मेरी बात

 

कविता में संवाद

 

 

कविता कभी -कभी संवाद को आधार देती है, अथवा कभी संवाद के माध्यम से प्रश्नों को स्पेस देती है। प्रश्न और सवाल किसी भी समाज की मानसिक और भौतिक उन्नति के लिए जरूरी है। लेकिन कुछ समय से समाज से सवाल गायब होते जा रहे हैं, सवाल पूछने की प्रवृत्ति काठ हो रही है, और दिमाग को बस्ते में बंद कर चलने की प्रवृत्ति हावी होती जा रही है।

 

सवालों को स्वीकार जवाबों की खोज करना, साहित्य का विशेष रूप से कविता का आधार है।

 

कहां है, वे  सवाल?

जो कोष्ठकों में कैद नहीं हैं

जो उड़ते हैं, बेबाक

क्षितिज के गर्भ से उल्का पिण्डों के साथ

सृष्टि के उद्भव के बीज लाने को

कहां है सवाल, जिन्होंने गोते लगा लिए

समंदर में, कछुओं, मछलियों, सीपों से दोस्ती करने को

जिन्होंने धरती के गर्भ में  बीज बोना सिखाया,

आदमी को बिना पंखों के उड़ना सिखाया

सवालों के बिना समाज सिर्फ

तलवार की खनक समझता है,

युद्ध में जलते बच्चों के रुदन को,

औरतों के आर्तनाद को नहीं समझता

कविता चाहे प्रेम की हो, या आत्मबोध की

सवाल से गुजरना जानती है

जैसे कि यमी ने किया था यम से सवाल

गार्गी के सवाल बूढ़े हो गए

फिर भी खोज रही है दुनिया उन्हें आज

सवालों के बिना कविता

और दुनिया

का क्या कोई अर्थ है?

 यह भी सवाल है,

अन्त में एक सवाल उछालना

मेरे हक में भी आता है

 

मुझे लगता है कि आज का बोध रहित ठहरे जल जैसे वक्त में सवालों की फसल बेहद जरूरी है

 

कृत्या का फरवरी अंक प्रस्तुत है

शुभकामनाएं

रति सक्सेना

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