समकालीन कविता

फिलिप निकोलेव (Philip Nikolayev)

 

अनुवाद बृजेश सिंह

 

आइए, और ज़्यादा एहतियात बरतें

 

मुट्ठी भर सस्ती ब्लूबेरियां
अपनी हथेली में धोते हुए,
मुझे भान था कि मैं पूरी एहतियात बरत रहा हूँ,
फिर भी मेरे हाथ से एक फिसल गई,
और कुचल गई। ईश्वर की कृपा है !
यह मात्र ब्लूबेरी थी, विचारा मैंने,
अन्यथा कुछ भी हो सकता था,
कोई इंसान,
कोई बस्ती,
कोई गाँव,
या और भी भयावह कुछ।

 

 

उम्मीद है आप ठीक होंगे

 

खुशी की तलाश में भटकते प्राणी
जो कि साफ़ तौर पर हम हैं,
हम दूसरों के लिए और स्वयं के लिए भी,
अनवरत यही कामना करते हैं।

 

ट्रेन में, हल्की नीली रोशनी में दमकते चेहरे,
अपनी हर एक शाम – आँखें जमाये, होंठ भीचे,
रिक्तता और कोलाहल को स्क्रॉल करते अंगूठे
जिसके बारे में कोई बतिया भी नहीं रहा।

 

वह औरत बहुत देर से नज़रें झुकाए है,
इस आदमी की स्क्रीन पर किसी के इंतज़ार का अक्स नहीं।
हमारी खामोशी पटरियों पर गुनगुनाती है,
थकान कोहरे सी जम रही है।

 

“उम्मीद है आप ठीक होंगे,” मैं फ़ोन पर
यों ही टाइप करता हूँ, या, “मुझे उम्मीद है
आप सब ठीक होंगे,” यह अच्छी तरह जानते हुए भी
कि अब ऐसी कोई उम्मीद नहीं है।

 

शीतल स्नान

 

फिर से।
एक नया बाथरूम।
कोई नया तर्क।

 

तुम खड़े हो वहाँ, नम्र और नग्न,
मानो शिष्टाचार प्लंबिंग के लिए हो।
हैंडल क्रोम में पगी कोई पहेली है।
बाएं का वादा गरमाहट, दाएं का प्रस्ताव अधिकार।
मगर पूरा कोई नहीं करता।

 

तुम पहले ज़ाहिर तरीका आज़माते हो।
फिर उससे कम ज़ाहिर।
फिर रस्में:
आधा घुमाना, रुकना, आधा वापस घुमाना,
जैसे किसी देव से मोलभाव कर रहे हो
जो सिर्फ़ ताप में ही जवाब देता है।

 

कहीं न कहीं, गर्म पानी मौजूद है।
तुम उसे महसूसते हो
पाइपों के गरारे करने में,
उस छोटे, इतराते झटके में
जो तुम्हारे कंधे को स्पर्श कर
गायब हो जाता है।

 

तुम दिखावा करते हो कि तुमने यही चाहा था,
यह ताज़गी भरा दर्शन,
होटल या किसी अनजान घर में
शीतल जल का यह बपतिस्मा,
क्योंकि किसी को बुलाकर पूछने का मतलब
यह मानना कि दुनिया में ऐसे नॉब हैं
जिन्हें जानना तुमने कभी सीखा ही नहीं।
तुम इंतज़ार करते हो। तुम खुद को ढालते हो।
तुम फिर इंतज़ार करते हो।

 

वयस्कता, तुम सोचते हो,
सहजता का वह अभ्यस्त मुखौटा है
जो ‘अनजान होने’ के ऊपर पहना जाता है;
भ्रम के बीच खड़े रहने का वह धैर्य
जिसे तुम किस्मत का नाम नहीं देते,
उसी छोटी सी सच्चाई को बार-बार घुमाते रहना
हर बार थोड़ा-थोड़ा करके,
पाइपों के भीतर।

 

फिलिप निकोलेव बोस्टन में रहने वाले एक बहुभाषी कवि हैं। उनके पास हार्वर्ड से दो अकादमिक डिग्रियाँ और बोस्टन यूनिवर्सिटी से PhD की डिग्री है। निकोलेव की काव्य रचनाएँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। उनके संग्रहों में ‘मंकी टाइम’ (Verse Prize का विजेता) और ‘लेटर्स फ्रॉम एल्डेंडर्री’ शामिल हैं। अलेक्जेंडर पुश्किन की कविताओं के उनके अनुवादों का एक संग्रह, ‘द स्टार ऑफ़ डैज़लिंग एक्स्टेसी’, 2021 में Tiptop Street द्वारा प्रकाशित किया गया था। उन्होंने अन्ना हैलबर्स्टैट के साथ मिलकर ‘Lyric Resistance: Ukrainian Poetry of War and Hope’ का सह-संपादन किया, जो ‘The Café Review’ का ग्रीष्मकालीन 2024 अंक है। निकोलेव ‘Fulcrum: An Anthology of Poetry and Aesthetics’ के सह-प्रधान संपादक हैं। उनकी कविताओं का स्पेनिश अनुवाद संग्रह, ‘Falso insomnio’, हाल ही में लैटिन अमेरिका में Editorial Efimera द्वारा प्रकाशित किया गया है।

 

 

 

बृजेश सिंह द्विभाषी कवि, अनुवादक तथा काव्य-संग्रह ‘अपने-अपने कैनवास’ के रचयिता हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि प्रबंधन (Law Management) में स्नातकोत्तर सिंह वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं। ‘कृत्या (Kritya) की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।

 

 

 

 

 

 

 

अविनाश श्रीवास्तव

 

 

“मौन के मन्तव्य”

 

मन्तव्य-1

 

प्रेम में
ख़ामोशी कहती है
शब्द चुप रहते हैं
हम दिल से कहते हैं
दिल से ही सुनते हैं
प्रेम में
दिल बोलते हैं
और दिल ही सुनते हैं
दिल को नहीं दिखता
जात-पात
ऊँच-नींच
अमीर-गरीब

 

मन्तव्य-2

 

तब मत कहना
जब सब कह रहे हों
ख़ामोश रहना,
क्योंकि शोर में
अक्सर खामोशियाँ ही बोलती हैं

 

मन्तव्य-3

 

भीड़ और कोलाहल में
बोलना दुष्कर होता है
और श्मशान में शोर करने से
मुर्दे नहीं बोलेंगे
बोलने और चुप रहने का
अपना एक समय है
समय ही शब्द को आवाज़ देता है

 

मन्तव्य-4

 

विदा होने से पहले
वो खामोश थी
उसे तब बोलना चाहिए था
कल दो लोग जल गए
एक दहेज़ में
और एक प्रेम में!

 

मन्तव्य-5

 

एक दिन मैं बिना कुछ कहे
चला जाऊँगा
तब तुम फिर से पढ़ना
मेरी चिट्ठियाँ
मैंने कहा था
पर तुमने सुना नहीं
चिट्ठियाँ बोलती हैं
जब हम ख़ामोश हो जाते हैं!

 

 

डॉ. अविनाश श्रीवास्तव ,जन्म -अयोध्या, उत्तर प्रदेश, वर्तमान में: कैंसर अनुसंधान वैज्ञानिक, कैलिफ़ोर्निया, USA,विज्ञान में स्नातक, स्नातकोत्तर और PhD की उपाधियाँ प्राप्त। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित। विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख प्रकाशित। पहला कविता संग्रह “मैं+मैं=हम” वर्ष 2025 में प्रकाशित। विज्ञान, संगीत और साहित्य में गहरी रुचि। संगीत और साहित्य पर अपना स्वयं का YouTube चैनल ( https://www.youtube.com/user/anviavi ), जिसके लगभग 16,000 नियमित सब्सक्राइबर हैं।

 

 

 

 

 

संजय उपलाना

 

चलो कहीं चलते हैं

 

 

चलो कहीं चलते हैं,

कुछ सपने जो दिल में पलते हैं,

उन सपनों को फिर जीते हैं |

खेत में नदियों पे,

बाग में गुजरी गलियों में,

जहाँ तन्हाईयों के सूरज ढलते हैं,

चलो कहीं चलते हैं |

मंदिर में सावन में ,

किसी तनहा घर के आंगन में ,

बिसरे बुज़ुर्गों संग टहलते हैं,

चलो कहीं चलते हैं |

आम के उस बूढ़े पेड़ पे,

गुज़रे कल की कुएं की मेड़ पे,

भीतर छुपे बच्चे के दिल बहलते हैं,

चलो कहीं चलते हैं |

मर्ज़ हैं कई और किस्से भी,

गम तो आए मेरे हिस्से भी,

हद ग़मों की भी तो किसी ने बनाई हैं,

क्या दर्द ढ़ोके मंज़िल किसी ने पाई है,

कहीं तो उम्मीदों के दिए जलते हैं,

चलो कहीं चलते हैं |

माना गमे जाफ़र हैं यहाँ,

ज़िंदगी में आसान चैन कहाँ,

तेरा दिल जफ़र है रिश्तों का,

कभी हंसी तो कभी आंसूं की किश्तों का,

उसूल दुश्वारियों की आँच पे पलते हैं ,

चलो कहीं चलते हैं ||

 

 

मिट्टी

 

जब उस मासूम के जिस्म पे कफ़न देखा,

दिल से ज़बां और रूह से अरमां दफ़न देखा |

दर्द की हर हद बेहद सी हो गई थी वहाँ,

हमने कब्र पहुँचे फ़रिश्ते के सीने पे ज़ख्म देखा |

लेके चले वो गम की बारात जो चार कंधे,

ऐ खुदा हमने जीते जी क्यों तेरा ये सितम देखा |

उखड़ी सांसें माँ बाप की भी चल पड़ी थी संग,

हमने उस चेहरे पे मासूमियत का एक वहम देखा |

दो गज़ ज़मीन तो मयस्सर होती है सभी को,

हमने दफ़न की उस मिट्टी को बड़ा बेरहम देखा ||

 

काश

 

दिल गुमशुदा और ज़िंदगी तलाश है,

क्यों मुक़द्दर से जुड़ा वो बेरहम “काश” है |

वो चल पड़े हमे तन्हाईयाँ उधार दे,

आंसूं और दर्दे नादानियां उधार दे,

किसी को तलाशती भटकी सी लाश है |

आज और कल की ख़ुशी हादसे मिटा देते हैं,

लोग विदा का सामान दो पल में जुटा देते हैं,

साँसों से सिसकते वो हैं जो दिल के खास हैं |

जज़्बात से ज़ज़्बे बनाता है आदमी,

राह से भटको को उठाता है आदमी,

वो निकले कैसे जिनसे जुड़े अंधेरो के “पाश” हैं |

काश उस दिन उन्हें रुखसत ना किया होता,

वो बेदर्द लम्हा पास ना आने दिया होता,

अब तलक अटकी वो अफ़सोस की फांस है ||

क्यों ?

सपनों को छोड़ क्यों तन्हाइयाँ ढूंढते हो,

आज को छोड़ क्यों कल की परछाईयाँ ढूंढ़ते हो |

चंद तारे बिछड़ने से रोशनी नहीं खोती,

बचे तारों के रहते क्यों जुदाईयाँ ढूंढते हो |

हँसके किसी का दर्द बाँटना है ज़िन्दगी,

तुम अपने गम के रास्तों पे क्यों ख़ुदाइयाँ ढूँढ़ते हो |

मुकद्दर बनते है यहाँ राख से ख़ुद को उठा के,

तुम अब तक उस कल की नादानियाँ ढूँढ़ते हो |

दिल के ज़ख्म सिनें कुछ अपने तैयार खड़े हैं,

तुम उन्हें छोड़ क्यों वो बेरहम वीरानियाँ ढूंढते हो ||

 

 

ख्वाहिशों का किला

 

ख्वाहिशों का किला जब टूट जाता है,

गम तन्हाईयाँ ले दबे पाऊँ आता है |

मतलब हो तो दर्द को गोदी में खिलाती है दुनिया,

जो निकले ये तो इसीको दवा बना पिलाती है दुनिया,

फिक्र में डूबा ये दिल आंसुओं से नहाता है |

जिक्र उनका आया किसी याद की किताब में,

उम्मीद का झोंका टकराया मेरे लिहाफ से,

इस टूटते घर में क्यों सावन बरस जाता है |

वक़्त बेईमान था कि लोग थे ज़ालिम,

वो मेरे अपने ही थे कि सपनो के क़ातिल,

ये सोचते सोचते एक अरसा गुज़र जाता है |

दिल चल तो रहा पर सिसकियों के जोर पे,

अँधेरे गुज़रे साये हैं घर के छोर पे,

मन की अँधेरी गली के मोड़ पे कोई रोज़ रो आता है ||

 

संजय उपलाना एक फार्मा पेशेवर हैं, जिन्हें कविता से गहरा लगाव है। उन्हें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर लिखना पसंद है, जिसमें वे एक अनोखा दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और मानवीय भावनाओं की गहराई में उतरते हैं। वे अपने बचपन के दिनों से ही लिखते आ रहे हैं और कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जुड़े हुए हैं।

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