कवि अग्रज

चण्डीदास

चण्डीदास बंगाल की अप्रतिम भक्त कवि परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे जयदेव के समकक्ष लोक मन में काव्य प्रेम को जागृत करने में समर्थ थे। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दियों में बंगला साहित्य का पाठन मात्र विद्वानों में प्रचलित था; सामान्य जन गीति काव्यों, संगीत और स्वांग द्वारा काव्य रस का आनंद ले पाते थे। ऐसे समय में भक्त कवियों के गीत जन सामान्य के लिए काव्य विनोद का सक्षम माध्यम थे। चण्डीदास मूलतया दरबारी कवि थे, जिन्होंने अपने गीतों में प्रेम और भक्ति का सुंदर समावेश किया। चण्डीदास के कुछ गीतों के अनुवाद इस तरह हैं। (साहित्य अकादमी द्वारा ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ कड़ी में सुकुमार सेन द्वारा रचित पुस्तिका से, साभार)

1‍

मेरी सखियों श्याम का नाम मुझे किसने बताया?
कानों में पड़ते ही इसने मेरा हृदय चीर दिया; मैं
अशांत हो उठी हूँ?

 

फिर भी नाम का माधुर्य अनन्त लगता है और
मेरी जिह्वा इसकी रट लगाए रहती है।
जैसे उसका उच्चारण करती हूँ अपने पर से निमन्त्रण खो
बैठती हूँ।

 

मैं उससे कैसे मिलूँ मेरी सखि?
जब उसके नाम से इतनी शक्ति है, मैं अचरज में पड़ जाती हूँ।
उसके साथ शरीर सम्बन्ध में क्या होगा?
उसे देखकर उसके पड़ोस की लड़किया कैसे रोक पाती अपने को?

 

मैं जितना भी यत्न करूं, उसे भूल नहीं पाती
दूर करने को स्मृति क्या करूँ?
द्विज चण्डीदास कहते हैं, स्त्रियाँ अपने पति को छोड़
चली जाती हैं उसके पास।

2

तुम महान जादूगर हो मेरे प्रिय
एक असहाय लड़की का हृदय चुराने में तुम्हारे जैसा कोई नहीं।
मेरा घर अब घर नहीं रहा, मेरा घर घर से दूर हो गया है।
एक परदेशी अब मेरा अपना हो गया है, और मेरे अपने लोग पराये
हो गए हैं।

 

रात मेरे लिए दिन हो गइ है और दिन रात।
फिर भी, प्रियतम, मै तुम्हे समझने में असफल रही हूँ।
मुझे, एक दिशाहीन काई के टुकड़े को दुर्भाग्य ने पैदा किया
कोई नहीं है जो मुजे निकट बुलाता और कुछ सहानुभूति के शब्द सुनाता।

 

मेरे प्रिय, यदि तुम उत्पीड़ित ही करते रहना चाहते हो
तो मेरे सामने आकर बता दो, मैं अपने आप को जला डालूंगी?
बासुलि के निर्देश से, चण्डीदास कहते है
दूसरों के लिए क्या अपने लोग पराये हो सकते हैं?

3

यह अँधेरी रात। ऊपर बादल उमड़ आए हैं।
वह बाहर कैसे जा सका?
मेरा प्रेमी वहाँ बरसते बादलों के नीचे प्रतीक्षा रत है
देखकर मुझे कष्ट होता है।
मेरे प्रति मेरे प्रेमी का अनुराग अदम्य है
हर प्रकार का कलंक वह अपने ऊपर ले सकता है, और
प्राण दे सकता है।
मैं स्वतंत्न नहीं हूँ, घर में भाई बन्धु के डर से मैं
समय से बाहर न जा सकी

 

हाय! मैंने जो समय दिया था उसने उसे बहुत दुख दिया।

क्या तु, मेरे बारे में सोचकर अब तक का कष्ट भूल जाओगे?

चण्डीदास कहते है, मेरे प्रेमी के अनुराग से
हम दोनों का जीवन संकट में पड़ गया है.

Post a Comment