कविता के बार में

कविता के बारे में

अपर्णा मोहंती की कविताओं में स्त्री-प्रतिरोध का स्वर

दिब्य रंजन साहू 

 

विमर्श की दृष्टि से 80 का दशक काफी महत्त्वपूर्ण है। इस समय ‘स्त्री विमर्श’ जैसी अवधारणा ने एक अभूतपूर्व दर्शन के रूप में तथाकथित मूल्यों को चुनौती देते हुए नारी मुक्ति आंदोलन को जन्म दिया। लगभग हर प्रांतीय भाषा के लिए यह समय विमर्श मूलक लेखन के आरंभिक दौर के रूप में प्रकाश में आया। स्त्री विमर्श के नज़रिए से उड़िया भाषा में नब्बे दशक के उत्तरार्ध से कई रचनाकारों ने अपनी आवाज़ को मुखर किया है। धीरे-धीरे यह स्वर और अधिक व्यापक होने लगा। भूमंडलीकरण तथा बाजारवाद से प्रभावित समाज में एक स्त्री के अस्तित्व से संबंधित सवालों ने उसे सोचने-समझने को मजबूर कर दिया। यही कारण था इस समय की कवयित्रियों ने अपनी वेदना एवं संघर्ष को व्यापक फ़लक पर देखना शुरू किया। इस समय उड़िया साहित्य में अपर्णा मोहंती की कविताएं अपनी विशिष्ट अर्थवत्ता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण समय सापेक्ष अपने युगीन लगभग सभी विशेषताओं को आत्मसात करती नज़र आती हैं।

उड़िया साहित्य के लिए इस समय अपर्णा मोहंती का प्रवेश स्त्री जीवन से संबंधित विचार वैविध्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनकी कविताएं स्त्री-पुरुष संबंध को बेहतर ढंग से समझती हुई पितृसत्ता पर अपना आक्रोश व्यक्त करती हैं। इसे निर्विवाद स्वीकार्य किया जा सकता है कि उड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित समकालीन उड़िया स्त्री कवयित्रियों  में अपर्णा मोहंती का स्थान निःसंदेह साहसिक तथा महत्वपूर्ण रहा है।

समकालीन उड़िया स्त्री कविता में बीसवीं सदी का अंतिम दशक अपने  पारंपरिक मूल्यों को चुनौती देते हुए नज़र आता है। ऐसे समय में उड़िया  काव्य जगत में अपर्णा का आगमन साहित्य के क्षेत्र में एक विमर्श मूलक लेखन को गति देने के साथ सामंती मूल्यों को ख़ारिज करता है। वर्तमान समय में यदि किसी स्त्री लेखिका ने उड़िया साहित्य में नारी अस्मिता की  गाथा को सफल अभिव्यक्ति दी है, तो निर्विवाद रूप से अपर्णा मोहंती इस श्रेणी की सफल हस्ताक्षर हैं। इनकी कविताओं में नारी अपनी अस्मिता को प्रतिष्ठित करती हुई पितृसत्ता के विरुद्ध अपने स्वर को मुखर करती है। नारी की देह संबंधी कुंठा की सफल अभिव्यक्ति करतीं उनकी कविताओं में प्रेम की गंध को सहज महसूस किया जा सकता है। समाज में स्त्री-पुरूष संबंधी विचारों का पश्चिमी रूप उनकी कविताओं की विशेषता है। अभी तक अपर्णा के एक दर्जन से भी अधिक कविता संग्रह प्रकाशित हैं। जैसे – ‘अव्यक्त आत्मीयता’ (1991), ‘असती’ (1993), ‘निःशब्दरे’ (1994), ‘अतिथि’ (1997), ‘पूर्णतमा’ (2002), ‘झिअ पाईं झर्काटिए’ (2005), ‘नष्टनारी’ (2007), ‘माँ र कांदणा गीत’ (2010), ‘जोगिनी गीत’ (2015), ‘ऐबे मुं प्रेमरे’ (2016), ‘अग्नि कमलिनी’ (2017), ‘निजकु खोजिला बेले’, ‘अपर्णा महंती मानन्क पाईं कविता’, ‘तारा प्रति’, ‘निआं नई मझिरे’ (2022) आदि है। मुख्य रूप से अपर्णा मोहंती की कविताओं में प्रेम एवं विद्रोह का स्वर ज्यादा मुखर जान पड़ता है। वह अपनी ‘पहचान रखो’ कविता में लिखती हैं –

“एक साथ गच्छित है / संसार के सब मृत जीवित नारी के

आत्मविश्वास के जीवाश्म / त्रस्त तिरस्कार

और मौन हाहाकार… ।”1

पितृसत्ता के संदर्भ में स्त्री चित्त की विश्वसनीय प्रस्तुति उनकी कविताओं में सहज अभिव्यक्त हुई है। साम्यवादी नारीवाद से प्रभावित कवि अपर्णा अपनी कविताओं में स्त्री मुक्ति के पथ पर प्रेम-तत्व की प्रगाढ़ता को स्वतः महसूस करती हैं। उड़ीसा की आत्मा गांव में बसती है। यह निर्विवाद सत्य है कि गांव में पितृसत्तात्मक समाज की अवधारणा को एक खुला मंच मिलता है। पितृसत्ता के चलते गांव की स्त्रियां भेद-भाव की आदत बचपन से ही डाल लेती हैं। मध्यवर्गीय समाज के विसंगतिपूर्ण जीवन में पारिवारिक हिंसा एवं मानसिक तनावों ने अत्याचार की सीमा का अतिक्रमण कर दिया है। गांव में  लड़कियों का ससुराल जाना परम सौभाग्य के रूप में देखा जाता है। लगभग देश के हर अंचल विशेष में इसकी सहर्ष स्वीकृति है। दुःख तो तब होता है, जब एक लड़की अत्याचार के कारण ससुराल से पिता के घर आती है और माता-पिता उसे फिर से उसके घर वापस जाने को समझाते हैं। उनका मानना है, अगर वह रहेगी तो यह समाज के नियमों के विरुद्ध होगा। इस प्रकार सामाजिक मन प्रवृत्ति के विरुद्ध अपर्णा ने अपनी क़लम चलाई। स्वानुभूति को उन्होंने अपने विचारों एवं काव्य कुशलता के जरिए स्त्री आंदोलनों को नया रूप दिया।

अपर्णा मोहंती ने स्त्री जीवन के लगभग हर सुख-दुःख तथा आनंद-विषाद आदि को अपनी कविताओं में जगह दी। पितृसत्ता के विरुद्ध उनका स्वर सदैव प्रबल आत्मविश्वास के साथ विद्रोही के रूप में विद्यमान है। अपर्णा के काव्य सौष्ठव पर कवि डॉ. सीताकांत महापात्र कहते हैं – “कविता भी अपेक्षा रखती है कवि के आत्मान्वेषण और आत्मविश्वास पर। एक अच्छा कवि अपने अंदर झांकता है, देखता है बाहर की विचित्र दुनिया को और फिर लिखता है कविता। उसकी असली प्रतिबद्धता रहती है कविता के प्रति। इसीलिए जब उसे आवश्यकता होती है तब वह प्रतिवाद करता है। प्रतिवाद करता है सामाजिक वैकल्य के विरुद्ध में, अपनी सीमित सत्ता के विरुद्ध में; यहां तक स्वयं विश्वनियंता के विरुद्ध में।”2 अपर्णा मोहंती की यही प्रतिरोधी चेतना पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध खड़ी है। ‘जाने दो’ कविता में वह लिखती हैं –

“अब जाने दो / मुझे गढ़नी होंगी

विदुषी कन्याओं के गांव / इच्छामयी पत्नियों के देश

और मनस्विनी / जननियों की पृथ्वी…

केवल / वंश रक्षा की आड़ में / हयवदन वर्ण संकरों को

देह में धारण की बार-बार

मुझे / पुत्रवती होने की

अभिशाप से मुक्त कर दो।”3

पितृसत्तात्मक समाज का वास्तविक चित्र खींचती अपर्णा ने देह प्रसंग को अपनी कविता में स्थान दिया है। साम्यवादी नारीवाद का प्रभाव उनकी कई कविताओं में देखने को मिलता है। उनकी कविताएं देह, मन तथा यौवन के यथार्थ चित्र के साथ पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था पर कठोर प्रहार करती हैं। वह लिखती हैं –

“वही / पांच के संग / भौ नचाते

एक और एक के / कान में कहे

चरित्रहीन है जी …

अमुक कह रहा था / समुक के संग

इसे केलि करते / उन्होंने देखा था

अमुक रात …।”4

अपर्णा की कविता पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित समाज जहां प्रेम एवं यौन संबंधों को सही एवं ठीक-ठीक नहीं समझा गया है, के विरोध में खड़ी हैं। इस दृष्टि में उनकी ‘पुनरावृत्ति’ कविता को उद्धृत करना समीचीन प्रतीत होता है। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति को उजागर करती उनकी यह कविता सामूहिक बलात्कार के खिलाफ सख़्त नियम व कानून की मांग करती है। यह कविता उन लोगों की मानसिकता पर प्रहार करती है जो इस दुर्व्यवस्था के साथ खड़े हैं–

“यौन संबंध के साथ

प्रेम को छंदबद्ध किया है, इसीलिए तो

मनुष्य की प्रवृत्ति को

प्रकृति बंधनमुक्त की है।”5

‘सती’ कविता में अपर्णा महांति ने एक स्त्री के त्रासद अनुभवों को शब्दबद्ध करने का सफल प्रयास किया है। प्रभुत्ववादी सोच के अंतर्गत स्त्री-पुरुष संपर्क में सतीत्व का परीक्षण पुराणों में भगवान राम के द्वारा भी किया गया है। इस कविता में सती शब्द के अंतर्गत एक स्त्री की अंतर्मन में दबी आवाजों को तथा उसमें निहित एक पुंसवादी विचारधारा को पारिभाषित किया गया है। उदाहरणस्वरूप कविता दृष्टव्य है–

“सतीत्व जाने के भय से

एक स्त्री / कभी भी

सच नहीं कह पाती है।”6

गौरतलब है कि अपर्णा की ‘पहचान रखो’, ‘आजिश्रीरामराज्यरे’, ‘देहेश्वरी’, ‘मुक्ति संहार’, ‘जननीरस्वीकारोक्ति’, ‘लेखालेखिकरुथिबा स्त्रीलोक’ आदि कविताओं में पितृसत्ता एवं प्रतिरोध के स्वर को प्रमुखता से देखा जा सकता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को पुरुष के हित साधन के रूप में देखा जाता रहा है। देवी, शक्ति आदि छद्म नामों से तथाकथित रूप में स्वीकार करने का ढोंग रचते हुए बाल्यावस्था से ही उसकी इच्छाओं को दमित किया जाता रहा है। उनके सभी अधिकारों को पुरुष के हाथों प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में हस्तांतरित किया जाता रहा। इस प्रकार की मानसिकता एवं विसंगति के विरुद्ध अपर्णा मोहंती ने अपनी कविताओं में पुरजोर विरोध किया है।

कुल मिलाकर कहें तो अपर्णा मोहंती ने भारतीय साहित्य में स्त्री-लेखन की परंपरा को समृद्ध करने, समसामयिक परिदृश्य की स्थितियों एवं उनकी मुक्ति को विमर्श की दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। उनकी कविताओं ने प्रतिरोध की चेतना एवं प्रेम के शाश्वत रूप को एक सूत्र में बांधकर जीवन को नए स्वर दिये। ज़मीनी अनुभवों के साथ उन्होंने नए बिंबों एवं प्रतीकों के सहारे स्त्री-जीवन के तमाम व्याकरण को सच्चे अर्थों में प्रतिपादित करने की कोशिश की है ।

संदर्भ ग्रंथ सूची :

1 मोहंती, अपर्णा (2007) नष्टनारी पृ. 41

2 महापात्र, सीताकांत (2013) कवितारे स्नेह ओ साहासर अनबद्य स्वर अपर्णा पूर्णतमा (संपा. डॉ. गिरीश चन्द्र साहू & डॉ. भुवनानन्द साहू) पृ. 23

3 मोहंती, अपर्णा (2019) झिअ पाईं झर्काटिए पृ. 06-07

4 मोहंती, अपर्णा (2007) नष्टनारी पृ. 17

5 मोहंती, अपर्णा (2017) अग्नि कमलिनी पृ. 67

6 मोहंती, अपर्णा (2019) झिअ पाईं झर्काटिए पृ. 17

पता-

दिब्य रंजन साहू (सहायक अध्यापक, आर्यभट्ट कॉलेज, झारसुगुड़ा,

ओड़िशा)

ई.मेल – dibyosahu25@gmail.com

मो. – 8895251528 / 8249107366

 

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