समकालीन कविता

ऊषा दशोरा

 

1. ट्रेकिंग शूज

 

हम नष्ट होने के लिए आए हैं
इस पंक्ति को गले लगाकर मैंने जिगरी दोस्त की तरह ओढ़ लिया

 

हम नष्ट होने के लिए आए हैं
इस पंक्ति को मैंने कई बार पचास रुपये की लॉटरी का फर्जी टिकट समझा फिर फाड़ दिया

 

यही वो पंक्ति थी जो मेरी सैंडल पर चिपकी ऊंची ऐड़ी की तरह साथ चलती थी रोज
– टक- टक- टक

 

इसी पंक्ति के पास थी कशीदेकारी की नई-नई डिजाइन
ये पंक्ति जानती थी सेंटर टेबल के मेजपोश बदलना रोज-रोज

 

इस पंक्ति को अभी-अभी सीखी अ, आ, इ, ई की तरह पढ़ा
‘ लो ‘ फिर नर्सरी में भरती हुई
इस पंक्ति को क्रिकेट खेलते बच्चों की गेंद की तरह उछाला

 

अब कौन कम रही मैं?
पंक्ति को बना दिया
कभी अमरूद के पेड़ पर चढ़ा बच्चा
कभी पहाड़ में गुम्मे बने मिट्टी के ढेले
कभी पानी में बेले नृत्य करती रोपनी

 

सब
हो
लेने
के बाद
बची रही तमाम इच्छाओं से लंबी बहस नहीं की कभी
जो बचा रह गया , जो बचा रहना चाहिए , जो बचा रहेगा
इसे खुला प्रश्नवाचक (?) ही रहने दिया

हम नष्ट होने के लिए आए हैं
इस पंक्ति को स्पोर्ट शूज की तरह एक दिन पहना और ट्रेकिंग पर निकल पड़ी मैं

 

लौटूंगी मन हुआ तो ?

 

 

2. बताओ तो

 

ओह !
अच्छा ?
ऐसा ?
हे राम ! बताओ तो

 

इन छोटी पुड़िया में बाँधेंगे वे तुम्हारे दुख
और जब उठ जाओगे वहाँ से
पीठ के फाटक पर
टंग जाएंगे कव्वै की तीखी चोंच होकर
तब तक मारेंगे चोंच कि दुख फट न पड़े घंटाघर बीच तुम्हारा

 

कद्दू की चटनी,
मिर्ची का हलवा,
गुलाब जामुन का रायता
इन्हीं के बीच नचाएंगे दुख तुम्हारा

 

नून मिरच की पुड़िया बुरकते हुए फिर कहेंगे
तुम्हारी सामने कहेंगे
ओह !
अच्छा ?
ऐसा !
हे राम ! बताओ तो ।

 

3. बोधगया की एक गज ज़मीन

 

कसाईखाने की दीवारों की भी अपनी पीड़ाएँ है
कत्ल के मंगलाचार से पहले
वो अटेंड़ेंस रजिस्टर में बकरों की हाज़री पुख्ता करने के बाद
ईश्वर को उनकी दुआ के टेलिग्राम भेजती हैं

 

परायी प्रार्थना में वन्समोर चिल्लाने वाले दुनिया को तबाही से बचा ही लेंगे

 

बुद्ध तुम्हारी आँखें क्यों बंद हैं ?
क्या छींक रहे हो ?
क्या कोई चिंखूरी आक्रमण करती हैं तुम्हारी पुतलियों में ?

 

शाक्यवंशी स्त्री आंदोलन के संविधान ने
पेम्फ़्लेट छापे हैं परसों ही
शताब्दियों से किसी स्त्री की नींद कैद है तुम्हारी पुतलियों में
इसलिए किसी ने तुम्हें
खुली आँखों में कभी नहीं देखा

 

जिस सुई की नोक पर चक्कर खाता है ग्लोब
अब उसी ग्लोब पर अपनी बनावटी आँखें खोल कर गिरा दो
बंद आँखों के बाहर उस स्त्री के नाम की नेमप्लेट टाँगो

 

बोधगया की एक गज़ ज़मीन
उस नींद के नाम करो

बुद्ध !
स्त्री की नींद को कैद करना महापातक कर्म है ।

 

4. स्वेटर

 

इन दिनों फुटबाल नहीं खेल रही है ठंड
बल्कि एक बुढ़िया की तरह छुट्टियाँ लेकर सोती हुई पुकारती है बार – बार
सफेद रजाई से
‘एक कप चाय प्लीज’

 

ऊन के लच्छे तिबत्ती मार्केट की लंबी यात्रा से लौटकर
किसी छाती की छत पर इमोशन चिपकाकर
यही कहते हैं
झूमते – झामत
‘वो मेरे लिए स्वेटर लाई है’

 

– तभी आवाज़ आई
स्वेटर के साथ मूंगफली छिलती
गपियाती हीटर ने आर्डर दिया था पक्का से
‘माँ गरम गरम टमाटर सूप प्लीज’

 

दाँत किटकिट करते
मोटे दस्ताने कॉफी फैटते हुए खिड़की से झाँकते हैं बार – बार
आँख झपकाते
खिड़की साफ करते
हाथ नचाते
कहते हैं

 

वो जमादारनी स्वेटर पहनना भूल गई है
और उसका बच्चा भी
शायद ।

 

ऊषा दशोरा

बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी लेखिका ऊषा दशोरा का कविता संग्रह ‘भाषा के सरनेम नहीं होते’ प्रकाशित हो चुका है । आपने शार्ट फिल्म – नीले टमाटर, फीचर फिल्म- मैंने कभी चिड़िया नहीं देखी का लेखन व निर्देशन किया है और रंगमंच में भी सक्रिय हैं । इन दिनों ऊषा दशोरा जयपुर (राजस्थान) में रहकर कहानी लेखन कर रही हैं ।

 

योगेश कुमार ध्यानी

 

1. चिड़िया

 

चिड़िया ने देखा अनाज से भरा एक जहाज
चिड़िया ने कभी नही देखा था
एक साथ इतना अनाज

 

भरे जाते समय
कुछ अनाज बिखर गया था
जहाज के डेक पर

 

बिखरा हुआ अनाज
व्यापार की दृष्टि से इतना कम था
कि अनाज के कुल दाम मे उसका हिस्सा
दशमलव के आखिरी अंक तक भी नही पंहुचता

 

लेकिन चिड़िया के लिए वह इतना था
कि चिड़िया की पूरी कौम
जीवन भर
भूख के प्रति रह सकती थी निश्चिंत

 

चिड़िया जहाज के साथ उड़ी तो
लेकिन कुछ ही रोज़ मे लौट आई
वापस उस जगह
जहाँ अनाज के दाने आसानी से नही मिलते थे

 

चिड़िया न तो समुद्र से डरी थी न तेज़ हवा से

 

चिड़िया डर गयी थी सोचकर
कैसी होंगी अनाज से भरे देश की चिड़िया
कितनी होगी उनमे पराये के प्रति कटुता,
कितना स्वीकार्य

 

चिड़िया ने कभी सुना था एक शब्द-
‘शरणार्थी’
चिड़िया उस शब्द से होने वाले सलूक से डर गयी थी।

 

2. रेत

 

रेतीली ज़मीन से कुछ दूर
जहाज़ की खिड़की से देखता हूँ
आकाश पर फैला
एक रक्ताभ गुबार
यह रेत है जो हवा में उड़ रही है,

 

पानी के मुहाने पर खड़े इस देश में
रेत का तूफ़ान है
खिड़की झाड़ती हर स्त्री के हिस्से में आती है
सिर्फ रेत,

 

रेत किसी रिवाज़ की तरह रहती होगी यहाँ
गीली रेत में लिखते होंगें लोग
अपने प्रिय का नाम
हर बोसे में एक व्यक्ति दूसरे को दे देता होगा
थोड़ी सी रेत

 

मुझे नहीं लगता
रेत आंखों में चुभती होगी यहाँ,
जैसे जब दुख टलने की
खत्म हो जाती है हर संभावना
तब वह सालता नहीं है
बस रहने लगता है सह-अस्तित्व में।

 

3. पीठ

 

जहाज की तली से खुरचती है मछली की पीठ
रक्त की एक बूंद पानी मे घुलती है
मछली की नील पड़ी त्वचा को सहलाने ठहरता है
एक छोटे लाल वृत्त जितना समुद्र

 

‘बहते रहो’
मछली कहती है समुद्र से,

 

जहाज मे भरा हुआ अन्न यदि नही पंहुचा
भुखमरी से जूझते देश
तो तुम्हारे और मेरे सर आयेगा हत्या का पाप

 

बहो, घाव से ज्यादा ज़रूरी है
अन्न का पंहुचना भूख तक

गुज़रने दो यह जहाज
फिर हम सहला लेंगे
एक दूसरे की पीठ……।

 

योगेश कुमार ध्यानी

कानपुर (उ.प्र.) में जन्मे युवा कवि योगेश कुमार ध्यानी पेशे से मैरीन इंजीनियर हैं। कवि योगेश कुमार ध्यानी का कविता संग्रह ‘समुद्रनामा’ 2022 में प्रकाशित हो चुका है । इसके अतिरिक्त इनकी कविताएं देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं और वेब साइट्स पर प्रकाशित होती रहती हैं । गाथान्तर पत्रिका में कहानी, प्लूटो तथा शतरूपा पत्रिकाओं में बाल कहानियां एवं पोषम पा पर कुछ विश्व कविताओ के अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं ।

 

कमल कुमार मेहता

 

1. सहज चुप्पियां

 

सहज चुप्पियां
घिरने लगें
बातो के लंबे सिलसिलों के बीच
और फिर भी लगे
ऐसा होना चाहिए
तो मान लो
गहरे प्रेम में हो तुम

 

पथरीली हो डगर
कंकरों ने जोर आज़माया हुआ हो
महबूब हाथ थामे हो
फिर कंकर तुम्हें
फूल मालूम हो
तो मान लो
गहरे प्रेम में हो तुम।

 

हर दौर की बारिशें
आशिको को लुभाती रही है
तुम सहराओं के बाशिंदे हो
और रेत को बनाकर बिछौना
उसके ख्यालो से सुकून पाते हो
तो मान लो, मेरे दोस्त
गहरे प्रेम में हो तुम

 

2. पन्ने

 

उसने कहानियों के अंजाम
संजो कर रख लिए
मैने सारे किस्से ज़ेहन में
बनाये रखे।
उसने व्याकरण का भी ख्याल रखा था
मैंने लोगो की आम ज़ुबान चुनी।
उसने तकनीक की दुनिया
चुन ली थी
मैं कागज़ कलम पर अटका रहा।

 

और इस तरह हम
रहे तो एक ही किताब में
मगर हमने चुन लिए
अलग अलग पन्ने।

 

3. कलयुग

 

‘घोर कलयुग आ गया है’
यह वाक्य तब आता है ज़ुबाँ पर अक्सर
जब बनी बनाई व्यवस्थाए टूटती है,
जब चरमराने लगती है वो अदृश्य गद्दियां
जो बनाई गई थी असंख्य लोगो की पीठ पर।

 

जैसे जूठन खाने तक सब सही माना जाता है
और ‘जूठन’ लिख देने पर कलयुग का भान होने लगता है
यही पहचान है कलयुग के आने की
हमारे इस महान भारतवर्ष में।

 

जैसे पिता का सर झुका रहे तब तक
सब सही माना जाता है
और नई पीढ़ी का लड़का बगल में खड़े
सिर्फ नमस्कार करने लगे तब मान लिया जाता है
कि घोर कलयुग आ गया है।

 

जब बेटी को दी जाए सलाह
घर के काम मे पारंगत होने की
और उस पर अमल हो
तब तक समाज संस्कारवान है
मगर जब वो तोड़ दे समाज की ऐसी बनावटी तस्वीर
तब मान लिया जाता है कलयुग आ गया है ।

 

कमल कुमार मेहता

कवि कमल कुमार मेहता पेशे से राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, वर्तमान में बगरू, जयपुर (राजस्थान) में निवासरत हैं ।

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