समकालीन कविता

गोपाल माथुर

 

एक

 

पीड़ा की नीली देह
सौंपती
अपने दुःख
किसी अदेह वनचर को

दीवारों पर से रिसते रहते
पुराने घाव
जैसे किसी खण्डहर के पत्थरों के बीच
बह रहा हो लहू

ति
हा

बन कर

कहाँ से लाऊँ सामर्थ्य
जो बुहार सके
पीड़ा देता कल

 

 

दो

 

उम्र के ढलान पर
शाम की थमी घड़ियों और

रा
रों
के बीच से
झांकतीं स्मृतियाँ

बूढ़ा पेड़
बुनता सन्नाटा

 

सूखी मुँडेर पर
अब
कोई पाखी
नहीं उतरता

 

रीते क्षितिज का प्रकाश
अब बुझा
कि अब बुझा.

 

तीन

 

पता नहीं क्यों
दरवाजा खोला
जब कि किसी ने



टा
या
नहीं था

पता नहीं क्यों
भटकता रहा
सड़कों पर
जबकि कहीं जाना नहीं था

 

पता नहीं क्यों
मन हुआ उदास
जबकि रोया नहीं था

 

पता नहीं क्यों
स्मृतियों के परिन्दे
आ बैठे मुँडेर पर
जबकि दाने डाले नहीं थे

 

कुछ न कुछ
घटता ही रहता है
कभी कहानी सा
तो कभी अकहानी सा

 

चार

 

हवा ठिठकती
पेड़ पर

काँपता



थर थर

 

मृत्यु बटोरती पत्ते
गि
रे
हुए

 

 

पाँच

 

जो गए
लौटे नहीं कभी

 

दरवाजे पर रखी आँख
थक जाती
प्रतीक्षा में

 

बीते दृश्य
उभरते
फांस की तरह

 

टिटहरी गाती
वि


गीत

 

पानी की टंकी
के पीछे छिपा चाँद
निहारता
दुःख
धरती का

 

जग एकाकी
मन एकाकी
शोक मनाता
शोकोत्सव.

 

प्रकाशन – पाँच उपन्यास, तीन कहानी संग्रह, दो नाटकों के हिन्दी अनुवाद तथा एक कविता संग्रह प्रकाशित. अनेक साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन. विभिन्न गोष्ठियों में प्रतिभागिता

 

 

 

 

अजय जिन्दल

 

ये चांद, बादल, सितारे , सब दूर के हैं
मैं नहीं चाहता तुम उन जैसी दिखो
मैं नहीं चाहता कि तुम बनो उन जैसी
जो दूर से ही मेरा हंसना और रोना देखते हो,

 

मैं चाहता हूं कि तुम मेरे घर के गुलाब के
पौधें पर लगे गुलाब कि तरह दिखो
जिसे जब देखूं तो खुश हो जाऊ और
जब उसके पास जाऊ तो उसकी खुशबू
से महक जाऊ मैं भी ,

 

मैं चाहता हूं कि तुम अगर बनो तो मेरे
कमरे कि छत बन जाना, मेरी आंखों से
आंख मिलाकर देखना और बताना कि मैं
हूं यही, ये तूफ़ान , बारिश ,काले बादल
कुछ ही समय के हैं।
मैं चाहता हूं कि तुम बनना चुनो छत और गुलाब
ये चांद सितारे और बादल तो दूर के हैं।।

 

सूरज डूबता है जैसे डूब जाऊंगा एक दिन
नहीं निकलूंगा फ़िर कभी पूर्व का दरवाज़ा
खोल कर , एक अंधियारी रात जैसे कमरे में
बंद कर लूंगा खुद को , कुछ पड़ी किताबों को
तारों कि तरह देखता रहूंगा, उन तारों कि बीच
ही तुम्हारी चांद जैसी तस्वीर को भी रख लूंगा
शोर होगा अजनबी बादलों का पर खुद को
मैं दूर रखूंगा, एक रुकी घड़ी तरह रोक
लूंगा वक़्त को एक दिन सूरज कि
तरह डूबा लूंगा खुद को।।

 

धूप बचा के रखता हूं अपने हिस्से कि
जब छांव ज्यादा हो जाती हैं तो
आगे कर देता हूं धूप को
जब बारिश ज़्यादा होने लगती हैं
तो निकाल लेता हूं छाता धूप का
कभी कभी जलाती हैं मुझे भी ये
धूप पर सहन कर लेता हूं क्योंकि
मैंने ही रखी थी मेरे हिस्से कि।।

 

जब इस दुनियां को छोड़ दूं मैं
तुम फूलों से सजी गाड़ी में मुझे
शमशान घाट तक ले जाना
याद रखना सभी फूल खिले
और ताज़ा हो मुर्झाया तो मैं पड़ा
ही रहूंगा , साथ ना ले जाना उन
फूल को उनको भी मेरे साथ ही
जलाना, तुम्हारी पसंद के ही लाना
मेरी सारी पसंद और ख्वाहिशें जल
रही होंगी मेरे साथ , कांटो को अलग
ना करना उन्हें मेरी खामियों के साथ
ही जलाना ,
मैं जब जाऊ इस दुनियां को छोड़ कर
तुम फूलों से सजी गाड़ी में मुझे ले जाना।।।

 

झुंझनू , राजस्थान में रहने वाले बाइस वर्षीय विद्यार्थी

 

 

 

 

 

 

भूपेन्द्र बिष्ट

 

बुरा साया

 

बचपन में कई बार मुझे ‘छल’ लगा

आमतौर पर जिसे कहते हैं बुरी हवा का लग जाना

 

मैंने किसी सयाने को मां से कहते सुना

गधेरे के मसान का भूत बैठ गया है मेरे भीतर

रात भर मुझे पलासा गया

बुदबुदाते हुए कुछ मंत्रों के साथ

खूब पत्तियों भरी हरी शाखों से

भिनसार में उसी से पीटा गया मेरा शरीर

 

खुल ही रही थी दिशाएं

अभी पौ फटने के साथ

पड़ोस के दूसरे गांव से बुलाया गया था जो डंगरिया*

वह भी पहुंच गया

 

देखते ही मुझे

एकदम चीखा वह फिर चिल्लाया बड़ी जोर से

एक थाली और दो सकोरे निकाल झोले से फेंके उसने

बड़बड़ाया अरे ये आत्मा पहचान ली मैंने

 

घर में हर संक्रांति पर जागर* लगता रहा

गांव में अलग से बैस* लगती रही

पूस में भी और जेठ में भी

चावल भी छितराये जाते रहे खूब

भभूत भी उड़ाई जाती रही अथाह

इसी में मेरा बचपन गुजर गया

 

अब जाने कहां चली गई वह हवा, वह काली आत्मा

जिसने भूख मार दी थी

और ख़त्म कर दी थी उनकी प्यास भी

जो मुझे करते रहे उतना प्यार

 

मैं करता हूं जिन्हें इतना प्यार

आज उनको कुछ प्रकट छल

और कई साक्षात् बुरी आत्माएं

परेशान कर रही हैं ऑफिस में कारखाने में

रास्ते में बाजारों में

 

सोचता हूं इन आतताईयों को किस सब्ज़ शाख से

झाड़ा जाय कि मेरे बालकों को

कम से कम एक रात तो सिवैन* पड़ सके।

 

* कुल देवता की पूजा में देव रूप के अवतारी * इष्ट के आवाह्न हेतु पूजन, * 22 दिन तक चलने वाली पूजा, * बेचैनी से राहत।

 

कलाकार है ईश्वर

 

ईश्वर इतना कलाकार है कि उसकी कला के चलते

साल में तीन तरह से हंसते हैं पहाड़

 

नदियां अपने साफ़-शफ़्फाफ़ पानी की कहानी को

गाती हुई बताते बताते आखिर में

नीले रंग का समुंद्र बन जाती हैं

वही करता है यह सब

 

हर मौसम में खिलाए रखता है वह फूल

पहाड़ों पर बर्फीले दिनों में भी दूब, पयां की हरी पत्तियां

ताकि सौभाग्यवती स्त्रियां अर्पित करती रहें उसे

पूजा अर्चना में नैवेद्य से पहले

 

इस वसुधा पर किसी से कोई प्रेम करने लगे

तो ईश्वर अर्गलाओं को कर देता है मुक्त

वर्जनाओं को कुछ शिथिल भी उनके लिए

एक सीमा तक ग्राह्य भी बना देता है वह

प्रेमियों के ऐसे दुस्साहस को

 

उसकी इस कला पर हम मुग्ध हैं

आओ! यही बताने चलें उसे

ठंडे और सांद्र वनों के बीच से होकर हमें

तमाम वीथिकाएं हिम किरीट तक ले जाएंगी

 

पुरखे जो मंदिरों के समीप बांज वृक्षों की शाखों पर

घंटियां बांध गए हैं, उन्हें बजाएंगे हम

इन घंटियों की भाषा समझता है वह

इतना कलाकार है ईश्वर।

 

 

इतिहास क्या है ?

 

कोलंबस जिस जहाज से गया था

नई दुनिया की खोज को

उसका चित्र है इतिहास

 

कोई भीमकाय चिड़िया

जो अब नहीं पाई जाती

उसके मांसल डैने और पंख

उड़ने के बजाए काम आते रहे

रेत का बगूला झेल पाने के

या महीनों होते रहने वाली बारिश के प्रतिकार में बखूबी

 

अब अजायबघर में महफूज़ हैं

एक शीशे के मर्तबान में

तवारीखी इबारत की चिट लगाकर

उस पंख और सन्नद्ध फर को भी कह दिया गया है

इतिहास

 

इस किस्म की आद्यता

या ऐसी क़दामत वाली शब्दकोशों में की गई व्याख्या

पर्याप्त नहीं है प्राक्काल को समझने के लिए

 

कुछ चीज़ें इतिहास के जमाने से

आज तक मिल रही हैं हमें

अलबत्ता रंग कुछ उड़ गया हो उनका

या खुश्बू जाती रही हो उनकी

पर दस्तयाब तो हैं न ?

मसलन, ऐतिहासिक फल शरीफा

 

इसी प्रकार प्रेम भी है

जो हो जाता है तो फिर मनुज मन

इसे करते ही जाता है

 

इस दौरान प्रिय के हाथों का कोई अर्जित सुखद स्पर्श

अपने गयेपन के बावजूद

उस भली प्रतीति के बखान को लिए लिए

फूटता ही जाता है

कविता-कहानी की प्राचीनतम खिड़कियों से बाहर

किसी उजाले की मानिंद

 

इस तरह दशकों और शताब्दियों के कालखंड वाले

अंधेरे को लांघती वह पुराकथा

पढ़ने पर लगती है आज भी ताज़ा।

 

हिमनदों की कामना

 

हिमनदों की कामना रही कि हमारी नींव की परतों पर

बर्फ अधिकाधिक संघनित होती रहे

हमसे जुड़ी बर्फीली चट्टानें स्थिरप्रज्ञ बनी रहें

और ऊर्ध्वमुखी ऊँचाइयाँ छूती जाएं

 

चमकने को वे भले सूरज से रश्मियाँ ले लें

पर ऊष्मा न लें जरा भी

ताकि बर्फीले ध्रुवों के एस्किमो यहां भी

आकर बना लें अपने लिए इग्लू

 

नदियों ने चाहा हम बनी रहें सदानीरा

और बारिशों में हमारे पाट

धरती की गोद को दूर-दूर तक भिगो दें

चाँदनी रातों में हमारे प्रवाह में जलपरियाँ किल्लोल करें

 

लेकिन हिमनदों और नदियों के मन की बातें

अब कोई नहीं सुनता

गूंजती हैं बस ग्लोबल वार्मिंग की चर्चाएँ

और प्रकट होते हैं विकास के नाम पर हौलनाक मंसूबे

 

दुर्गम घाटियों में खड़ी, अडिग पाषाण शिलाओं पर

बगैर इच्छा के पनपता कुटज

चुपचाप देख रहा है यह उलटबांसी

बसंत हो या ग्रीष्म और हेमंत हो या शिशिर।

 

 

 

भूपेन्द्र बिष्ट :अल्मोड़ा ( उत्तराखंड ) उच्च शिक्षा. बैचलर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री, “स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता में अभिव्यक्त जीवन मूल्य” विषय पर पी-एच. डी.

धर्मयुग, दिनमान, रविवार, साप्ताहिक हिंदुस्तान, पराग, कादम्बिनी, सरिता, इंडिया टुडे, जनसत्ता सबरंग, जनसत्ता वार्षिकी, हंस, वागर्थ, बया, कथादेश, पाखी, अहा! जिंदगी, वर्तमान साहित्य, व्यंग्य यात्रा, पहल, उत्कर्ष, कृति बहुमत, अन्विति, समकालीन तीसरी दुनिया, दशकारंभ, पुनश्च:, संवेद, लमही, शब्द सत्ता तथा उत्तरा व पहाड़ आदि पत्रिकाओं समेत विविध अखबारों में रचनाएं प्रकाशित.

“गोठ में बाघ” ( अंतिका प्रकाशन ) प्रकाशित.

उ. प्र. सरकार में यू पी शुगर केन सर्विस (प्रथम श्रेणी) से निवृत.

1 Comment

  • अनवर सुहैल
    January 1, 2026

    हमारे समय की ज़रूरी कवितायेँ. कृत्या की खोज. इन कवियों का नव वर्ष में स्वागत

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