कविता के बारे में

पवन पटेल

 

1.

मेरी बेटियों तुम्हारी शाश्वत नियति है

 

तुम पे नोंच खसोट के निशान

नहीं हैं सीमित

मात्र बच्चेदानी से उपजी

सभ्यता नाम की कायनात पर

 

लम्पट सरमायादारी के कैनवास रचते हैं

तुम्हारी नियति का अट्टहास

एक बंधक राष्ट्र की आत्मा पर

रोज ब रोज की दर से

अपने स्वजन के हाथों ही

कुछ ही हजार में बिक जाने की नियति

जीबी रोड़ की खांसती मनहूस गलियां

एचआईबी कोठे

रही हैं शरणस्थली तुम्हारी

सदियों से

ओ तीन पांच सिरपेंचधारी जंगबहादुरों !

अपनी बेटियों का शेखों के हरम में

हुए ‘कन्यादान’ पर

चुप क्यूँ हो ?

नहीं, नहीं

क्या उम्मीद हो

जब चुप्पी दर चुप्पी पसरी हो

बच्चियों, बेटियों, बहनों, माओं के ‘कन्यादानों’ पर

वो भी थोक के भाव

राष्ट्रीय पैमाने पर

हिन्दुस्थान में जन्मे

प्रचंड पाखंडी माया से उपजी

संविधान सभा में सालों से जारी

महामृत्युंजय जाप का

यही है, नारकीय सत्य

जिसकी है फ़सल

शेखों के हरम में घुटती मूक वेदनायें

शेखों के हरम

जी बी रोड़, सोनागाछी

तब तक मेरी बेटियों

तुम्हारी शाश्वत नियति है

मुक्ति की लहरें

जब तक पछाड़ खाकर भी

फिर से अपने रुदन में

सदियों का जमा लाल लावा लाकर

राख नहीं कर देती

इस नरक को.

 

(10 सितम्बर, 2015; एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी में प्रकाशित)

 

+++

 

2.

 

प्रचण्ड माया

 

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

अवसर की दुधारी तलवार से

वार करती चौतरफ़ा

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

कभी जला रोल्पाली आग

करती भस्म शाही लंका

बनाने एक नयी लंका

राम के संरक्षण में

बन लंकाधीश

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

भोगने लंका की माया

ले अगल बगल हनुमानों की टोली

रामनामी दिव्य किरणों से सुशोभित

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

कभी ले आग दोआब के उर्वर मैदानों से

भारदारों के बूटों तले घुटती मूक वेदनाओं से सिंचित

सदियों के लहू पसीने से निर्मित

ध्वस्त करने लंका में बसे

गोर्खाली उपनिवेश को

बनकर राम का सच्चा बिभीषण

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

करती दो नावों की सवारी

प्रायः दक्षिण की

कभी कभार उत्तर की भी

इतिहास से सीख ले

अवसर के मुताबिक

जनता के नाम पर

जंगे माया बनती है प्रचण्ड

बजाती राष्टवाद का डंका

करती तब्दील राम की लंका को

इक्कीसवीं सदी के लैंडूपों[3] की लंका में

पैदा करते जाने

अवसर के होली संस्करण

सजाकर दीप चीनी मिट्टी में

कर अर्पित सुर्ख फूल कमल के

जन-गण-मन बिरोधी फूल

मनाने दीपा-ओली रक्तरंजित

ॐ संसार के मजदूर एक हौंओं !

ॐ हाम्रो राजा प्राणभन्दा प्यारो !!

जनता के नाम पर

जंगे माया जरुर बनती है प्रचण्ड

पर जंगे माया करती रही थी

एक नाव की सवारी मात्र

बनकर अंग्रेजों का बहादुर कुत्ता

प्रचण्ड माया करती है

दो नावों की सवारी एक साथ

करने पैदा बहादुर कुत्तों की शेर नस्लें

क्यूंकि प्रचण्ड माया न तो

पूर्णतया बुर्जुवा बन पायी है

और न ही कम्युनिस्ट

प्रचण्ड माया मात्र जन्माती हैं

पराधीन कौमें.

 

(5 मई, 2016; एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी में प्रकाशित)

+++

 

3.

 

कोत पर्व

 

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो बोई थी जंगे ने

बहा रक्त की बौछार

बनकर बेलायती बाबू

करके सात समन्दर काबू

कहलाकर लमजुंग का राजकुमार बेकाबू

करके श्री पांच का जादू स्वाहा

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो काटी थी जंगे ने

बना बहादुरों की फ़ौज

बजा डंका संसार भर

वीर गोर्खाली विजय न जाए खाली !

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो पैदा करती रही थी

बहादुर कुत्तों की नस्लें

एक से बढ़कर एक महेन्द्रीय नस्लें

बिछाकर पंचायत का जाल संजाल

बनकर प्रधान पञ्च

सुलटाने हर मसला

प्रजातंत्र से लेकर गरीब राष्ट्र की तरक्की का गरीब घपला

कर आयोजित माओनुमा सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

बना विकास के महेंद्र राजमार्ग

ब्रह्मा के मुख से झरे आर्यावर्त में

दौड़ाकर अवसर की पूँजीवादी, साम्यवादी गाड़ियाँ

फ़रमाकर नेपालमा साम्यवाद मोटर चढेर आउंछ !

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो पुनरुत्पादित करती रही

वैदेशिक अनुदान के महेंद्र पथ

चले जिस पर बीरेंद्र रथ

जप कर शान्ति की माला

बनाकर मुल्क को पंचशील की पाठशाला

पंचायत को हिन्दू राज की गौशाला

पीट कर जनमानस के असंतोष का दीवाला

मिलाकर जनमत संग्रह में नए चेहरों का मसाला

ॐ श्री पांच हवामहे हमें कुर्सी दिला दो !

 

हमारी डूबी नैय्या पार लगा दो !!

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो हाइब्रिड बन कर पली

प्रजातंत्र के गलियारों में

नेहरु के समाजवादी बलिहारों में

धनाद्दय साहूकारों की जेबों में

बीपी की बेल शाखाएं

अल्पजीवी हो यह धीरे धीरे जमी

दिल्ली के रथ पर हो सवार

 

ॐ नेहरु समाजवाद जिंदाबाद !

ॐ 2007 साल क्रान्ति स्वाहा !!

 

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो पीकिंग से उपजे

माओ से गरजे

चारु की झापाली संतानों से सुलझे

ब्रह्मा के मुख से निकली जनेऊधारी गांठों में उलझे

बहुदलीय जनवाद के सांचों में सजे

पीकर छककर सोमरस

हो सवार कॉमरेड सिंहदरबार की पीठ पर

यह कोत पर्व की फसल थी

जो उभरी थी पहाड़ से

फैलती मैदान में

झंकृत करती सारा संसार

पिलाने जन संघर्षों के वैश्विक रेगिस्तान में

पानी की एक घूँट

यह कोत पर्व की ही फसल थी

जो शिकार हो गयी

ब्यास मुनियों के नियोग से रचित

महाभारत से सृजित

पुनरुत्पादित कर इतिहास के जंगी बीज

पैदा कर मायावी प्रचंड जंगबहादुर

ॐ जनयुद्ध जिंदाबाद !

ॐ माओवाद जिंदाबाद !!

ॐ प्रचंड पथ जिंदाबाद !!!

हमें दिल्ली की गुर्खाली सत्ता दिला दो

कोत पर्व की फसल तो

बोई गयी थी इतिहास में सिर्फ़ एक बार

पर काटी गयी बार बार

अब तो बस नई सदी के नए कोत पर्व की दरकार है

जंगी कोत पर्वों से इनकार है

आभासी शत्रुओं का नकार है

रक्त की हुँकार है

जनता के दुश्मनों की हाहाकार है.

(11 मई, 2016; एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी में प्रकाशित)

+++

 

4.

 

 

खुकुरी

 

जैसा कि सामान्य ज्ञान बताता है

खुकुरी एक चाकू का नाम नहीं

बहादुर गुर्खा की कमर से लटका

धारदार नुकीला चाकू ही नहीं

वरन, एक इतिहास का नाम है

 

खुकुरी का इतिहास उतना ही पुराना है

जितना कि आदिम जन का

प्रकृति से लड़कर आग जलाकर

जो निकला था भूख की खोज में

तोड़कर पहाड़, खोज लौह प्रस्तर

बना उसे एक औजार

दे सके जो उसे भूख से लड़ने का जज्बा

और इस तरह खुकुरी का अविष्कार हुआ

 

खुकुरी का इतिहास उतना ही पुराना है

जितना कि आदिम जन का

जो जन्मा था हिमालय की बर्फीली वादियों में

लड़ने हिमाच्छादित कंदराओं से

जला पिघला लौह प्रस्तर को

बदलने एक हथियार में

भरने उसमे प्रचंड ताप

सो लड़ सके वह

हिमालय की हाड़ जमा देने वाली ठण्ड से

 

खुकुरी का इतिहास उतना ही पुराना है

जितना कि आदिम जन का

वह आदिम जन कोई और नहीं

नेपाली जन था

जो कर खुकुरी का आविष्कार

बना बहादुर

कहलाकर वीर गोर्खाली

 

खुकुरी का इतिहास उतना ही पुराना है

जितना कि आदिम जन का

इस आदिम जन को आदिम ही बने रहने पर अभिशप्त किया

सभ्यता के रचयिता पश्चिम ने

बनकर अंग्रेज बहादुर

रचने खुकुरी का एक नया आविष्कार

बनाने खुकुरी विश्वविजयी

संकट शौर्य में खुकुरी

दिया यह उधार ज्ञान

खुकुरी तो बहादुर जात है

इस तरह खुकुरी अब खुकुरी न रही

बन गयी वह बहादुर कौमों का अदद प्रतीक

वीर गोर्खाली प्रतीक

 

खुकुरी अब जंगी मशीन में तब्दील हो गयी

खुकुरी साम्राज्य गढ़ने का यन्त्र हो गयी

मारकाट, लूट कर पश्चिम को बनाने सँवारने

जिसे ले जंगे

निकला था आखेट पर

अवध दोआबा को रौंदने

इतिहास की किताबें

इसे ग़दर का नाम देती हैं

सिपाही विद्रोह

पर यह बहादुर खुकुरी ही थी

जो लड़ी थी जी जान से

भूखे, नंगे दमित कृषक जनों के सपनों के विरुद्ध

उन्हें मिट्टी बनाते हुए, ध्वस्त कर

इस प्रकार खुकुरी

आंतक-दमन-शोषण का प्रतीक बन गयी

कभी बर्फीले पहाड़ों में आग जला, भूख से लड़ने के लिए बनी खुकुरी

आदिम मन को बना लज्जतदार, ऊष्मा ताप से लैस

खुकुरी अब आंतक दमन शोषण का प्रतीक हो गयी

बचाने साम्राज्यों के हित

 

खुकुरी अब हिमालय की बपौती न रही

नेपाली मन की न्यानो[7] सहजता न रही

खुकुरी एक मुखौटा हो गयी

बन बहादुर वीर गोरखाली

खुकुरी का इतिहास

आदिम जन के जीवन जितना पुराना है

इसीलिए तो

वह हर बार नए अवतार लेती है समय के साथ

साम्राज्यों के दुष्चक्र में फंसे

दो चट्टानों के बीच फँसी

आज खुकुरी

भाड़े की दर पर

मरने खपने वाले;

उधार में दिए गए तमगों के लिए

लडे गए कालजयी युद्धों का जरुरी हिस्सा बन चुकी है

पर खुकुरी को इतने से भी चैन कहाँ

वह आज भारतीय नौसेना की पनडुब्बी हो गयी है

भारत पाक की 1971 की लड़ाई का एक मोर्चा

वह मोर्चा आज भी जारी है

खुकुरी,

कब तुम साम्राज्यों के दुष्चक्र से बाहर निकलोगी ?

गुर्खा भारतीय बहादुर बन

उधार का भारतीय बन

बहाने अपना खून पसीना

उधार का बेलायती बाबू बन

होने गुरखा बहादुर

ले महारानी के मेडल जार्ज विक्टोरिया क्रॉस

खुकुरी,

साम्राज्यों के इतिहास के तहखाने से बाहर आओ

पुनर्जन्म लो,

बनाने हिमाल पहाड़ मधेस में पले बढ़े

नेपाली जन गण मन को.

 

(14 मई, 2016; एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी में प्रकाशित)

 

+++

 

 

5.

 

लिए मेरे नेपाल

 

लिए मेरे

नेपाल के मायने

पहाड़ से बहुत दूर

कालो पहाड़ में आलू बोते

एक बहादुर का सपना पलता है

कर सके जो तब्दील

पहाड़ नाम के उसके घर में

देने दो छाक खाना

बना पहाड़ को कालो पहाड़

लिए मेरे नेपाल के मायने

सुन्तली के साधारण सपने हैं

जो बेंच न खाए जाएँ

रिश्ते के मामा-मामी, चाचा-चाची, भाई बहन, काका-काकी द्वारा

जीबी रोड के बजबजाते लसलसाते दडबों में

उपकृत करने एचआईवी दंश से

सुन्तली के सपने कुर्बान हो जाना चाहते हैं

बस अदद बेटी, अदद बहन, अदद माँ, अदद पत्नी

अदद स्त्री के कुल योग से उपजे मनुष्य में

लिए मेरे

नेपाल के मायने

वीर गोर्खालियों के सपने हैं

न हों कुर्बान

भर फर्राटा दौड़

पोखरा के उपनिवेशी गुलाम बाड़ों में

बनने भाड़े के स्पार्टाकस

बहाने पानी सा रक्त अजेय

अ राष्ट्रीय धरती पर

बस अदद दो छाक पेट के लिए

लिए मेरे

नेपाल के मायने

मेरी मातृभूमि के गली चौराहों में

मोमो बेचते बहादुर बच्चे हैं

दो टांगों पर खड़े हो दिनभर

बैशाख की तपती धूप से ले

कंपकंपाती सर्दी में खुले गगन के नीचे

बचपन की मासूमियत भेंट चढ़ा

होटल में चाय के बर्तन घिसते घिसते

देखते हैं एक सपना

मोमो की अपनी दुकान का

लिए मेरे नेपाल के मायने

महिला मुक्ति की गाँठ में जड़ी

पितृसत्ता के मुक्ति की आवाजें मात्र नहीं

फॉरगेट कर काठमांडू

देश की चिंता में हों लीन

ग्रीन कार्ड ले बेलायत में बैठ

रचाकर स्वयंवर तागाधारी भारदारी

मचाती शोर सीनाजोर

नामालुम किस भाषा में गिटपिट करतीं

भुलभाल कर यह

और भी गम हैं ज़माने में तुम्हारे सिवा

गोकि ग्रीनकार्ड धारी आँसू

अंततः ब्रह्मा के स्वर से रचित

नागरिकता के स्रष्टिगान ही तो हैं

सुनो बाँधवी !

जमा करो अपने आँसू

मिलाने सुन्तली के आंसुओं में

लिए मेरे नेपाल के मायने

बस यही हैं

जमा कर सकूँ

सपने, आँसू अनेक रंगों में लिपटे

कालो पहाड़ में आलू बोते बहादुर के सपने

एचआईवी दंश में घुलती जाती सुन्तली के आँसू

अराष्ट्रीय धरती पर खून बहाते बहादुरों के सपने

मोमो बेचते चाय के बर्तन घिसते मासूम बचपन के सपने

में जमा करने अनागरिक माओं के आँसू

बनाने लौह दीवार

जलजला की आग में पका

पिघलाकर, गलाकर बनाने नए औजार

बहादुर मुट्ठियों के लिए

लड़ने-लड़ने-लड़ने !

 

(18 मई, 201 6; एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी में प्रकाशित)

 

1- यह कविता सितम्बर, 2015 में नई दिल्ली स्थित सउदी अरब दूतावास के एक राजनयिक पर दो नेपाली महिलाओं को कई महीनों तक अपने घर में बंधक बनाये रखकर उनके यौन शोषण की घटना से प्रेरित है.

2-1846 के कोत पर्व हत्याकांड के बाद शाह राजाओं को दरबार की शोभा के रूप में सीमित कर सत्ता पर क़ाबिज हुए नेपाल में राणा वंश के पहले प्रधानमंत्री.

3-काजी लैंडुप दोर्जी 1975 में सिक्किम का भारत में विलय संभव कराने के मुख्य पात्र थे.

4 नेपाली इतिहास के अनुसार जंगबहादुर राणा ने 1846 में दरबार में हत्याकांड कर कोत पर्व हत्याकांड रचाया था और शाह राजाओं को मात्र दरबार की शोभा बनाकर नेपाल पर अगले सौ साल तक राज करने की वास्तविक शक्ति हासिल करते हुए राणा वंश की स्थापना की.

5- आशय बीपी कोइराला से है जो नेपाल के जननिर्वाचित पहले प्रधानमंत्री थे.

 

 

 

पवन पटेल का जन्म 11 जनवरी, 1980 को मिलाथू गाँव, जिला-बाँदा, उत्तर प्रदेश में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एमए (2002) करने के बाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से समाजशास्त्र में पीएच.डी (2014). सन 2013 में बलात्कार के एक ना किये गए अपराध (धारा 376 अर्थात “ब्रीच ऑफ़ प्रोमिस टू मैरी”) में तिहाड़ जेल जाने और दिल्ली हाईकोर्ट से अंततः 2017 में बाइज्जत बरी होने के मानसपटल में रहते हुए नेपाली माओवादी आन्दोलन के रिसर्च पर आधारित किताब लिखते हुए कविता रचना आरम्भ हुआ. जीवन के कुछेक साल (2017-2019) जौहर विश्वविद्यालय, एलपीयू-फगवारा व जीएलए यूनिवर्सिटी, मथुरा में समाजशास्त्र का अध्यापन. सम्प्रति आजीविका के लिए बाँदा में खेती किसानी में संघर्षरत. प्रेम कविता संग्रह “गोधूलि बेला अथवा मुझमे तुम” शीघ्र प्रकाश्य.

प्रकाशित कृतियाँ:-1.द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थाबांगी पर्सपेक्टिव, आदर्श बुक्स: नई दिल्ली (2019), 2.एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे (कविता संग्रह; 2021),  3.जेएनयू मेरे भीतर, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे (कविता संग्रह; 2024), 4.नेपाली मार्क्सवादी आहुति को भारत से स्वयं भू कवि का खुला पत्र, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे (संपादन; 2025), 5.अथ कथा नेपाल: चन्द अनुवाद, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे (संपादन; 2025)

संपर्क: विश्व विहार कॉलोनी, कालू कुआँ, बबेरू रोड, बाँदा, उत्तर प्रदेश; फोन: 6394876724

Post a Comment