चंद्रपुर, नागपुर, राजपीपला, बारां, जम्मू और दिल्‍ली में रहे।
संप्रति : जयपुर में निवास। नियमित लेखन एवं स्वतंत्र पत्रकारिता।

संपर्क : 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर – 302033

मो. 7838897877

 

 

IVAN HERCEG (क्रोएशिया)

 

अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद – ब्रजेश सिंह

 

पत्राचार

 

मेरा पत्राचार
ब्रह्मांड से
कहता हूं उससे: ठहरो!
सम्मान करो उन शब्दों का
जिन्होंने तुम्हारा सृजन किया है
पर कोई उत्तर नहीं मिलता।
जो ब्लैक होल हैं
वर्णमाला है अव्यवस्था की
जिससे मैं उसे लुभाता हूं।

 

मेरा संवाद तुमसे
जब प्रेत उधेड़कर मेरी चमड़ी
टांक रहे हैं थिगली थिगली
रात्रि आकाश पर।
उस शामियाने पर
जिसने ढक रखा है
तुम्हारे इस अति मूल्यवान
संसार को।

कितने हिज्जे चाहिए आख़िर
कि धूल भर जाए हमारे अंदर तक
और ज्ञात हो सके कि
कैसे और कहां विलीन हो जाता है
यह जीवन।

 

विस्मृत

 

हर कोई है अपने ही विरुद्ध
हम भूल रहे हैं कि हमें भुला दिया गया है।
भ्रम में हैं। भाषा खुशी-खुशी दफ़न है।
परत-दर-परत, मेटाफर में, शून्यता में।

 

सैलाब अपने चरम पर है। ईश्वर के इंतजार में हैं। कि भूल जाएं।
‘तुम-और-मैं’ की उष्ण गाद में चिनकर।

 

हमें किसी भी चीज़ का भय नहीं है।
स्वतंत्रता एक निस्वाद शून्यता है।
हम एक-दूसरे की स्मृतियाँ खोजते हैं,
मगर हमें कुछ भी याद नहीं रहता।

 

धीरे-धीरे, हम बन रहे हैं, एक निषिद्ध कविता
एक कोस्मिक ग्लू और दसवां आयाम।
और तुम बस, भुला दिए जाना चाहते हो।

 

हम भूल रहे हैं कि हमें भुला दिया गया है।

 

कैनवास

 

तुम दिखावा करती हो यह जानने का
कि ‘एक’ सबसे बड़ा और एकाकी नंबर है,
और तुम हमेशा कहती हो: “मैं उनमें से एक…”
तभी मैं तुम्हारे होठों पर
उंगली रख टोक देता हूँ।

 

मैं भ्रांति में हूँ कि “मैगनोलिया” को जानता हूँ
जो हमेशा अदृश्य सिनेमाघर में चलती रहती है
और इस पागलपन के लिए हमारी तत्परता—
मणिपुर चक्र के दबाव,
हाथों की छोटी उंगलियों में घबराहट से है;
मेरी और तुम्हारी हैं; जो व्यर्थ हैं—
प्रेमियों की कटी हुई जुबानों से कहीं बड़ी,
भ्रम के गंदले कैनवास पर बिखरी है,
जिसके छोर भगवान और शैतान खींच रहे हैं।

 

हम प्रपंच करते हैं कि हम जानते हैं; जीवन क्या है।
अगर हम इसे स्पर्श करें, तो यह
एक पर्दा, एक दीवार, एक मकबरा सा लगता है।
जब सिर्फ इसे देखते हैं, तब यह
एक इंसानी चेहरा, चाम, रक्तमय और नश्वर है ।
जब हम इससे ऊब जाते हैं,
तो हम एक-दूसरे की उंगलियां काट लेते हैं
और परछाइयों का खेल खेलते हैं।
हम छल करते हैं कि हम जानते हैं, कैनवास क्या है।
हम ढोंग करते हैं कि वो ‘एक’ है,
हम ढोंग करते हैं कि हम ‘एक’ हैं।

 

इवान हर्सेग (1970) क्रोएशिया के प्रतिष्ठित कवि, लेखक और संपादक हैं। ज़ाग्रेब विश्वविद्यालय से स्नातक इवान हर्सेग, ज़ाग्रेब के जर्नल ‘पोज़िजा’ (Poezija) के मुख्य संपादक और ‘एसयूआर’ (SUR) कविता महोत्सव के आयोजक हैं। उनके अब तक छह कविता संग्रह और एक लघु कथा संग्रह ‘नेकेड’ (Naked) प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के क्षेत्र में उन्हें ‘गोरान प्राइज़’ और ‘रिकार्ड जोर्गोवानिक’ जैसे कई प्रमुख सम्मानों से नवाज़ा गया है। उनकी रचनाएँ अंग्रेजी, चीनी, स्पेनिश और फ्रेंच सहित दुनिया की अन्य भाषाओं में अनूदित और संकलित की जा चुकी हैं।

 

अनुवादक

बृजेश सिंह द्विभाषी कवि, अनुवादक तथा काव्य-संग्रह ‘अपने-अपने कैनवास’ के रचयिता हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि प्रबंधन (Law Management) में स्नातकोत्तर सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं। ‘कृत्या (Kritya) की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।

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