समकालीन कविता

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्रिस्टीना पिकोज की कविता (Christina Pacosz)Polish/American

अनूदित‍‍ -रति सक्सेना

घर वापिसी*

1

ज़मीन भूल गई उसे,
जब वह घर छोड़ कर गया,
बच्चा ही तो था, सेब का दरख्त
जिसे लगाने में उसने मदद की थी,
फलने को तैयार है, फिर से
उसके जाने के बाद की
करीब साठ फ़सलों के बाद

आर्किड को भी याद नहीं कि
कितनी नाज़ुकता से
उसने जड़ों के पास की गन्दगी
साफ की थी, और
झुक कर टेड़ी हुई डाल के करीब
हौले से मिट्टी थपथापाई थी क़रीब

दरख़्तों को याद हैं केवल कलियां
और उनका खिलना, फल
और फसल, फिर सर्दी के मौसम में
एक गहरी लंबी नींद

केवल उसे ही याद है उसकी
वह जो सबसे बूढ़ी है, बहुत कम बताती है
उसके काम से भरे लम्बे दिन
काम, काम।

सेब झड़ कर सड़ रहे हैं,
काम बढ़ गया है, चुनना और पकाना
आधे दिन तक आग सुलगाना,
फिर असन्तुष्ट नींद।

2

सूरज पार चला गया
खेतों और आलुओं ने
गीले खेतों में
सफेद मांसपेशियों को ढीला छोड़ दिया

3

मेरे पिता एक दूसरी ज़िन्दगी को याद करते हैं
एक जो तंदूर में जला दी गई
एक जो ज़मीन में दफ़ना दी गई

कौन शोक मनाता है यहूदियों के लिए?
भुला दिए गए लोग, विदेशी
जो ईसा को नहीं पूजते
लेकिन इंतजार करते रहे उसका
जब तक वे ख़ुद ही मिट गए

मेरे पिता भी इंतजार करते हैं
सोचते हैं कि, काश वे भी यहीं रहते
और मर सकते उनके साथ
वे जो दुकानदार,
लाल सिर वालीं औरतें
और बच्चे, बतखें और बकरियां चराने वाले।

 

पोलैंड में

‍‍‍‍…………..

(डा. जानस्ज कोर्जाक के लिए
जो डरे नहीं गाने से)

पंक्ति के
अन्त में
उन्हें मालूम था, कि
क्या करना है

बच्चों को साथ लिए
बाक्स कार से
निकल कर
वे चलते हुए
पहुंच गए गेस चैम्बर में

गाते हुए

स्मृति अवशेषों के स्वभाव के बारे में

बहुत कम
बहुत देर से

दो औरतें, एक पियानो, एक घड़ी

शहर के छोटे से फ्लैट के
सामान से अटे एक कमरे में एक पियानो है

जब भी वह उसे बजाती है
वह घंटों याद करती है
स्कूल में ड्रिलिंग स्केल्स को

गांव में एक घड़ी है
जो एक छोटे से घर में बजती है

हर बार, जब वह कुर्सी पर चढ़ती है
घड़ी में चाभी भरने को
वह याद करती है सूअरों को
जिन्हें उसे खरीदना है
पालने के लिए।

क्रिस्टिना पीकोज कवि, समाजसेविका और पूर्व अध्यापिका हैं। आपके पिता महात्मा गाँधी से प्रभावित थे, जिसका प्रभाव आप पर भी पड़ा है। उनके परिवार पर द्वितीय महायुद्ध का प्रभाव पड़ा है। फिलहाल आप अमेरिका के केंसास सिटी में रहती हैं। आपकी अनेक कविता पुस्तकें हैं, ये ये कविताएं “This is not a place to sing” नामक पुस्तक में से ली गई हैं, इन कविताओं में पिता के पैतृक स्थल पोलैंड और उससे जुड़ी स्मृतियां हैं जिन्हें कवि ने तब गहरा महसूस किया जब उन्हें अतिथि कलाकार के रूप में वहां काम करने का मौका मिला। इन कविताओं का अनुवाद कृत्या के लिए रति सक्सेना ने किया है।

 

जावेद आलम ख़ान की कविताएं

 

वीर भोग्या वसुंधरा

 

हवा ने सांसों की सलाइयों से जिस जीवन को बुना है
हमारी नश्वरता को वही ढके रहता है ताउम्र
जबकि हम जंगलों में कंक्रीट उगाकर
उन्ही सांसों को उधेड़ने में लगे हैं।

इस नीले – पनीले ग्रह में हम प्यासे ही मरते
अगर नदियों ने हमारे खुश्क गलों को तर करने के लिए
मीठा पानी न उड़ेला होता
होने को तो पृथ्वी के श्रेष्ठ प्राणी होने के नाते
अहसानमंद होना चाहिए था दरिया के बहते पानी का
कि जिसके आंचल में सभ्यताएं पली बढ़ीं
कि जिसकी लहरों में खेलकर मानवता
बचपन से जवान हुई
कि जिसका पानी हमारी आंखों में शर्म बनकर उतरा
मगर हमने सभ्यता के नाम पर
सबसे पहले अपने भीतर के पानी को मारा
और फिर जहर घोलते गए नदियों के पानी में

हमारी अहसान फरामोशी का इससे बड़ा सबूत क्या होगा
कि हम नही जानते अपने उस पुरखे को
जिसने पत्थरों की रगड़ से
पहली बार आग जलाई होगी
और भूख को सर्वव्यापी आदिम सच मानते हुए
स्वादिष्ट भोजन की परंपरा डाली होगी
हम उसे नही जानते क्योंकि वह जंगली था
अपनी इसी जंगलफोबिया में
हम कितने ही आदिवासियों को दुश्मन मानते हैं
क्योंकि जल और जंगल बचाकर
वह हमारी उस सभ्यता के गति अवरोधक हैं
जो तथाकथित विकास के रथ पर सवार
आग से कमजोर देशों को जलाते हुए
पानी को डुबाने के लिए
और हवा को
जहरीली गैसों का माध्यम बनाकर
अपनी ही लाश पर विलाप कर रही है

हमें जीवन से ज्यादा साम्राज्य से प्यार था
हमारे नायक खेतों में जिंदगी उगाने वाले
मेहनतकश होने चाहिए थे
मगर हुए वे
जो खड़ी फ़सलों को जलाते हुए
लाशों के अंबार पर साम्राज्य का जश्न मना रहे थे
महानता के आख्यान उनके हिस्से आए
जो जिंदगी बोने और उगाने वालों के श्रम को
अपने बगीचों में गुलाब की क्यारियों में उड़ेलते रहे
कि उनके बिस्तर पर ताजे फूलों की कमी न होने पाए
उनके इत्रदानों में नमी न खोने पाए

वीर भोग्या वसुंधरा की सुर्खियां
उन महलों को मिली जिनकी बुनियादों में
उन्ही की उम्र के दबे हैं जीवाश्म
बलि के नाम पर मासूमों की घुटी हुई चीखें
राज़ के साथ दफ़न हुई स्त्रियों के आंसू
इसी महल को बनाने वाले मजदूरों के हाथ

वीर भोग्या वसुंधरा जिनका जीवन दर्शन था
वे प्रत्ययों में घोर पुल्लिंग वादी थे
उन्होंने वीरता छोड़कर वीर्य की उपासना की
वे ऐसे वीर थे जिन्होंने उत्साह को त्यागकर
उन्माद को स्थाई भाव बना लिया था
उनकी अकड़ी हुई जबान में चिपकी थी
प्रार्थना की अकेली पंक्ति वीर्यमसि वीर्यम मयि देहि
उनका वीर्य वसुंधरा को रक्षा की वस्तु कम
भोग का साधन अधिक मानता था

उनका दावा था कि उन्हें फूलों से प्यार है
लेकिन एक अजीब बीमारी थी
कि उन्हें मुकुराते फूलों को सूंघने से ज्यादा कुचलना भाता था
और विडंबना देखिए कि हर मेहनतकश को
इनके चरणों में बिछ जाना आता था
जबकि वे चारण नही थे
किसान थे नौजवान थे बलवान थे
राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने वाले
और कुछ तो नही बस नादान थे

 

बिना शब्द की कविता

रंग चढ़े व्योम में
मस्ती रोम रोम में
बदली ने अंबर की सूरत है बदली

मंत्र घुले राग में
पानी मिला आग में
पुरबा पहाड़ी से पोखर में भोर उतरी

एक लड़की सोई थी
मीठे सपनों में खोई थी
रंगों ने हाथ पकड़ एक दुनिया सिरजी

बगिया से वात हिली
क्यारी में कली खिली
डाल डाल पात पात फूल फूल महकी

फूल गिरा शाख से
ढलका आंसू आंख से
भाव भरी एक कविता बिना शब्द जन्मी

 

 बौद्धिक जुगाली

दिमाग की स्लेट पर उभरे अनुत्तरित प्रश्नों को लेकर
मैं देवालय गया अंतिम बार
फकत इंसानी हंसी ढूंढने
चढ़ता गया मस्जिद की सीढ़ियां
मानवीय चीखों का पीछा करते करते
पहुंच गया चर्च की घंटियों तक
इतिहास की गलतियों पर पश्चाताप करते हुए
युग के आंसू पोंछकर शोषितों के साथ खड़ा होने
जब धर्म को धर्मालय के ताख में रख देना चाहता था
कि धर्मविरुद्ध घोषित किया ऋचाओं के हस्तक्षेप ने
आयतों के झंडा बरदारों ने पागल करार दिया
अपराधी घोषित किया संस्कृति के न्यायाधीशों ने
अभिजात्य अदालत ने देश निकाला दे दिया धर्म की दुनिया से
मैंने मंज़ूर किया अदालत के फैसले को शहादत समझ
कि एक दिन इसी अदालत में खड़े होकर लामबंद शोषित
रक्त पिपासु सभ्यता की ईंटें उखाड़ ले जाएंगे
और दफन कर देंगे इतिहास की क़ब्र में
कि फिर से पतन होगा किसी बास्तील के दुर्ग का
इस बार गुलेटिन पर चढ़ाई जाएंगी
अफीम तस्कर आस्थाएं
इस बार नीरो भी जलेगा रोम की आग में
इस बार कील ठुकने से पहले
यीशु उतार लिए जाएंगे सूली से
कि मेरी पहल एक नए सूरज को जन्म देगी
और यह सोचकर
जंग में जाते चाकचौबंद सैनिक का भाव लिए
अदालत से बाहर की तरफ बढ़ता गया
हौलनाक था बाहर का मंज़र
धर्मग्रंथों की अगुआई में इंतज़ार कर रहे थे
पत्थर पकड़े हजारों हाथ और गुस्साए चेहरे
हैरतनाक था उससे भी ज़्यादा
कि ये वही लोग थे जो खुद को शोषित मानते थे
आंदोलनों की भीत पर अधिकारों का जुमला तानते थे
मैंने देखा
देखा और डरा
डरा फिर मुस्कुराया
फिर हंसा और खूब हंसा
हंसा कि हंसता ही गया
जैसे हंसता है कोई आखिरी हंसी
खुदकुशी के ठीक पहले

 

जावेद आलम खान, युवा कवि, अनेक पत्रिकाओं, जैसे हंस, कथादेश,आजकल, वागर्थ, बया, कथाक्रम, पाखी, पक्षधर, परिकथा, मधुमती, गगनांचल, नई धारा, उदभावना, मुक्तांचल, बहुमत, अक्षरा, जनपथ, वीणा, कविता कोश, परिंदे, विभोम स्वर, छत्तीसगढ़ मित्र, कविकुंभ, किस्सा कोताह, सोच विचार, सृजनलोक, विश्वगाथा, अग्रिमान, ककसाड़, समहुत, सेतु, अविराम साहित्यिकी, सुखनवर, समकालीन स्पंदन, साहित्य समीर दस्तक, हिमतरू, प्रणाम पर्यटन, गुफ्तगू, मैत्री टाइम्स, समकालीन सांस्कृतिक प्रस्ताव, हस्ताक्षर, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, प्रतिबद्ध, समय सुरभि अनंत, अनुगूंज आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित

 

 

 फ्रांसिस कोंबस (Francis Combes)  फ्रांस

अनूदित‍‍ -रति सक्सेना

इडेन का बगीचा

हम सब ने हमेशा एक ही
लक्ष्य साधा, कि साथ रहे उस बगीचे में
जहां मित्रता रहे इंसानों में
हर धर्म ने इसे भविष्य का नाम दिया
जिसे जन्म लेना शेष है
साथ ही स्वर्ण युग भी खोजना है
ईश का राज्य, अल्लाह की जन्नत, इडेन का बगीचा
थेलमे एबे, फालस्टरी, इकारी, द फ्यूचर सिटी,
द फ्रीडम सिटी, कन्ट्री आफ ब्रदरहुड
शासकहीनता, साम्यवाद…
हालांकि हर वक़्त लक्ष्य एक ही था
कि पहुंच सकें घाटी के उद्यान तक
क्षितिज तक ऊंची घाटी के पीछे
ऐसा उद्यान जहां इंसान शांति से रह सके
अपने स्वयं के साथ
प्रकृति के साथ
लेकिन,ऐसा बगीचा कभी मिला ही नहीं
कि दुनिया के ऊंचे नीचे रास्तों पर
युद्ध और अकाल के बीच
लताएं और गुलाब विभज्य हो संलग्न हों,
खुशियों के दूत गण हों
और एक खूबसूरत भविष्य हो.

 

महाविस्फोटन के उपरांत

दिवसों दिवस उपरांत, जब धरती के इर्द गिर्द
सब कुछ थम गया
अचानक, आभास हुआ कि
आसमान नीला हो सकता है,
कि धन की अपेक्षा जीवन अर्थवान है
और जो कुछ हम उत्पादित करते हैं
उनमें से अधिकतर व्यर्थ हैं
ज़रूरी वस्तुओं के लिए
दिन में 2 या 3 घंटे का काम काफ़ी है
बेहतर यह है कि
जीने के लिए जो कुछ ज़रूरी है
वह हर किसी को प्राप्त हो
ध्यान दिया जाए कि क्या अधिक महत्वपूर्ण है
प्रेम, जीवन, बच्चे और कविता…

जब सब कुछ थम गया
कई हफ़्तों के बाद
दिखाई देने लगा कि पृथ्वी पर हैः
एक समंदर,
एक वातावरण, और
एक मानव जाति।

 

पोस्ते का एक दाना

बाजार में
मोटरों और विज्ञापनी तख्तियों के बीच
संकरी जगह पर, जहां किसी की निगाह नहीं जाती
पगडंडी के करीब
तारों की दरार में अंकुरित
पोस्ते का एक पौधा
नाज़ुक, अकेला
लंबा,
रक्तवर्णी पुष्प लिए
खड़ा है
साहस से भरपूर

हम आशावादी क्यों नहीं हो सकते?

 

सम्मोह और विमोह के बारे में

पहला और दूसरा समरूप हैं
क्योंकि पहला दूसरे का विलोम है
वे आकर्षित होते हैं
और पूरक भी

क्योंकि पहला और दूसरा
भिन्न भिन्न हैं
वे अभिन्न होने में
आनंद प्राप्त करते हैं

ऐसा इसलिए है क्योंकि वे पृथक् पृथक् हैं
बड़ी नाज़ुकता से स्वायत्त चाहते हुए
संलयन की ओर बढ़ते हैं
(मात्र उसकी ओर)

पहले और दूसरे विपक्ष में हैं
लेकिन एक दूसरे से संलग्न हैं

और मिलन
और पार्थक्य
वे अपने को
एक दूसरे में बदल लेते हैं
कुछ वक़्त के बाद
पहला दूसरे में बदल जाता है
जो हैं, वही बने रहते हुए
कुछ और में बदल जाते हैं
अनुपम किन्तु भिन्न
जो वस्तुतः वे हैं

एक दिन आएगा जब मधुर नियम
इन मैत्रीपूर्ण अंतर्विरोधों की द्वंद्वात्मकता का पाठ
प्रेमियों को प्रतिदिन पढ़ाया जाएगा
और संभवतया देश की ज़िन्दगियों
पर शासन करेगा
(आम खुशी की संभावित परिभाषा।)

 

ग्रहवासी

हम, जिनके पास केवल एक धरती है
हथेलियों में थामने के लिए
एक धरती उपचार के लिए
एक धरती स्नेह देने के लिए
एक मात्र धरती
हमारी पैदाइशी ज़मीन के लिए
एक धरती पर जिएं
और खड़े हों साथ साथ
हम सब साथ
हम जिनके पास कुछ नहीं है
लेकिन हमारे हाथ, जीने के लिए
लेकिन हमारे सपने प्रेम के लिए
और हमारी तारों से जगमगाती रातें
हम जिनमें से विद्युतचुम्बकीय तरंगें
दुनिया को प्रकाश गति से
पार करतीं हैं
हम, जो ख़ुद से बात करते हैं
सरहदों के पार
पूरी तरह
हम जो कुछ भी नहीं हैं
लेकिन सब कुछ निर्भर करता है हम पर
यहां तक कि अपने ग्रह
धरती की नियति तक
हम नये परित्यक्त हैं
हम, स्पष्ट परछाइयां
हम बेशुमार अगिनत
हम आम जन हैं
आने वाले जन
हम यहां आते हैं
स्त्री
पुरुष
बच्चे
पृथ्वीवासी
हम ग्रहवासी हैं

(फ्रेंच से बारबरा पास्चके द्वारा अनुवादित)

फ्रांसिस कॉम्ब्स का जन्म 31 मई, 1953 को मार्वेजोल्स, लोज़ेरे (फ्रांस) में हुआ था। आपने राजनीति विज्ञान (1974) में एक उपाधि ग्रहण की एवं पूर्वी भाषाओं (रूसी, चीनी और हंगेरियन) का अध्ययन किया है। वह 1981 से 1992 तक मेसिडॉर पब्लिशिंग हाउस के साहित्यिक संपादक और यूरोप मेगज़ीन के प्रबंधकों में से एक रहे थे।

गरिमा जोशी पंत

चाहना

दिल तो अभी भी
फैल जाना चाहता है
सड़क पर ज़िद में कभी कभी
छपाक छपाक के
उड़ाना चाहता है कीचड़।
तंबई हो जाना चाहता है
धूलिधूसरित हो।
पर वो बुढ़ऊ दिमाग है ना
सिर पर सवार हमेशा
अनुशासन की बेंत थामे।
दुबकना पड़ता है
दिल को कोने में
जिंदगी की किताब में
मुंह छिपाए, बेमन से।

भूतों का होना।

भूतकाल हो गया है
भूतों का होना।
आत्माएं भटकती थीं तब
स्थिरता थी जब जीवन में।
वे सरलता के ठहरे हुए
जल से तृप्त होने को
भटकती थीं।
अब नहीं भटकती आत्माएं।
भटकाव का आसव
सशरीर पी आई हैं वे
पहले ही।
अब प्रपंचों से दूर
बेसुध हो पड़ी रहती हैं
दुबक के
इधर उधर, यहां वहां
इसलिए तुम डरना मत
क्यूंकि अब नहीं भटकती आत्माएं,
अब भूत नहीं होते
भूतकाल हो गया है
भूतों का होना।

वह एक शहर बनता जा रहा

वहां जाते जा रहे लोग
संभ्रांत, सुविज्ञ।
जैसे गांव से पलायन कर
जाते रहे हैं पहले भी
होड़ की दौड़ में।
फिर शहर तो शहर है
वहां अपनापा कहां, नीम की ठंडी छांव कहां, कोयल की कूक कहां, पड़ोस की हंसमुख काकी कहां!
वहां तो शोर की उदास नीरवता है, अबोला है, पड़ोसी नहीं जानता पड़ोसी को
बस हर शाम एक जाम अकेले ही अकेले पीना है।
शहर नहीं, महानगर होता जा रहा
जहरीली धुंध में लिपटा
अवसाद का महानगर
जहां हर रोज़ जाते जा रहे लोग।

गरिमा जोशी पंत,जीव विज्ञान में स्नातक, इतिहास में परास्नातक, एम फिल। अध्ययन, लेखन, अध्यापन। विभिन्न ब्लॉग्स, समाचार पत्र (प्रजातंत्र) में कविता, कहानी, लेख प्रकाशित। जैको पब्लिकेशंस, मुंबई के लिए दो पुस्तकें अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है।

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